April 21, 2026

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भुवनेश्वर 20 अप्रैल 26*तकनीकी आत्मनिर्भरता और आस्था का अनोखा संगम *अश्वनी वैष्णव ने भुवनेश्वर में फुका विकास का विगुल,

भुवनेश्वर 20 अप्रैल 26*तकनीकी आत्मनिर्भरता और आस्था का अनोखा संगम *अश्वनी वैष्णव ने भुवनेश्वर में फुका विकास का विगुल,

भुवनेश्वर 20 अप्रैल 26*तकनीकी आत्मनिर्भरता और आस्था का अनोखा संगम *अश्वनी वैष्णव ने भुवनेश्वर में फुका विकास का  विगुल,उड़ीशा की उन्नति का उदघोष*

आलेख–विनोद कुमार सिंह,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार

भारत की आत्मा केवल विकास की गति में नहीं,बल्कि उसकी संस्कृति, आस्था और परंपरा में भी बसती है। जब तकनीक और परंपरा का यह संगम एक साथ साकार होता है, तब इतिहास केवल लिखा नहीं जाता—वह जीवंत अनुभव बन जाता है। 19 अप्रैल 2026 को भुवनेश्वर की धरती पर देश की पहली काँच आधारित उन्नत त्रि-आयामी सेमीकंडक्टर पैकेजिंग इकाई का शिलान्यास ऐसा ही एक क्षण था,जिसमें आधुनिक भारत की तकनीकी आकांक्षा और सनातन संस्कृति की आस्था एक साथ धड़कती हुई प्रतीत हुई।यह भूमि केवल औद्योगिक प्रगति की साक्षी नहीं,बल्कि भगवान जगन्नाथ की पावन छाया से आच्छादित वह धरा है,जहाँ हर विकास यात्रा में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार स्वतः हो जाता है। आध्यात्म की अनोखी अनुठी नगरी पुरी के जगन्नाथ धाम से उठने वाली श्रद्धा की लहरें मानो भुवनेश्वर तक आकर इस तकनीकी क्रांति को आशीर्वाद देती प्रतीत हो रही थीं।यह वही ओडिशा है,जहाँ रथ के पहिए केवल मंदिरों की परिक्रमा नहीं करते,बल्कि समय के साथ विकास की दिशा भी निर्धारित करते हैं। ये ऐतिहासिक अवसर पर केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी तथा रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भुवनेश्वर में फुका विकास की विगुल,उड़ीशा की उन्नति का उदधोष।आज के उद्बोधन में दिखने को हमें मिला।जो आज के आयोजन की आत्मा बनकर उभरा। मंत्री महोदय के शब्दों में एक ओर भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता का स्पष्ट संकल्प था,तो दूसरी ओर विकास के व्यापक स्वरूप की झलक भी दिखाई दे रही थी।उन्होंने जिस आत्मविश्वास के साथ कहा कि भारत अब सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में केवल उपभोक्ता नहीं रहेगा, बल्कि निर्माण और नवाचार में अग्रणी भूमिका निभाएगा,वह इस नए युग की उद्घोषणा थी।उनके उद्बोधन में यह स्पष्ट था कि काँच आधारित त्रि-आयामी पैकेजिंग तकनीक भारत के लिए एक परिवर्तनकारी शक्ति बनेगी,जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता,उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग,दूरसंचार और रक्षा जैसे क्षेत्रों में देश को नई ऊँचाइयों तक ले जाएगी।
आपको बता दें कि उनका दृष्टिकोण केवल तकनीक तक सीमित नहीं था।उन्होंने ओडिशा में रेलवे अवसंरचना के अभूतपूर्व विस्तार का उल्लेख करते हुए बताया कि लगभग 90,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएँ वर्तमान में क्रियान्वयन के चरण में हैं।यह वही पटरियाँ हैं, जिन पर विकास की गाड़ी केवल गति ही नहीं पकड़ती,बल्कि जन-जन के जीवन में परिवर्तन भी लाती है।