May 19, 2026

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नई दिल्ली19मई26*• मुख्यमंत्री का बयान मजदूर वर्ग और ट्रेड यूनियन आंदोलन के खिलाफ दुर्भाग्यपूर्ण एवं असंवैधानिक*

नई दिल्ली19मई26*• मुख्यमंत्री का बयान मजदूर वर्ग और ट्रेड यूनियन आंदोलन के खिलाफ दुर्भाग्यपूर्ण एवं असंवैधानिक*

नई दिल्ली19मई26*• मुख्यमंत्री का बयान मजदूर वर्ग और ट्रेड यूनियन आंदोलन के खिलाफ दुर्भाग्यपूर्ण एवं असंवैधानिक*

*• ट्रेड यूनियन ने ही मजदूरों को अधिकार, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा दिलाई*

*• उद्योगों की बदहाली के लिए कॉर्पोरेटपरस्त नीतियां, निजीकरण और गलत आर्थिक फैसले जिम्मेदार*

*• श्रमिक संगठनों पर हमला लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना पर हमला*

नई दिल्ली, 19 मई 2026।

*उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा एक समाचार पत्र के कार्यक्रम में ट्रेड यूनियनों को उद्योगों के बंद होने और मजदूरों की बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराना न केवल तथ्यहीन और गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि यह देश के गौरवशाली मजदूर आंदोलन, भारतीय संविधान और श्रमिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का भी अपमान है।* देश के विभिन्न मजदूर संगठनों ने मुख्यमंत्री के इस बयान की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि ट्रेड यूनियनें किसी उद्योग को बंद करने के लिए नहीं, बल्कि उद्योगों में श्रमिकों के हितों की रक्षा, सामाजिक सुरक्षा, सम्मानजनक मजदूरी, सुरक्षित कार्यस्थल और औद्योगिक शांति स्थापित करने के लिए अस्तित्व में आई थीं।

*आज जारी बयान में भारतीय राष्ट्रीय प्रवासी मजदूर यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव अमजद हसन ने कहा कि विश्व इतिहास गवाह है कि औद्योगिक क्रांति के दौरान पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों का अमानवीय शोषण किया गया। मजदूरों से 16-18 घंटे तक काम लिया जाता था, उन्हें न्यूनतम वेतन, सुरक्षा और मानवीय जीवन की बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं थीं।* ऐसे कठिन दौर में मजदूरों ने संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया और लंबे आंदोलनों, हड़तालों एवं बलिदानों के बाद ट्रेड यूनियन आंदोलन अस्तित्व में आया।

*उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियनें आधुनिक लोकतांत्रिक समाज की एक महत्वपूर्ण संस्था हैं, जिन्होंने मजदूरों को आठ घंटे कार्यदिवस, न्यूनतम मजदूरी, बोनस, पीएफ, ईएसआई, मातृत्व लाभ, पेंशन, दुर्घटना मुआवजा, सामाजिक सुरक्षा, साप्ताहिक अवकाश, सुरक्षित कार्यस्थल और श्रम कानूनों जैसे अधिकार दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।*

आज देश के करोड़ों मजदूर जिन अधिकारों का लाभ उठा रहे हैं, वे किसी सरकार या उद्योगपति की दया से नहीं बल्कि ट्रेड यूनियन आंदोलनों के लंबे संघर्षों का परिणाम हैं।

*_हसन ने कहा कि भारत में ट्रेड यूनियन का अधिकार कोई दया नहीं बल्कि संवैधानिक अधिकार है। वर्ष 1926 में ट्रेड यूनियन अधिनियम लागू हुआ और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत संगठन बनाने का अधिकार मौलिक अधिकार के रूप में दिया गया। ऐसे में मुख्यमंत्री द्वारा ट्रेड यूनियनों को उद्योग बंद होने का जिम्मेदार बताना संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। यह बयान मजदूर वर्ग को कमजोर करने और कॉर्पोरेट हितों को मजबूत करने वाली सोच को दर्शाता है।_*

उन्होंने मुख्यमंत्री द्वारा कानपुर की मिलों का उदाहरण दिए जाने पर कहा कि कानपुर की वस्त्र मिलें ट्रेड यूनियनों के कारण नहीं, बल्कि सरकारों की गलत आर्थिक नीतियों, निजीकरण और कॉर्पोरेटपरस्त फैसलों के कारण बंद हुईं। सच्चाई यह है कि रिलायंस, रेमण्ड, विमल इन जैसे अन्य टेक्सटाइल जैसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों को बाजार उपलब्ध कराने के लिए कानपुर की एनटीसी और बीआईसी की मिलों को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया गया।

