April 8, 2026

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नोयडा 8 अप्रैल 24*वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत का हरित उत्थान ईरान - इजराईल -अमेरिका तनाव और भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में आत्म निर्भरता की नई इबारत*

नोयडा 8 अप्रैल 24*वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत का हरित उत्थान ईरान – इजराईल -अमेरिका तनाव और भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में आत्म निर्भरता की नई इबारत*

नोयडा 8 अप्रैल 24*वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत का हरित उत्थान ईरान – इजराईल -अमेरिका तनाव और भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में आत्म निर्भरता की नई इबारत*

आलेख – बिनोद कुमार सिंह, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार

विश्व व्यवस्था के वर्तमान दौर में ऊर्जा केवल विकास का ईंधन नहीं, बल्कि सामरिक शक्ति,कूटनीतिक प्रभाव और आर्थिक स्थिरता का मूलाधार बन चुकी है।आज जब पश्चिम एशिया में ईरान,ईराक और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा संतुलन को अस्थिर कर दिया है,तब भारत का नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में विश्व में तीसरे स्थान पर पहुँचना केवल उपलब्धि नहीं,बल्कि एक दूरदर्शी राष्ट्रीय संकल्प की परिणति है।पश्चिम एशिया,जिसे विश्व की ऊर्जा धुरी कहा जाता है,लंबे समय से भू-राजनीतिक संघर्षों का केंद्र रहा है।ईरान और अमेरिका के बीच टकराव, ईरान की आंतरिक जटिलताएँ और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ आज उस स्थिति की ओर संकेत कर रही हैं जहाँ ऊर्जा आपूर्ति किसी भी क्षण बाधित हो सकती है।होर्मुज जलडमरूमध्य, जहाँ से विश्व के एक बड़े हिस्से का कच्चा तेल गुजरता है,इस तनाव का सबसे संवेदनशील बिंदु बन चुका है।यदि इस मार्ग में कोई व्यवधान उत्पन्न होता है,तो उसका सीधा प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा—तेल की कीमतों में उछाल,महँगाई में वृद्धि और विकास की गति में मंदी के रूप में।भारत जैसे उभरते हुए राष्ट्र के लिए यह परिदृश्य एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है। देश की ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा आयातित तेल और गैस पर निर्भर है, इसका प्रमुख स्रोत यही पश्चिम एशिया है।ऐसे में वहाँ की अस्थिरता भारत की आर्थिक स्थिरता को भी प्रभावित कर सकती है।किंतु भारत ने इस चुनौती को केवल संकट के रूप में नहीं देखा,बल्कि इसे अवसर में बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं।पिछले एक दशक में भारत ने अपनी ऊर्जा नीति को पुनर्परिभाषित किया है।जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने और स्वदेशी,स्वच्छ तथा सतत ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने की दिशा में एक व्यापक रणनीति अपनाई गई है।इसी का परिणाम है कि आज भारत नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित क्षमता के मामले में विश्व में तीसरे स्थान पर पहुँच चुका है।केन्द्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी द्वारा प्रस्तुत आँकड़े इस परिवर्तन की गवाही देते हैं।वर्ष 2025-26 भारत के ऊर्जा इतिहास में एक मील का पत्थर बनकर उभरा है।इस वर्ष 55 गीगावॉट से अधिक की गैर- जीवाश्म क्षमता वृद्धि ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब केवल योजनाओं तक सीमित नहीं,बल्कि क्रियान्वयन के स्तर पर भी नई ऊँचाइयाँ छू रहा है।देश की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 274 गीगावॉट से अधिक हो चुकी है, जिसमें सौर ऊर्जा का योगदान सर्वाधिक है।सौर ऊर्जा ने 150 गीगावॉट का आँकड़ा पार कर लिया है, जो इस बात का प्रमाण है कि भारत ने सूर्य की शक्ति को अपनी ऊर्जा रणनीति का केंद्र बना लिया है।