उन्होंने भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास का निरीक्षण करते हुए यह स्पष्ट किया कि आने वाले समय में यह स्टेशन केवल एक यातायात केंद्र नहीं रहेगा,बल्कि आधुनिक सुविधाओं से युक्त एक ऐसा केंद्र बनेगा,जहाँ यात्रियों को सुविधा और गरिमा दोनों का अनुभव होगा।ओडिशा को प्राप्त 10,928 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड रेल बजट आवंटन और 59 स्टेशनों के आधुनिकीकरण की योजना इस बात का प्रमाण है कि विकास की यह यात्रा कितनी व्यापक और दूरगामी है। ‘अमृत भारत स्टेशन योजना’ के अंतर्गत किए जा रहे ये प्रयास उस सोच को दर्शाते हैं, जिसमें हर यात्री,हर नागरिक और हर क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से जुड़ता है। केन्द्रीय मंत्री नेजिस दूरदृष्टि के साथ ओडिशा के सभी 30 जिलों को रेल नेटवर्क से जोड़ने की बात कही,वह वास्तव में समावेशी विकास का आधार है। जब दूरस्थ गाँव और आंतरिक क्षेत्र भी रेल से जुड़ते हैं,तब वहाँ अवसरों का प्रकाश फैलता है -रोजगार, शिक्षा,व्यापार और समृद्धि के नए द्वार खुलते हैं। बालासोर से बेरहामपुर तक प्रस्तावित चार रेल लाइनों का तटीय कॉरिडोर इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो न केवल यात्री आवागमन को सुगम बनाएगा,बल्कि औद्योगिक और आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति देगा।
इस अवसर पर उड़ीशा के मुख्य मंत्री मोहन चरण माँझी ने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में राज्य की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि ओडिशा अब केवल परंपरा का प्रतीक नहीं,बल्कि तकनीकी और औद्योगिक प्रगति का केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।उनके शब्दों में यह विश्वास झलक रहा था कि यह परियोजना राज्य के भविष्य को नई दिशा देगी।जब हम इस पूरे परिदृश्य को देखते हैं,तो यह स्पष्ट होता है कि भुवनेश्वर में हो रहा यह परिवर्तन केवल तकनीकी उन्नति का संकेत नहीं है।यह उस भारत की कहानी है,जहाँ एक ओर प्रयोगशालाओं में नई तकनीक विकसित हो रही है, तो दूसरी ओर मंदिरों की घंटियों में आस्था की अनुगूंज सुनाई देती है।यहाँ विकास केवल भौतिक नहीं,बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा से भी प्रेरित है।
भगवान जगन्नाथ की कृपा से ओडिशा की यह धरती सदैव से ही सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रही है।आज जब यही धरती तकनीकी क्रांति की नई कहानी लिख रही है,तो यह स्वाभाविक है कि इस विकास यात्रा में आस्था का स्पर्श भी शामिल हो। यह वही संगम है,जहाँ विज्ञान और श्रद्धा एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
अंततः, भुवनेश्वर से उठती यह तकनीकी और अवसंरचनात्मक परिवर्तन की लहर केवल ओडिशा तक सीमित नहीं रहेगी,बल्कि पूरे भारत को एक नई दिशा देगी। अश्विनी वैष्णव के उद्बोधन में व्यक्त दृष्टि और संकल्प इस बात का संकेत है कि भारत अब एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहा है,जहाँ विकास की गति और आस्था की शक्ति दोनों साथ-साथ चलती हैं।
यह नया भारत है—जहाँ पटरियों पर दौड़ती रेल,प्रयोगशालाओं में विकसित होती तकनीक और मंदिरों में गूंजती घंटी श्रद्धा तीनों मिलकर एक ऐसे स्वर्णिम भविष्य का निर्माण कर रहे हैं,जो आत्मनिर्भर भी है, समावेशी भी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भी।यही इस ऐतिहासिक क्षण का वास्तविक सार है।