नई दिल्ली 30 सितम्बर 26*फिल्म निर्देशक सनोज मिश्र बलात्कार के झूठे आरोप से पूरी तरह बरी: तीस हजारी कोर्ट ने बंद किया केस, हाईकोर्ट ने भी लगाई थी कड़ी फटकार
नई दिल्ली से संवाददाता विकास जैन की रेपोर्ट यूपीआजतक
नई दिल्ली*फिल्म निर्देशक सनोज मिश्र बलात्कार के झूठे आरोप से पूरी तरह बरी: तीस हजारी कोर्ट ने बंद किया केस, हाईकोर्ट ने भी लगाई थी कड़ी फटकार
फिल्म जगत में उस वक्त बड़ा भूचाल आ गया था जब पिछले साल मार्च के महीने में दिल्ली पुलिस ने जाने-माने फिल्म निर्देशक सनोज मिश्र को दुष्कर्म के गंभीर आरोपों के तहत गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया था। इस सनसनीखेज मामले में अब न्याय की बड़ी जीत हुई है। दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने पूरे मामले की गहन और विस्तृत जांच-पड़ताल के बाद सनोज मिश्र को सभी आरोपों से पूरी तरह दोषमुक्त (Acquit) करार देते हुए केस को हमेशा के लिए बंद करने का आदेश दिया है। इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि निर्देशक को एक सोची-समझी साजिश के तहत फंसाया गया था।
तीस हजारी कोर्ट की विशेष न्यायाधीश श्रेया अरोरा मेहता की अदालत ने पुलिस जांच, केस डायरी और गवाहों के बयानों का सूक्ष्म विश्लेषण करने के बाद पाया कि निर्देशक के खिलाफ लगाए गए तमाम आरोप पूरी तरह बेबुनियाद, तथ्यहीन और दुर्भावना से प्रेरित थे। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे सनोज मिश्र के खिलाफ प्रथम दृष्टया भी अपराध साबित हो सके, लिहाजा उन्हें निर्दोष मानते हुए इस मामले की कानूनी कार्यवाही को पूरी तरह समाप्त किया जाता है।
दिल्ली हाईकोर्ट में सामने आई थी साजिश की सच्चाई
इस कानूनी लड़ाई में सबसे बड़ा मोड़ तब आया था जब यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष पहुंचा। न्यायमूर्ति (जस्टिस) कठपालिया की एकल पीठ में सुनवाई के दौरान कथित पीड़िता ने स्वयं खड़े होकर अदालत के सामने जो बयान दिया, उसने पूरे अभियोजन पक्ष के पैरों तले जमीन खिसका दी थी।
पीड़िता ने खुली अदालत में यह स्वीकार किया कि उसने सनोज मिश्र पर कभी कोई वास्तविक अत्याचार नहीं झेला था, बल्कि उसने शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी के उकसावे और बहकावे में आकर यह फर्जी एफआईआर दर्ज कराई थी। महिला के इस इकबालिया बयान के सामने आते ही यह साफ हो गया कि व्यक्तिगत रंजिश और बदले की भावना से आपराधिक कानून का घोर दुरुपयोग किया गया था।
30 मई 2025 को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस कठपालिया की अदालत ने न केवल सनोज मिश्र को तुरंत नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया, बल्कि व्यवस्था पर प्रहार करते हुए झूठे मुकदमों के बढ़ते चलन पर बेहद तल्ख और गंभीर टिप्पणियां भी की थीं।
’सम्मान की भरपाई असंभव, न्याय प्रणाली से उठता है भरोसा’
दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत याचिका स्वीकार करते हुए अपने विस्तृत आदेश में कहा था कि दुष्कर्म जैसे संवेदनशील और जघन्य अपराधों के झूठे मामलों से न केवल कानून और न्याय प्रणाली का मजाक बनता है, बल्कि इससे आम जनता का न्याय व्यवस्था पर से भरोसा भी डगमगाने लगता है।
अदालत ने बेहद कड़े शब्दों में रेखांकित किया था कि जब किसी प्रतिष्ठित नागरिक पर ऐसे घृणित और झूठे आरोप लगाए जाते हैं, तो समाज और मीडिया में उसकी वर्षों की अर्जित प्रतिष्ठा, सामाजिक प्रतिष्ठा और मान-सम्मान पल भर में धूल-धूसरित हो जाते हैं। जेल की सलाखों के पीछे बेकसूर को जो मानसिक प्रताड़ना और अपमान सहना पड़ता है, उसकी भरपाई किसी भी कीमत पर, किसी भी मुआवजे या माफीनामे से कभी नहीं की जा सकती। झूठे मुकदमों की वजह से वास्तविक पीड़ितों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होने लगते हैं, जो पूरे समाज के लिए बेहद घातक है।
गिरफ्तारी से लेकर बेदाग रिहाई तक का सफर
मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो पिछले साल मार्च में जब दिल्ली पुलिस ने अचानक फिल्म निर्देशक सनोज मिश्र को हिरासत में लिया था, तब मीडिया और फिल्म जगत में भारी हड़कंप मच गया था। निर्देशक के परिजनों और शुभचिंतकों ने शुरुआत से ही इसे एक सुनियोजित साजिश करार दिया था, लेकिन कानूनी प्रक्रियाओं और आरोपों की गंभीरता के कारण उन्हें महीनों तक हिरासत की पीड़ा झेलनी पड़ी।
पुलिस की शुरुआती चार्जशीट और पीड़िता के बयानों के आधार पर केस तेजी से आगे बढ़ा, लेकिन अदालत की दहलीज पर जब सच की कसौटी कसी गई, तो पूरी साजिश की परतें एक-एक कर उधड़ती चली गईं। हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद तीस हजारी कोर्ट ने मामले की अंतिम मेरिट पर सुनवाई की।
अदालत ने पाया:
- कथित पीड़िता के शुरुआती बयानों और बाद के बयानों में भारी विरोधाभास था।
- मामले में साजिशकर्ता के रूप में वसीम रिजवी की संलिप्तता और दुर्भावनापूर्ण इरादे स्पष्ट नजर आए।
- पुलिस द्वारा प्रस्तुत किसी भी फोरेंसिक, डिजिटल या परिस्थितिजन्य साक्ष्य से आरोपों की पुष्टि नहीं हुई।
इन सभी तथ्यों को संज्ञान में लेते हुए जज श्रेया अरोरा मेहता ने इस मुकदमे को हमेशा के लिए दफन कर दिया और फिल्म निर्देशक को पूरी गरिमा के साथ दोषमुक्त कर दिया।
झूठे मुकदमों के खिलाफ नजीर बना फैसला
कानूनी जानकारों का मानना है कि तीस हजारी कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट का यह रुख उन लोगों के लिए एक कड़ा सबक है जो निजी रंजिश, ब्लैकमेलिंग या राजनीतिक व व्यक्तिगत हिसाब-किताब चुकता करने के लिए दुष्कर्म की धाराओं को हथियार बनाते हैं।
फैसले के बाद फिल्म जगत से जुड़े लोगों और निर्देशक के सहयोगियों ने राहत की सांस ली है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है कि अदालतों को ऐसे मामलों में झूठे आरोप लगाने वालों और उनके पीछे बैठे साजिशकर्ताओं के खिलाफ भी सख्त कानूनी कार्रवाई (आईपीसी/बीएनएस की धारा 211 व 182 के तहत) स्वतः संज्ञान लेकर करनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी निर्दोष व्यक्ति का जीवन, करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा षड्यंत्रकारियों की भेंट न चढ़े।
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