*वर्षों तक उत्पादन बंद रखकर मजदूरों को वेतन दिया गया और बाद में भाजपा नेतृत्व वाली सरकारों ने मिलों को पूरी तरह बंद कर उनकी हजारों करोड़ की जमीनें रियल एस्टेट कारोबारियों के हवाले कर दीं। यह केवल कानपुर तक सीमित नहीं था, बल्कि देशभर में सार्वजनिक उद्योगों को निजीकरण और विनिवेश की नीति के तहत खत्म किया गया।*

*_हसन ने कहा कि उद्योगों की बदहाली के असली कारण नव-उदारवादी आर्थिक नीतियां, नोटबंदी, गलत जीएसटी व्यवस्था, निवेश में कमी, बढ़ती महंगाई, बिजली और कच्चे माल की लागत में वृद्धि, भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और सरकारों की गलत नीतियां हैं। सरकारी आंकड़े स्वयं बताते हैं कि पिछले वर्षों में लाखों छोटे, मझोले (MSME) और बड़े उद्योग आर्थिक नीतियों की विफलताओं के कारण बंद हुए। इसके बावजूद मजदूर संगठनों को दोष देना वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास है।_*

उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियनें उद्योग विरोधी नहीं बल्कि श्रमिक और उद्योग दोनों के हित में कार्य करती हैं। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब मजदूर संगठनों ने उद्योगों को बचाने, उत्पादन बढ़ाने और औद्योगिक शांति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सुरक्षित, प्रशिक्षित और संतुष्ट मजदूर ही किसी उद्योग की वास्तविक ताकत होते हैं। श्रमिकों के अधिकारों का हनन कर कोई भी अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती।

*_ध्यान देने की बात है भाजपा शासित राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश में आज श्रमिक अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। सरकार ने श्रम कानूनों को कमजोर करते हुए कारखाना अधिनियम में संशोधन कर कार्य के घंटे 12 तक बढ़ा दिए। नए लेबर कोड के माध्यम से न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, यूनियन बनाने, सामूहिक सौदेबाजी और श्रमिक हितों की रक्षा से जुड़े अधिकारों को सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रदेश में पिछले 12 वर्षों से न्यूनतम मजदूरी का समुचित वेज रिवीजन नहीं किया गया, जिससे लाखों मजदूर महंगाई के दौर में बेहद कम वेतन पर जीवन यापन करने को मजबूर हैं।_*

उन्होंने कहा कि स्वयं उत्तर प्रदेश सरकार ने 17 अप्रैल 2026 को जारी अधिसूचना में मजदूरी पुनरीक्षण में हुई देरी को स्वीकार किया है।

इसके अलावा मुख्यमंत्री द्वारा नोएडा श्रमिक आंदोलन के दौरान मई माह में वेज बोर्ड गठन, आंगनबाड़ी एवं आशा कार्यकर्ताओं का मानदेय बढ़ाने और आउटसोर्सिंग कर्मचारियों का वेतन सुधारने की जो घोषणाएं की गई थीं, उन पर आज तक अमल नहीं हुआ।

*यदि सरकार वास्तव में उद्योगों और रोजगार को मजबूत करना चाहती है तो उसे श्रमिक विरोधी नीतियों को वापस लेना होगा, न्यूनतम मजदूरी बढ़ानी होगी, सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए ठोस कल्याणकारी योजनाएं लागू करनी होंगी तथा ट्रेड यूनियनों के साथ संवाद स्थापित करना होगा।*

लोकतंत्र में असहमति और संगठन बनाने का अधिकार मूल आधार है, इसलिए ट्रेड यूनियनों को बदनाम करने के बजाय सरकार को श्रमिकों की वास्तविक समस्याओं के समाधान पर ध्यान देना चाहिए।

*हसन ने मुख्यमंत्री से तत्काल अपने बयान पर पुनर्विचार करने, ट्रेड यूनियनों के खिलाफ दिए गए वक्तव्य को वापस लेने तथा श्रमिक संगठनों के साथ सम्मानजनक संवाद स्थापित करने की मांग की है।*

जारीकर्ता
(*अमजद हसन*)
राष्ट्रीय महासचिव
भारतीय राष्ट्रीय प्रवासी मज़दूर यूनियन एवं
दिल्ली असंगठित निर्माण मज़दूर यूनियन।
मो०: 9868157860

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