मिर्जापुर:15 जून 2026 *विधानसभा घेराव और राजधानी लखनऊ में बड़े प्रदर्शन की चेतावनी*
मिर्जापुर से बसन्त कुमार गुप्ता की रिपोर्ट यूपी आजतक
मिर्जापुर*गांवों में सरकार की योजनाओं को धरातल पर उतारने वाले ग्राम रोजगार सेवकों का धैर्य अब जवाब देता दिखाई दे रहा है। वर्षों से ग्रामीण विकास और मनरेगा योजनाओं का बोझ अपने कंधों पर उठाने वाले प्रदेश के लगभग 36 हजार ग्राम रोजगार सेवकों ने सरकार के सामने 10 सूत्रीय मांगों का पुलिंदा रख दिया है। मांगें पूरी न होने पर 1 जुलाई 2026 को विधानसभा घेराव और राजधानी लखनऊ में बड़े प्रदर्शन की चेतावनी भी दी गई है। ग्राम रोजगार सेवक (पंचायत मित्र) वेलफेयर एसोसिएशन, उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप द्विवेदी के नेतृत्व में मुख्यमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में कहा गया है कि वर्ष 2006 से संविदा पर कार्यरत रोजगार सेवक आज भी नियमित कर्मचारी का दर्जा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विडंबना यह है कि जिन कर्मचारियों के भरोसे गांवों में विकास योजनाएं संचालित होती हैं, उन्हें समय पर मानदेय तक नसीब नहीं हो रहा।
ज्ञापन में दावा किया गया है कि प्रदेश के कई रोजगार सेवकों का 12 से 14 महीने तक का मानदेय बकाया है। ऐसे में परिवार चलाना, बच्चों की पढ़ाई कराना और बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करना मुश्किल हो गया है। संगठन ने आरोप लगाया कि आर्थिक तंगी के कारण कई कर्मचारी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं।
रोजगार सेवकों का कहना है कि प्रदेश में करीब 58 हजार ग्राम पंचायतें हैं, जबकि ग्राम पंचायत और ग्राम विकास अधिकारियों की संख्या लगभग 15 हजार है। यानी एक सचिव के जिम्मे औसतन चार ग्राम पंचायतें हैं। ऐसे में सरकार यदि सहायक सचिव या ग्राम विकास सहायक का पद सृजित कर रोजगार सेवकों को समायोजित कर दे, तो पंचायतों में प्रशासनिक व्यवस्था भी मजबूत होगी और वर्षों पुरानी नियमितीकरण की मांग भी पूरी हो जाएगी। संगठन ने वर्तमान 10 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय को भी अपर्याप्त बताते हुए इसे बढ़ाकर कम से कम 24 हजार रुपये करने की मांग उठाई है। साथ ही ईपीएफ, स्वास्थ्य बीमा, आकस्मिक अवकाश, चिकित्सा अवकाश, स्थानांतरण नीति और मृतक आश्रितों को नौकरी देने की व्यवस्था लागू करने की मांग की है। कि गांवों में विकास योजनाओं की ऑनलाइन मॉनिटरिंग कराने वाले रोजगार सेवकों के पास खुद आधुनिक मोबाइल और डाटा रिचार्ज की सुविधा नहीं है। इसलिए उन्होंने उच्च गुणवत्ता वाले एंड्रॉयड फोन उपलब्ध कराने की भी मांग रखी है। अब देखना यह होगा कि सरकार रोजगार सेवकों की वर्षों पुरानी मांगों पर गंभीरता दिखाती है या फिर गांवों के विकास मशीनरी को चलाने वाले ये कर्मचारी एक बार फिर आश्वासनों की फाइलों में ही उलझकर रह जाएंगे। फिलहाल 1 जुलाई का अल्टीमेटम सरकार और प्रशासन दोनों के लिए चुनौती बनता दिखाई दे रहा है।

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