अयोध्या 22 फ़रवरी 26*झोपड़ी में जिंदगी जीने को विवश, योजनाओं के दावों पर उठते सवाल?
70 वर्षीय बुज़ुर्ग अब भी सरकारी योजनाओं से दूर
“तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है”
“मगर ये आँकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है”
भेलसर(अयोध्या)सूबे के मुखिया का फरमान है कि सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ गांव के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचे। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से अलग तस्वीर बयां कर रही है।
ब्लॉक मवई क्षेत्र के ग्राम पंचायत नेवरा निवासी इस्तियाक अंसारी उम्र लगभग 70 वर्ष आज भी एक छोटी सी पतवार की जर्जर झोपड़ी में जीवन यापन करने को मजबूर हैं। कड़कड़ाती ठंड,झुलसाती गर्मी और बारिश की रात हर मौसम में यही टूटी-फूटी झोपड़ी उनका एकमात्र सहारा है।
उम्र के इस पड़ाव पर जहां उन्हें सरकारी योजनाओं के सहारे सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन मिलना चाहिए था,वहीं वे अब भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित नजर आते हैं। न पक्के आवास की सुविधा मिल सकी है और न ही अन्य जन कल्याणकारी योजनाओं का समुचित लाभ। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इस्तियाक अंसारी जैसे जरूरतमंद व्यक्ति सरकारी सूची से बाहर कैसे रह जाते हैं?
स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही हो या योजनाओं के क्रियान्वयन में शिथिलता — कारण चाहे जो भी हो,लेकिन इसका खामियाजा एक वृद्ध व्यक्ति को भुगतना पड़ रहा है। यह वृद्ध आखिर अपनी फरियाद किसे सुनाए? किसी शायर की यह पंक्तियां उनकी पीड़ा और जिम्मेदार तंत्र की कार्यशैली पर सटीक बैठती हैं—
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आँकड़े झूठे हैं,ये दावा किताबी है
ग्रामीणों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच कर पात्रता के आधार पर योजनाओं का लाभ दिलाया जाए तो ऐसे कई जरूरतमंद लोगों का जीवन बदल सकता है। अब देखना यह है कि संबंधित अधिकारी इस मामले को गंभीरता से संज्ञान में लेकर कोई ठोस कदम उठाते हैं या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
आखिर कब तक झोपड़ी में गुजरेगी बुजुर्ग की जिंदगी? यह सवाल केवल प्रशासन से नहीं, बल्कि उन विकास के दावों से भी है जो कागजों में तो सशक्त दिखते हैं,लेकिन जमीन पर कमजोर साबित हो रहे हैं।

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