बिजनौर २७ दिसंबर २५ * विदेशी क्रूर आक्रांता औरंगज़ेब और आंख फोड़वा गैंग ?
✍️मनोज चतुर्वेदी शास्त्री
——————————-
बिजनौर के नूरपुर में एक सिख युवक की आँख फोड़ दी जाती है—क्योंकि उसने औरंगज़ेब पर कथित टिप्पणी कर दी। यह घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि उस मानसिकता का नग्न प्रदर्शन है जो इतिहास को धर्म का कवच पहनाकर वर्तमान में गुंडागर्दी को वैध ठहराना चाहती है। सवाल सीधा है: क्या अब भारत में इतिहास पर राय रखना भी आँख खोने की सज़ा बन चुका है?
औरंगज़ेब कोई धार्मिक देवता नहीं, इतिहास का एक शासक था—जिस पर आलोचना, विमर्श और असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक अधिकार है। यदि किसी कथन से असहमति है, तो कानून, तर्क और बहस का रास्ता है। आँख फोड़ना बहस नहीं, बर्बरता है। यह हिंसा नहीं तो और क्या है—और यह अपराध नहीं तो किसे अपराध कहा जाएगा?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे मामलों में अक्सर वही पुराना ढोंग सामने आता है—“भावनाएँ आहत हो गईं।” क्या आहत भावनाएँ किसी की आँख निकालने का लाइसेंस देती हैं? अगर हाँ, तो फिर संविधान, कानून और न्यायालय किस काम के? यह तर्क स्वीकार करना सीधे-सीधे भीड़तंत्र को सत्ता सौंपने जैसा होगा।
राज्य और प्रशासन के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। अगर कार्रवाई में ढिलाई हुई, अगर धाराएँ कमजोर रखी गईं, अगर आरोपियों के साथ “सहानुभूति” दिखाई गई—तो संदेश साफ जाएगा कि हिंसा करने वालों को संरक्षण है और पीड़ित होना अपराध है। यह देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए ज़हर है।
और हाँ, इस चुप्पी पर भी सवाल उठना चाहिए। वे राजनीतिक दल और वैचारिक समूह जो हर छोटी बात पर “लोकतंत्र खतरे में” का शोर मचाते हैं, यहाँ मौन क्यों हैं? क्या इसलिए कि पीड़ित सिख है और अपराधियों की पहचान उनके सुविधाजनक नैरेटिव में फिट नहीं बैठती?
नूरपुर की घटना एक चेतावनी है। अगर आज इतिहास पर राय रखने की कीमत आँख से चुकानी पड़े, तो कल विचार रखने की कीमत जीवन से भी चुकानी पड़ सकती है। कानून को अब निर्णायक होना होगा—वरना यह देश बहस से नहीं, भय से चलेगा।
——————————-
👉कॉपीराइट चेतावनी:
इस पोस्ट में प्रयुक्त फोटो, विचार और अभिव्यक्ति लेखक की बौद्धिक संपत्ति हैं।
लेखक की स्पष्ट अनुमति के बिना इस सामग्री का आंशिक या पूर्ण उपयोग, संशोधन, पुनः प्रकाशन या व्यावसायिक प्रयोग
कॉपीराइट कानून के अंतर्गत दंडनीय हो सकता है।
👉डिस्क्लेमर:
यह पोस्ट लेखक के व्यक्तिगत विचारों की अभिव्यक्ति है।
इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय, धर्म या संस्था का अपमान करना नहीं है।
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत
विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत
यह टिप्पणी की गई है।
यह लेख पूर्णतः शैक्षणिक, वैचारिक, विश्लेषणात्मक एवं जनहित में संवैधानिक विमर्श के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें व्यक्त सभी विचार भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) के अंतर्गत हैं तथा अनुच्छेद 19(2) में निहित युक्तियुक्त प्रतिबंधों — जिनमें न्यायालय की गरिमा, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता एवं राज्य की संप्रभुता शामिल है — का पूर्ण सम्मान करते हैं।
यह लेख न्यायपालिका के किसी निर्णय का अपमान, अवमानना, अवज्ञा अथवा अस्वीकार नहीं करता। न्यायालयों के निर्णयों पर संवैधानिक, अकादमिक एवं सामाजिक प्रभावों के संदर्भ में प्रश्न उठाना और विश्लेषण करना, भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा में स्वीकृत एवं संरक्षित बौद्धिक अधिकार है, जैसा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विभिन्न निर्णयों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में स्वीकार किया गया है।
यह स्पष्ट किया जाता है कि प्रस्तुत लेख:
किसी भी न्यायिक आदेश को निरस्त करने का आह्वान नहीं करता,
किसी भी अदालत, न्यायाधीश या संस्था की मंशा पर आरोप नहीं लगाता,
तथा किसी भी प्रकार से न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 का उल्लंघन करने का उद्देश्य नहीं रखता।
यह लेख कानूनी परामर्श (Legal Advice) नहीं है और न ही इसे किसी व्यक्तिगत, न्यायिक या प्रशासनिक निर्णय का आधार माना जाए। यह केवल संवैधानिक चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व और सार्वजनिक नीति से जुड़े मुद्दों पर विमर्श प्रस्तुत करता है। किसी भी विधिक कदम या अधिकार के प्रयोग से पूर्व संबंधित क्षेत्र के योग्य अधिवक्ता या विशेषज्ञ से परामर्श करना आवश्यक है।
लोकतंत्र में प्रश्न उठाना, विमर्श करना और संतुलन की खोज करना संविधान के प्रति निष्ठा का प्रतीक है, न कि उसकी अवमानना। यह लेख उसी संवैधानिक भावना के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है।

More Stories
भागलपुर 10 मार्च 26*नगर निगम: वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए विकासोन्मुख बजट पेश; बुनियादी ढांचे और स्वच्छता पर रहेगा विशेष जोर
अयोध्या 10 मार्च 26*मरकज मस्जिद में मुकम्मल हुई क़ुरआन तरावी
वाराणसी 10 मार्च 26*आईजीआरएस निस्तारण में इस बार वाराणसी जनपद का “तहसील सदर” प्रदेश में नंबर-1*