August 17, 2026

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हमीरपुर १ जुलाई २६ * भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने वर्तमान की कुत्सित मानसिकता ने समाज को दो धड़ों में बाँट दिया है।

हमीरपुर १ जुलाई २६ * भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने वर्तमान की कुत्सित मानसिकता ने समाज को दो धड़ों में बाँट दिया है।

हमीरपुर १ जुलाई २६ * भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने वर्तमान की कुत्सित मानसिकता ने समाज को दो धड़ों में बाँट दिया है।

हमीरपुर*भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने वर्तमान की कुत्सित मानसिकता ने समाज को दो धड़ों में बाँट दिया है। एक पक्ष इसे फर्जी एनकाउंटर बताकर न्याय की मांग कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे जाति और राजनीति का मुद्दा बना रहा है। मुझे सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि न्याय का प्रश्न पीछे छूट गया है और जातीय बहस आगे आ गई है।
यदि एनकाउंटर पूरी तरह सही था, तो संबंधित पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई क्यों हुई? न्यायिक जांच की आवश्यकता क्यों पड़ी? ये सवाल अपने आप में बताते हैं कि मामला गंभीर है और इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
कुछ लोग इसे केवल इसलिए ब्राह्मण बनाम अन्य जातियों का मुद्दा बना रहे हैं क्योंकि भरत तिवारी ब्राह्मण समाज से थे।जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था से निर्मित संविधान की न्यायिक प्रक्रिया से कोसों दूर करता है हमारे मन में सवाल बड़ी तेजी से हिलोरें मार रहा है की क्या किसी जाति में जन्म लेना अपराध हैहमारी,समझ शास्त्रों के अनुसार किसी व्यक्ति की पहचान उसकी जाति नहीं, उसके कर्म होते हैं। चेहरा नहीं चरित्र होता है मेरी जानकारी और समझ के अनुसार, भरत तिवारी गरीबों, बाढ़ पीड़ितों और वंचित लोगों की आवाज़ उठाते थे। वे किसी एक जाति के लिए नहीं, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के लिए संघर्ष कर रहे थे। ऐसे व्यक्ति को केवल उसकी जाति तक सीमित कर देना उसके पूरे व्यक्तित्व के साथ अन्याय है।कुछ लोग कह रहे हैं कि दूसरी जाति का व्यक्ति मरे तो नक्सली कहा जाता है, मुस्लिम मरे तो आतंकवादी कहा जाता है, और ब्राह्मण मरे तो शहीद कहा जाता है। लेकिन किसी भी घटना का फैसला नारों या जातीय चश्मे से नहीं, बल्कि तथ्यों और कानून से होना चाहिए।मैं यह भी स्पष्ट कहना चाहता हूँ कि हथियार उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं है। कानून अपने हाथ में लेना गलत है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति ने वास्तव में आत्मसमर्पण कर दिया है, तो कानून कहता है कि उसके साथ न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। उसे अदालत में पेश किया जाना चाहिए, न कि उसकी जान ले ली जाए। यही कारण है कि इस पूरे मामले पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं और स्वच्छ लोकतंत्र के समर्थकों में आक्रोश पनप रहा है
मेरा उद्देश्य किसी अपराध का समर्थन करना नहीं, बल्कि न्याय की मांग करना है। यदि जांच में यह साबित होता है कि कानून का उल्लंघन हुआ है, तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए—चाहे वे कितने ही प्रभावशाली क्यों न हों।न्याय की कोई जाति नहीं होती। संविधान सबके लिए समान है। किसी की मौत पर राजनीति नहीं, न्याय होना चाहिए। यही लोकतंत्र की असली पहचान है। और यह भी ध्यान रहें की वर्तमान समाज में केवल दो ही जातियां हैं एक अमीर दूसरा गरीब बाकी सब ठीक स्वार्थ की रोटी सेकना है अनुभव कर लेना अपने घर में दो दामाद, एक अमीर दूसरा गरीब के स्वागत और व्यवहार में बाकी आप सभी स्वयं समझदार है जरूरी नहीं है हम जो सोचें वो सही है सबकी अपनी-अपनी सोच होती है हमारे जीवन में जाति नहीं कर्म का अन्याय नहीं न्याय का स्थान सर्वोपरि है जीवन चार दिन का है ना गलत करो ना ग़लत का समर्थन करो वर्ना महाभारत के जैसी स्थिति सुनिश्चित है

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