August 29, 2026

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हरदोई २७ मई २६ * त्याग और बलिदान का सीख देता है कुर्बानी का त्योहार बकरीद

हरदोई २७ मई २६ * त्याग और बलिदान का सीख देता है कुर्बानी का त्योहार बकरीद

हरदोई २७ मई २६ * त्याग और बलिदान का सीख देता है कुर्बानी का त्योहार बकरीद

पिहानी(हरदोई)भूखे को अपने हिस्से की रोटी देना हो या बुरी आदतों से तौबा। खुदा के बताए रास्ते पर चलकर गरीबों और यतीमों के जीवन में खुशियां भरना, ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का पर्व हमें यही संदेश देता है। बृहस्पतिवार कलसे तीन दिन तक चलने वाले कुर्बानी के त्योहार बकरीद की तैयारी जोरों पर है। इस्लामिक साल के अंतिम महीने इदुल हिज्ज की 10वीं तारीख को यह त्योहार मनाया जाता है।

जामा मस्जिद के मौलाना सुलेमान का कहना है कि कुर्बानी का त्योहार त्याग और बलिदान की सीख देता है। कुर्बानी का अर्थ त्याग और बलिदान होता है। जो अल्लाह को पाने का साधन है। समय-समय पर अल्लाह अपने बंदों ( अपने मानने वालों) का इम्तिहान लेता रहता है।

ईद-उल-अजहा एक प्रेरणादायक कहानी से जुड़ा है। हजरत (सम्मान सूचक शब्द) इब्राहिम को एक रात सपना आता है, जिसमें खुदा उन्हें अपनी सबसे प्यारी चीज को कुर्बान करने का हुक्म सुनाते हैं। वह अपने कई प्रिय पशुओं की कुर्बानी देते हैं, लेकिन अल्लाह बार-बार सपने में आते हैं और उसी बात को दोहराते हैं। इब्राहिम सोचते हैं कि वह सबसे ज्यादा प्यार इकलौते बेटे इस्माइल से करते हैं, जिसकी उम्र सिर्फ 11 वर्ष थी और जो उन्हें 90 साल की उम्र में प्राप्त हुआ था। इस्माइल ने भी इब्राहिम को अल्लाह के हुक्म की तामील (आदेश को मानना) करने को कहा। बेटे को कुर्बान करने के लिए वह मक्का के नजदीक मीना नामक पहाड़ी पर पहुंचे। इस्माइल अपने पिता से कहते हैं कि आप अपनी आंखों पर पट्टी बांध लीजिए नहीं तो पुत्र के प्रेम में आप अल्लाह के इम्तिहान में फेल हो जाएंगे। हजरत इस्माइल पिता की आंखों पर पट्टी बांध देते हैं, जिससे वह विचलित न हों। हजरत इब्राहिम बेटे पर छुरी चलाते हैं, लेकिन वह छुरी इस्माइल की गर्दन को नहीं काट पाती, ऐसा दो बार होता है। लेकिन तीसरी बार में कुर्बानी कर जब आंख से पट्टी हटाते हैं तो देखते हैं कि फरिस्ता (देवदूत) हजरत जिब्राइल ने इस्माइल को वहां से हटाकर एक दुबा (कुर्बानी का जानवर) रख दिया और हजरत इस्माइल सही सलामत मुस्करा रहे थे। इस पर फरिश्ते ( देवदूत) कहते हैं कि अल्लाह को इस्माइल की कुर्बानी नहीं चाहिए थी, वह तो सिर्फ इब्राहिम का इम्तिहान ले रहे थे। तभी से कुर्बानी का यह त्योहार मनाया जा रहा है। कुर्बानी के दिन ही हाजियों का हज पूरा होता है।

कुर्बानी का महत्व केवल बलिदान तक सीमित नहीं है; यह त्याग, समर्पण और अल्लाह के प्रति पूर्ण विश्वास का प्रतीक है। इस दिन मुसलमान हलाल जानवर जैसे बकरे, भेड़ या ऊंट की कुर्बानी देते हैं। कुर्बानी के लिए जानवर का स्वस्थ और बालिग होना जरूरी है। कुर्बानी का मांस तीन हिस्सों में बांटा जाता है। एक हिस्सा परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए, और तीसरा गरीबों और जरूरतमंदों के लिए। यह प्रथा समाज में एकता, भाईचारे और दान की भावना को बढ़ावा देती है। इस्लाम में कुर्बानी को सवाब का काम माना जाता है, और यह हर सक्षम मुसलमान के लिए वाजिब है, यानी ऐसा कर्तव्य जो फर्ज से ठीक नीचे आता है।

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