October 13, 2026

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लखनऊ 12 अक्टूबर 26*महिलाओं को पुलिस ने रोका एलयू गेट नंबर 3 पर हुई विरोध सभा*

लखनऊ 12 अक्टूबर 26*महिलाओं को पुलिस ने रोका एलयू गेट नंबर 3 पर हुई विरोध सभा*

लखनऊ 12 अक्टूबर 26*महिलाओं को पुलिस ने रोका एलयू गेट नंबर 3 पर हुई विरोध सभा*
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👉*महिलाओं के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न के विरोध में प्रदर्शन*

👉*ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों के कथित यौन उत्पीड़न की निंदा*

*लखनऊ।* देशभर में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, यौन उत्पीड़न और भेदभाव की घटनाओं के विरोध में सोमवार को शी स्पीक्स लखनऊ (She Speaks Lucknow) के बैनर तले छात्राओं, महिला कार्यकर्ताओं और नागरिकों ने लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रदर्शन किया। दिल्ली, जमुई, लेडी श्रीराम कॉलेज (LSR) और लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) में सामने आई हालिया घटनाओं के खिलाफ आयोजित इस प्रदर्शन में महिलाओं की सुरक्षा, संस्थागत जवाबदेही और सार्वजनिक जीवन में उनकी स्वतंत्रता के सवाल उठाए गए।

प्रदर्शनकारियों ने दोपहर 2 बजे लखनऊ विश्वविद्यालय के गेट नंबर 3 से परिवर्तन चौक तक विरोध मार्च निकालने का आह्वान किया था। हालांकि, लखनऊ पुलिस ने महिलाओं को गेट नंबर 3 से आगे मार्च करने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने विश्वविद्यालय के गेट पर ही विरोध सभा आयोजित की और महिलाओं के खिलाफ हिंसा, संस्थागत उदासीनता तथा विरोध प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार पर लगाई जा रही पाबंदियों के खिलाफ आवाज उठाई।

विरोध सभा को शी स्पीक्स लखनऊ की संविधा, सीमा, इशिका और वृद्धि; भगत सिंह छात्र मोर्चा (BSM) की आकांक्षा आजाद; तथा अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा) की सरोजिनी बिष्ट और कृष्णा अधिकारी ने संबोधित किया।

वक्ताओं ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा को कुछ अलग-अलग आपराधिक घटनाओं तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। परिवार, शिक्षण संस्थानों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक जीवन में मौजूद पितृसत्तात्मक संरचनाएं महिलाओं के खिलाफ हिंसा और भेदभाव को लगातार बनाए रखती हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उत्पीड़न के मामलों में जवाबदेही तय करने के बजाय अक्सर उन्हीं की आवाजाही, पहनावे, समय और स्वतंत्रता पर पाबंदियां लगा दी जाती हैं। यह व्यवस्था हिंसा के कारणों को समाप्त करने के बजाय महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करती है।

वक्ताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध में दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं के साथ किए गए व्यवहार पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की।

उन्होंने विशेष रूप से 3 अक्टूबर को जंतर-मंतर के पास प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रही तीन महिला पत्रकारों द्वारा दिल्ली पुलिसकर्मियों पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों का उल्लेख किया। इन शिकायतों की जांच दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को सौंपी गई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इन आरोपों का स्वतः संज्ञान लेते हुए 8 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस आयुक्त से दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

देशभर में चल रहे महिलाओं के संघर्षों के प्रति एकजुटता व्यक्त करते हुए सभी सात वक्ताओं ने संयुक्त रूप से कहा हम देशभर में यौन हिंसा, उत्पीड़न और संस्थागत अन्याय के खिलाफ संघर्ष कर रही महिलाओं के साथ पूरी एकजुटता व्यक्त करते हैं। विशेष रूप से दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं के साथ किए गए व्यवहार को लेकर हम गंभीर रूप से चिंतित हैं।

प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रही तीन महिला पत्रकारों द्वारा दिल्ली पुलिसकर्मियों पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोप बेहद गंभीर हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा इनका संज्ञान लिया जाना भी इन आरोपों की गंभीरता को रेखांकित करता है। हम इन मामलों की निष्पक्ष जांच और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हैं।

महिलाओं को राजनीतिक आंदोलनों में हिस्सा लेने, विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्हें इसके लिए हिंसा, उत्पीड़न या डराने-धमकाने का सामना नहीं करना पड़ना चाहिए। पुलिस की जिम्मेदारी इन अधिकारों की रक्षा करना है, न कि इनके इस्तेमाल में बाधा डालना। आज लखनऊ में भी महिलाओं को लैंगिक हिंसा के खिलाफ शांतिपूर्ण मार्च निकालने से रोक दिया गया।

महिलाओं की स्वतंत्रता पर पहरा लगाकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। हम ऐसी सामाजिक व्यवस्था को स्वीकार नहीं कर सकते, जिसमें सुरक्षा के नाम पर महिलाओं की स्वायत्तता सीमित की जाए और अपने अधिकारों के लिए संगठित होने पर उन्हें पाबंदियों का सामना करना पड़े।

हमारा संघर्ष केवल हिंसा से सुरक्षा पाने का नहीं, बल्कि बिना भय के पढ़ने, काम करने, आने-जाने, संगठित होने, विरोध दर्ज कराने और सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी से भागीदारी करने की स्वतंत्रता का संघर्ष है। हम देशभर में पितृसत्तात्मक हिंसा के खिलाफ और अपनी गरिमा, स्वायत्तता तथा लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही महिलाओं के साथ खड़े हैं।

वक्ताओं ने लखनऊ पुलिस द्वारा विरोध मार्च रोके जाने की भी निंदा की। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण ढंग से एकत्रित होने, संगठित होने और राजनीतिक विरोध दर्ज कराने का महिलाओं का अधिकार लैंगिक समानता के व्यापक संघर्ष से अलग नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य और शिक्षण संस्थानों की है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर महिलाओं की आवाजाही, स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

प्रदर्शनकारियों ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा और यौन उत्पीड़न के मामलों में त्वरित एवं निष्पक्ष जांच, शिक्षण संस्थानों में प्रभावी और पीड़िता-केंद्रित शिकायत निवारण व्यवस्था, दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों के कथित यौन उत्पीड़न के मामले में जवाबदेही तय करने तथा शांतिपूर्ण सभा और विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार की रक्षा की मांग की।

विरोध सभा का समापन पितृसत्तात्मक हिंसा, संस्थागत अन्याय और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं पर पाबंदियों के खिलाफ संघर्ष जारी रखने के संकल्प के साथ हुआ। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि महिलाओं को केवल सुरक्षित रहने का ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र होकर जीने का भी अधिकार है। उन्होंने ऐसे समाज के निर्माण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, जहां महिलाएं बिना भय और भेदभाव के पढ़ सकें, काम कर सकें, सार्वजनिक स्थानों पर आ-जा सकें, अपनी असहमति दर्ज करा सकें और सम्मान के साथ जीवन जी सकें।

Taza Khabar