इटावा 7दिसम्बर 25*श्रीमद्भागवत कथा में सुदामा चरित्र से मिली जीवन-संदेश की सीख
महेवा।
गरीबी की मार से जब व्यक्ति टूट जाता है, तब उसे संभालने वाला केवल जगत-नियंता ही होता है। यह मधुर वचन भागवताचार्य शास्त्री साधना बघेल ने नहरकोठी के सामने पाल समाज द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन सुदामा चरित्र के प्रसंग का वर्णन करते हुए कहे।
अपने प्रवचन में उन्होंने बताया कि योगीराज भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा ने उज्जैन स्थित सांडिपनि ऋषि के गुरुकुल में साथ-साथ विद्या अध्ययन किया था। एक बार गुरुपत्नी ने उन्हें जंगल से लकड़ी लाने के लिए भेजा और साथ में खाने के लिए चने भी दिए थे। वर्षा होने पर सुदामा ने श्रीकृष्ण के हिस्से के चने भी खा लिए। इसी कारण वे आजीवन घोर दरिद्रता का सामना करते रहे, किंतु इसके बावजूद उन्होंने संयम नहीं छोड़ा और श्रीहरि के ध्यान में मग्न रहे।
कथा वाचिका ने कहा कि यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि किसी का हक छीनने या हड़पने से व्यक्ति दरिद्री हो जाता है, जबकि वे लोग सौभाग्यशाली होते हैं जो विपत्ति में भी स्वयं को प्रभु के भरोसे छोड़ देते हैं। पत्नी सुशीला के कहने पर जब सुदामा द्वारिका पहुँचे, तो श्रीकृष्ण ने उनकी अगवानी कर उनका आदर-सत्कार किया और उन्हें दरिद्रता से मुक्ति दिलाई।
आयोजक श्रीकृष्ण पाल ने बताया कि कथा का विशाल भंडारा आज (सोमवार) को आयोजित किया जाएगा।

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