March 11, 2026

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बाँदा12दिसम्बर25* सुखारी पुरवा का अंतहीन यातना: आजादी के झूठे वादों और विकास की घिनौनी साजिश में दफन गांव

बाँदा12दिसम्बर25* सुखारी पुरवा का अंतहीन यातना: आजादी के झूठे वादों और विकास की घिनौनी साजिश में दफन गांव

बाँदा12दिसम्बर25* सुखारी पुरवा का अंतहीन यातना: आजादी के झूठे वादों और विकास की घिनौनी साजिश में दफन गांव

**यूपीआजतक बांदा ब्यूरो सुनैना निषाद की रिपोर्ट**

 

बांदा जिले के नरैनी तहसील में छिपा सुखारी पुरवा गांव आजादी के 78 साल बाद भी विकास की क्रूर उपेक्षा का शिकार है, जहां बुंदेलखंड की सूखी मिट्टी पर गरीबी और लाचारी की काली छाया पड़ी हुई है। यह गांव नौगांव पंचायत का मजरा है, लेकिन यहां की हकीकत किसी नर्क से कम नहीं—बारिश में कीचड़ भरी दलदल में तब्दील हो जाता है, जहां एम्बुलेंस का नाम लेना भी पाप है। मरीजों को चारपाई पर लादकर कच्चे रास्ते पर घसीटना पड़ता है, और कई बार यह सफर अस्पताल की बजाय मौत की गोद में खत्म होता है। यह सरकारी तंत्र की घोर विफलता और नेताओं की बेशर्म लापरवाही का जीता-जागता सबूत है, जहां जनता के सपने दफन हो चुके हैं।
ग्रामीणों की चीखें वर्षों से गूंज रही हैं, लेकिन बांदा लोकसभा की सपा सांसद कृष्णा देवी शिवशंकर पटेल और नरैनी विधानसभा की भाजपा विधायक ओममणि वर्मा जैसे नेता सिर्फ वोट की खातिर झूठे वादे बांटते हैं। 2024 में चुनाव जीतने वाली सांसद और 2022 से कुर्सी पर काबिज विधायक ने सुखारी की सुध तक नहीं ली—क्या ये पद सिर्फ सत्ता की लूट के लिए हैं? समस्या की जड़ वन विभाग की सहमति में अटकी है, लेकिन यह बहाना सरकारी भ्रष्टाचार की बदबूदार परतें छिपाता है। अधिकारी फाइलों पर धूल चढ़ाते रहते हैं, जबकि ग्रामीण मौत से जूझते हैं। क्या सरकार का यह विभाग अलग थलग है, या जानबूझकर जनता को ठगा जा रहा है?
बुंदेलखंड की पूरी पट्टी गरीबी, सूखा और बेरोजगारी की चपेट में है, लेकिन सुखारी जैसे गांवों में बुनियादी सुविधाएं—सड़क, बिजली, स्वास्थ्य—एक क्रूर मजाक हैं। 2006 में RTI से कुछ गांवों में बदलाव आया, लेकिन यहां अंधेरा क्यों कायम है? क्या प्रशासन जानबूझकर इन गांवों को पिछड़े रखकर वोट बैंक मजबूत कर रहा है? अगस्त 2025 में बांदा में ग्रामीणों का विरोध प्रदर्शन इस साजिश को उजागर करता है—समस्या जिले भर की है, लेकिन समाधान कहीं नजर नहीं आता। ग्रामीणों ने चुनाव बहिष्कार किया, नारा लगाया “सड़क नहीं तो वोट नहीं”, लेकिन नेता और अधिकारी सिर्फ झूठ बोलकर निकल गए। यह लोकतंत्र नहीं, धोखे का घिनौना बाजार है जहां जनता को अपमान की सौगात मिलती है।
अब सुखारी के निवासी लवकुश पटेल, कैलाश निषाद, संतलाल पटेल, लवकेश पटेल, बिनोद पटेल, जगबंदन पटेल और लल्लू पटेल जैसे लोग धैर्य खो चुके हैं। उन्होंने हर दरवाजे पर माथा टेका, लेकिन अब उग्र आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं—धरना, प्रदर्शन और अदालत तक जाएंगे। 11 सितंबर 2024 को अशोक लाट में भूख हड़ताल की, जहां अपर जिलाधिकारी राजेश कुमार बर्मा ने 3.5 करोड़ का एस्टीमेट और वन विभाग की जमीन हस्तांतरण का झूठा आश्वासन दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। तत्कालीन जिलाधिकारी नागेंद्र प्रताप की कमेटी गुम हो गई, और अब वर्तमान जिलाधिकारी जे रिभा, विधायक ओममणि वर्मा और सांसद कृष्णा देवी शिवशंकर पटेल की जिम्मेदारी है कि वे इस घोर अन्याय को खत्म करें। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्र सरकार अगर अब भी सोते रहे, तो सुखारी का क्रोध पूरे सिस्टम को हिला देगा—यह जनता का जायज विद्रोह होगा, क्योंकि सुखारी पुरवा के ग्रामीणों का कहना है वे हक मांग रहे हैं, न कि भीख।