पवन ऊर्जा भी इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरी है। 56 गीगावॉट से अधिक की स्थापित क्षमता यह दर्शाती है कि भारत ने अपने प्राकृतिक संसाधनों का प्रभावी उपयोग किया है। इन दोनों स्रोतों – सौर और पवन—का संयुक्त योगदान अब देश के कुल बिजली उत्पादन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।वर्ष 2025-26 में इनसे 276 बिलियन यूनिट से अधिक बिजली उत्पादन हुआ, जो कुल उत्पादन का लगभग 15 प्रतिशत है।यह परिवर्तन केवल आँकड़ों तक सीमित नहीं है,बल्कि यह भारत की ऊर्जा सोच में आए व्यापक बदलाव का प्रतीक है।एक समय था जब भारत की ऊर्जा व्यवस्था कोयला और आयातित तेल पर आधारित थी,लेकिन आज वही व्यवस्था हरित ऊर्जा की ओर अग्रसर है।यह बदलाव न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि आर्थिक और सामरिक दृष्टि से भी अनिवार्य बन चुका है।
भारत ने इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि तब हासिल की जब जून 2025 में उसने अपने कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त कर लिया।यह लक्ष्य पेरिस समझौता के तहत 2030 के लिए निर्धारित था,जिसे भारत ने पाँच वर्ष पहले ही प्राप्त कर लिया। यह उपलब्धि वैश्विक मंच पर भारत की विश्वसनीयता और नेतृत्व क्षमता को और सुदृढ़ करती है।
सरकार की नीतिगत पहलों ने इस परिवर्तन को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।सौर उपकरणों पर करों में कमी, बैटरी निर्माण को प्रोत्साहन, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन जैसी योजनाओं ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र को नई ऊर्जा प्रदान की है। विशेष रूप से ग्रीन हाइड्रोजन, जिसे भविष्य का ईंधन माना जा रहा है,भारत को ऊर्जा निर्यातक देश बनने की दिशा में अग्रसर कर सकता है।ऊर्जा क्षेत्र में यह क्रांति केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है,बल्कि यह रोजगार,निवेश और तकनीकी आत्मनिर्भरता के नए अवसर भी सृजित कर रही है।सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि इस बात का संकेत है कि भारत अब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है।हालाँकि इस विकास यात्रा में कुछ चुनौतियाँ भी हैं। ऊर्जा भंडारण की सीमित क्षमता,ग्रिड अवसंरचना का विस्तार,भूमि अधिग्रहण जैसी समस्याएँ अभी भी सामने हैं।जिस प्रकार भारत ने अब तक इन चुनौतियों का सामना किया है,उससे यह विश्वास मजबूत होता है कि आने वाले समय में इन बाधाओं को भी पार कर लिया जाएगा।
ईरान– इजराईल- अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता किसी भी देश के लिए जोखिमपूर्ण हो सकती है। भारत ने इस सच्चाई को समय रहते समझ लिया और अपनी ऊर्जा नीति को उसी अनुरूप ढाल लिया। यही कारण है कि आज जब विश्व ऊर्जा संकट की आशंका से घिरा हुआ है, तब भारत एक स्थिर और आत्मनिर्भर ऊर्जा मॉडल प्रस्तुत कर रहा है।
निस्संदेह,यह समय ऊर्जा कूटनीति का है,जहाँ संसाधनों का नियंत्रण ही शक्ति का निर्धारण करता है। भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से इस शक्ति को हासिल करने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए हैं।यह केवल वर्तमान की आवश्यकता नहीं,बल्कि भविष्य की अनिवार्यता भी है।
आज भारत का यह हरित उत्थान केवल एक राष्ट्रीय उपलब्धि नहीं, बल्कि वैश्विक समुदाय के लिए एक प्रेरणा है।यह संदेश स्पष्ट है कि यदि इच्छाशक्ति,नीति और तकनीक का समन्वय हो,तो किसी भी संकट को अवसर में बदला जा सकता है।भारत इसी राह पर आगे बढ़ रहा है।जहाँ ऊर्जा आत्म निर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक समृद्धि एक साथ संभव है।

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