अम्बेडकरनगर4मई26*हत्याकांड: मुख्य आरोपी का एनकाउंटर, लेकिन कई सवाल अनसुलझे*
*खूनी वारदात का अंत या नई शुरुआत? आरोपी ढेर, रहस्य कायम?*
अम्बेडकरनगर।
जनपद के कोतवाली अकबरपुर क्षेत्र के मुरादाबाद मोहल्ले में 2 मई को हुए जघन्य पांच हत्याकांड के मुख्य आरोपी आमिर को सोमवार को नेवतरिया बाईपास के पास पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया गया। पुलिस का दावा है कि घेराबंदी के दौरान आरोपी को पकड़ने का प्रयास किया जा रहा था, तभी उसने फायरिंग कर दी, जिसके जवाब में की गई कार्रवाई में वह मारा गया।
हालांकि इस मुठभेड़ के बाद कई महत्वपूर्ण सवाल और रहस्य अब भी अनसुलझे बने हुए हैं। घटना की भयावहता और जांच की दिशा को लेकर स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है।
2 मई को घर के अंदर चार मासूम बच्चों (उम्र 8 से 14 वर्ष) के शव खून से सने बिस्तर पर मिले थे। पुलिस के अनुसार, हत्या ईंटों और अन्य कठोर वस्तुओं से बेहद निर्ममता के साथ की गई थी, जिससे पूरे इलाके में दहशत फैल गई। बच्चों की मां गासिया खातून शुरुआत में लापता थी, जिस पर शुरुआती शक भी जताया गया।
लेकिन 3 मई को घर से करीब 100 मीटर दूर नाले के किनारे महिला का शव बरामद हुआ, जिस पर चोट के निशान पाए गए। इसके बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया। पुलिस ने हत्या, आत्महत्या और साजिश—सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जांच आगे बढ़ाई।
जांच के दौरान आमिर को मुख्य आरोपी के रूप में चिन्हित किया गया, जो पहले भी हत्या समेत अन्य मामलों में जेल जा चुका था। हालांकि मुठभेड़ के बाद अब कई अहम सवाल उठ रहे हैं—क्या इस वारदात में केवल एक ही आरोपी शामिल था या इसके पीछे कोई और भी था? हत्या का मकसद क्या था? क्या पारिवारिक या अन्य विवादों की गहराई से जांच हुई?
पुलिस का कहना है कि आरोपी ने पहले फायरिंग की, लेकिन घटनास्थल से जुड़े स्वतंत्र गवाह, फोरेंसिक साक्ष्य और विस्तृत जांच रिपोर्ट अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हो सकी है। मुठभेड़ में आरोपी की मौत के बाद उससे गहन पूछताछ भी संभव नहीं हो सकी, जिससे कई पहलुओं पर पर्दा बना हुआ है।
इस बीच, वर्ष 2014 में People’s Union for Civil Liberties vs State of Maharashtra मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस मुठभेड़ों को लेकर जारी 16 दिशानिर्देशों की भी चर्चा हो रही है। इन दिशानिर्देशों के तहत मुठभेड़ में मौत होने पर स्वतंत्र जांच, मैजिस्ट्रेट जांच (धारा 176 CrPC), तत्काल एफआईआर दर्ज करना, फोरेंसिक जांच, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सूचना देना अनिवार्य माना गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल “आत्मरक्षा” के पुलिस दावे के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, बल्कि निष्पक्ष और पारदर्शी जांच जरूरी है।
पुलिस की इस कार्रवाई से जहां एक ओर एक आरोपी के मारे जाने पर लोगों में कुछ हद तक राहत की भावना है, वहीं दूसरी ओर कानून के शासन के तहत हर मौत की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि सच्चाई पूरी तरह सामने आ सके।
यह मामला अब पुलिस की कार्यप्रणाली, जांच की पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी बन गया है। स्थानीय लोग और जागरूक नागरिक इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच और पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं।

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