लखनऊ25जून26*इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से भाजयुमो के ‘सिंहासन’ तक: कौन हैं डॉ. रोहित मिश्रा, जिन्हें चुनाव से पहले योगी-मोदी ने सौंपी यूपी युवाओं की कमान?
लखनऊ –
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने संगठनात्मक स्तर पर एक बड़ा दांव खेला है. बीजेपी की नई सूची जारी होते ही सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है. पार्टी ने सबको चौंकाते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष और प्रखर वक्ता डॉ. रोहित मिश्रा को भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है.
इस फैसले को सीधे तौर पर यूपी चुनाव से पहले बीजेपी की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और युवा वोटर्स को साधने की एक बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. आइए समझने की कोशिश करते हैं कि प्रतापगढ़ के एक साधारण किसान परिवार से आने वाले रोहित मिश्रा आखिर कैसे छात्र राजनीति से तपकर संगठन के इस सर्वोच्च शिखर तक पहुंचे और क्यों बीजेपी ने उन पर इतना बड़ा दांव लगाया है.
1. सादगी और राष्ट्रसेवा: सेना, पुलिस और किसान परिवार का बैकग्राउंड
डॉ. रोहित मिश्रा का बैकग्राउंड किसी रसूखदार राजनीतिक घराने का नहीं, बल्कि एक बेहद अनुशासित, साधारण और संयुक्त किसान परिवार का है. देशसेवा और संस्कार इस परिवार की पहचान रहे हैं:
पिता की पृष्ठभूमि: उनके पिता ने डाक विभाग में सीनियर पोस्टमास्टर के पद पर रहकर लंबे समय तक समाज की सेवा की है.
भाई का फौजी और प्रशासनिक सफर: रोहित के बड़े भाई राहुल मिश्रा ने पहले इंडियन आर्मी में रहकर सीमाओं की रक्षा की. वहां से वीआरएस (VRS) लेने के बाद उन्होंने देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक— PCS क्वालीफाई किया और वर्तमान में मिर्जापुर में तहसीलदार के पद पर तैनात हैं.
पैतृक घर और स्थानीय रसूख: रोहित मिश्रा का संयुक्त परिवार मूल रूप से प्रतापगढ़ की विश्वनाथगंज विधानसभा के अंतर्गत आता है. हालांकि, वर्तमान में उनका पूरा परिवार मीर भवन शहर में रहता है, जो सदर विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है. प्रतापगढ़ की दोनों विधानसभाओं में इस परिवार का अच्छा-खासा सामाजिक प्रभाव है.
1. ‘सड़क से संगठन’ का सफर: क्या है डॉ. रोहित की पूरी टाइमलाइन?
रोहित मिश्रा का राजनीतिक सफर बेहद दिलचस्प और कड़े संघर्षों से भरा रहा है:
2014-15 (ABVP से शुरुआत): रोहित मिश्रा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लेने के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के दामन थामा और छात्र राजनीति में सक्रिय हुए.
अक्टूबर, 2016 (इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के ‘कप्तान’): यह रोहित के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था, जब वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के ‘अध्यक्ष’ चुने गए. अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने छात्रों के मुद्दों पर सीधे यूनिवर्सिटी प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. लाठियां खाईं, आंदोलन किए, जिसने उन्हें पूरे प्रदेश के छात्रों के बीच एक लोकप्रिय और जुझारू चेहरा बना दिया.
2017-18 (राष्ट्रीय पटल पर दस्तक): छात्र राजनीति में उनके इस आक्रामक और कुशल नेतृत्व को देखते हुए संगठन ने उन्हें ABVP का ‘राष्ट्रीय मंत्री’ मनोनीत किया.
2019-20 (युवा मोर्चा में एंट्री): छात्र राजनीति से निकलकर रोहित ने मुख्यधारा की राजनीति में कदम रखा और भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) में सक्रिय भूमिका निभाने लगे.
अगस्त, 2021 (प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी): पार्टी ने उनकी मेहनत को पहचानते हुए उन्हें उत्तर प्रदेश भाजयुमो का ‘प्रदेश उपाध्यक्ष’ बनाया. इस दौरान उन्होंने यूपी के कई जनपदों का तूफानी दौरा किया, जहां उनकी ओजस्वी भाषण शैली को युवाओं का भरपूर प्यार मिला.
आज (प्रदेश अध्यक्ष की कमान): अब, इसी कड़ी मेहनत और संगठन के प्रति अटूट निष्ठा का इनाम देते हुए बीजेपी ने उन्हें युवा मोर्चा का उत्तर प्रदेश का ‘प्रदेश अध्यक्ष’ (कप्तान) नियुक्त कर दिया है.
1. ‘वक्तव्य के धनी’ और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के मुफीद मोहरे
राजनीतिक पंडितों की मानें, तो 2027 के रण से पहले बीजेपी ने रोहित मिश्रा के जरिए एक तीर से कई निशाने साधे हैं:
युवाओं को मोदी-योगी का सीधा संदेश: पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक सामान्य किसान परिवार के युवा को प्रदेश की कमान सौंपकर कार्यकर्ताओं को यह संदेश दिया है कि बीजेपी में सिर्फ काम और काबिलियत की कद्र होती है, किसी रसूख या वंशवाद की नहीं.
ब्राह्मण चेहरा और सर्वसमाज को साधने की कला: डॉ. रोहित मिश्रा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पीएचडी (PhD) होल्डर हैं. वे उत्तर प्रदेश में बीजेपी के एक सुशिक्षित और प्रखर ब्राह्मण चेहरे के रूप में स्थापित हो चुके हैं. लेकिन उनकी सबसे बड़ी यूएसपी (USP) यह है कि वे एक ‘ऑल-एक्सेप्टेड’ (सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाले) नेता हैं. उपाध्यक्ष रहते हुए उन्होंने सभी जातियों के युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाई है.
भाषण शैली का जादू: रोहित मिश्रा अपने तीखे, ओजस्वी और राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत भाषणों के लिए सोशल मीडिया पर भी काफी चर्चित रहते हैं. चुनाव के समय युवाओं को बूथ स्तर तक चार्ज करने के लिए बीजेपी को ऐसे ही एक ‘क्राउड पुलर’ वक्ता की जरूरत थी.
निष्कर्ष: क्या रंग लाएगी यह नई कप्तानी?
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति से सीधे सत्ताधारी दल के सबसे बड़े युवा संगठन के ‘सिंहासन’ तक पहुंचना डॉ. रोहित मिश्रा के जमीनी संघर्ष की गवाही देता है. अब चुनौती बड़ी है— सामने 2027 का महासंग्राम है और युवाओं की टोली को एकजुट रखकर ‘मिशन 2027’ को फतह करना ही इस नए कप्तान की सबसे बड़ी परीक्षा होगी.

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