June 21, 2026

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बांदा 21 जून 26*ये दलित बस्ती आज भी है विकास से दूर, मूलभूत सुविधाएं भी यहां मयस्सर नहीं*

बांदा 21 जून 26*ये दलित बस्ती आज भी है विकास से दूर, मूलभूत सुविधाएं भी यहां मयस्सर नहीं*

*ब्रेकिंग न्यूज बांदा-*

बांदा 21 जून 26*ये दलित बस्ती आज भी है विकास से दूर, मूलभूत सुविधाएं भी यहां मयस्सर नहीं*

यूपीआजतक बांदा से ब्यूरो सुनैना निषाद की रिपोर्ट

बांदा- देश आजादी के बाद से विकास की इबारत लिखने में कीर्तिमान स्थापित कर चुका है, बात करें विकास की तो चौड़ी सड़कों से लेकर देश भर में एक्सप्रेस वे की बाढ़ देखी जा सकती है और मौजूदा निज़ाम नित्य नए कीर्तिमान बनाने का दावा भी कर रहा है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में हाल अभी भी बदहाल ही दिखाई देते हैं।
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के बांदा में अभी भी तमाम ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की अनदेखी देखी जा सकती है, बांदा मुख्यालय से सटे एक गांव में एक पूरी बस्ती आज भी विकास की राह देख रही है और यहां के बाशिंदों को नर्क जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। सरकार और नौकरशाही के दावों का हमने जब जमीनी हकीकत का जायज़ा लिया तो जो तस्वीर निकलकर सामने आई वह यकीनन सरकारी दावों से ठीक उलट दिखाई दी। बांदा के एक गांव की देखिए ज़मीनी हकीकत………

वीओ- सड़क विहीन कीचड़ से लबरेज यह जो क्षेत्र आप तस्वीरों में देख रहे हैं यह चित्रकूट धाम मंडल मुख्यालय बांदा से सटा हुआ गांव मवई बुजुर्ग है और यह इस गांव की वह बस्ती है जहां तकरीबन दो सैकड़ा दलित परिवार निवास करते हैं, इस बस्ती में आप देख सकते हैं कि ना तो पक्की सड़क है और ना ही पानी निकासी के लिए नालियां, जल जीवन मिशन के तहत पूरे बुंदेलखंड की प्यास बुझाने का सरकारी दवा भी यहां काम तोड़ता नजर आता है यहां लोगों के घरों तक नल कनेक्शन भी अभी तक नहीं पहुंचा है और यह लोग दूर से पानी लाने पर मजबूर है खुले में शौच खत्म करने का सरकारी दवा भी इस मवई बुजुर्ग गांव में हवा हवाई दिखाई दिया, यहां गरीबों के लिए शौचालय तक की व्यवस्था ग्राम पंचायत स्तर से नहीं की गई और लोग खुले में शौच करने पर मजबूर होते हैं तो वहीं प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ भी इन परिवारों के लिए महज एक ख्वाब बनकर रह गया है, छोटी-छोटी झोपड़ी और कच्चे मकान को बनाकर किसी तरह यहां पर लोग अपना जीवन यापन कर रहे हैं और बरसात में यह पूरा क्षेत्र दलदल में तब्दील हो जाता है और इसी नरकीय जिंदगी को जीने के लिए यह सैकड़ों परिवार मजबूर है। हालांकि यह कोई नई बस्ती नहीं है बल्कि आजादी के बाद 1962 में इस गांव को बसाया गया था, आधे गांव में तो विकास दिखाई देता है लेकिन जहां से यह दलित बस्ती शुरू होती है वहां विकास को भी आने में मानो परहेज हो गया है, 60 साल से ज्यादा हो चुके लेकिन इस बस्ती की दशा बेहद दयनीय है। बरसात होते ही गांव के इस हिस्से में इंसान तो क्या जानवरों का निकलना भी दूभर हो जाता है सभी मकानों के इर्द-गिर्द जल भराव हो जाता है और इन ग्रामीणों को न सिर्फ आवागमन में बेहद परेशानी होती है बल्कि संक्रामक बीमारियों से भी इन्हें जूझना पड़ता है। अपनी परेशानी को लेकर यहां के निवासियों ने हर मुमकिन कोशिश की है कि उन्हें इस समस्या से छुटकारा मिल सके लेकिन नतीजा शून्य ही हासिल हुआ है। पीड़ित ग्रामीण बताते हैं कि कई बार जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचकर इस बस्ती में नाली और सड़के बनवाने की मांग की है लेकिन हर बार इन्हें सिर्फ मायूसी ही हाथ लगती है। इस दुर्दशा के बीच उनके बच्चों का शादी ब्याह भी होना मुश्किल हो जाता है, गांव की ग्रामीण महिला आशा देवी रोते हुए बताती है कि 28 जून को उसकी बेटी की बारात आनी है लेकिन सड़कों में कीचड़ भरा होने के चलते बरात आने में भी मुश्किल हो रही है और वह दम से रो कर गिर कर फरियाद कर चुकी है लेकिन उनके आंसू बेकार ही गए हैं।
अब देखना होगा कि विकास का दावा करने वाली व्यवस्था इन गरीब असहाय ग्रामीणों की इस परेशानी को कब तक हल करती है।