नई दिल्ली26जुलाई25*सीपीआई(एमएल) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने जय हिंद कैंप और गुरुग्राम का दौरा किया।
सभी बंदियों को रिहा किया गया, लेकिन न्याय की लड़ाई जारी है।
गृह मंत्रालय का आदेश और मानक संचालन प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए।
25 जुलाई को, सीपीआई(एमएल) के महासचिव कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, पत्रकारों और चिंतित नागरिकों के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए गुरुग्राम का दौरा किया। प्रतिनिधिमंडल ने डिटेंशन सेंटर्स का निरीक्षण किया, प्रभावित मजदूरों और संबंधित अधिकारियों से मुलाकात की।
प्रतिनिधिमंडल में सीपीआई(एमएल) से कल्पना विल्सन, सुचेता डे, आकाश भट्टाचार्य, शायरी मुखोपाध्याय और अन्य; एपीसीआर (एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स) से प्रकृति और तज़ीन; गुरुग्राम से राधा, रूपिंदर और नीता सहित कई लोग शामिल थे।
प्रतिनिधिमंडल का एक भाग गुरुग्राम जाने से पहले वसंत कुंज स्थित जय हिंद कैंप भी गया। दीपंकर भट्टाचार्य ने कैंप के निवासियों से एकजुटता व्यक्त की, जो पिछले दो सप्ताह से बिजली के बिना रह रहे हैं। पहले उन्हें “बांग्लादेशी” कहकर निशाना बनाया गया था और पिछले महीने अतिक्रमण के आरोप में उनकी बिजली काट दी गई।
हालांकि नागरिक समाज, प्रगतिशील मीडिया और राजनीतिक नेताओं के दबाव के चलते बंदियों को रिहा किया गया, लेकिन अधिकारियों ने यह स्पष्ट नहीं किया कि “विदेशी” पहचाने जाने का आधार क्या था।
डीसीपी कार्यालय में यह पुष्टि की गई कि गृह मंत्रालय (एमएचए) के निर्देश पर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया शुरू की गई थी, जो कि इस तरह की पहली कार्रवाई थी। लेकिन यह आदेश न तो सार्वजनिक डोमेन में है और न ही डीसीपी कार्यालय ने इसे प्रतिनिधिमंडल के साथ साझा किया।
अधिकारियों ने इस प्रक्रिया के कानूनी आधार या इसके लिए अपनाई गई मानक संचालन प्रक्रिया के बारे में कोई स्पष्ट और संतोषजनक जानकारी नहीं दी।
प्रतिनिधिमंडल को मजदूरों से बातचीत में यह पता चला कि अधिकांश गिरफ्तारियां plain clothes में आए लोगों द्वारा की गईं, जो स्वयं को पुलिसकर्मी बता रहे थे, लेकिन उनके पास कोई पहचान पत्र या बैज नहीं था, और वे बिना नंबर की गाड़ियों में आए थे। विभिन्न इलाकों से कई लोगों को उठा कर अलग-अलग डिटेंशन या होल्डिंग सेंटर्स में ले जाया गया।
उन्हें नागरिकता साबित करने को कहा गया, लेकिन आधार कार्ड, वोटर आईडी, राशन कार्ड, पैन कार्ड आदि को पर्याप्त नहीं माना गया। कुछ को एक हफ्ते तक थानों में रखा गया, और इस दौरान पुलिस प्रताड़ना, शारीरिक हिंसा तथा यह कहने के लिए दबाव दिया गया कि उनकी बस्ती के कुछ लोग “बांग्लादेशी” हैं, ताकि वे रिहा हो सकें।
हमें बताया गया कि कुछ मामलों में पुलिस ने संबंधित व्यक्ति के मूल राज्य (बंगाल या असम) में उनके पते का सत्यापन किया, लेकिन सत्यापन का कोई प्रमाण पत्र जारी नहीं किया गया, जिससे वे भविष्य में फिर से गिरफ्तारी और उत्पीड़न का शिकार हो सकते हैं।
प्रशासन संदिग्ध लोगों की पहचान मनमाने ढंग से कर रहा है — जैसे बंगाली बोलना, मुस्लिम नाम होना, या मज़दूर बस्ती में रहना। जब अधिकारियों से प्रक्रिया के बारे में सवाल किया गया तो उनका पूर्वग्रह और भेदभावपूर्ण रुख स्पष्ट रूप से सामने आया।
यह मनमानी, बर्बर और गहराई से भेदभावपूर्ण प्रक्रिया हजारों बंगालीभाषी प्रवासी मज़दूरों को संकट में डाल रही है। असम और बंगाल से आए ये लोग आजीविका की तलाश में दिल्ली-एनसीआर आए थे और अब उनके पास लौटने के लिए कुछ भी नहीं बचा।
लेकिन गिरफ्तारी, देशनिकाले और उत्पीड़न के डर से हजारों लोग पलायन कर रहे हैं। उन्हें न तो अपने मालिकों से मदद मिल रही है और न ही मकान मालिकों से। सेक्टर 49 के बंगाली बाज़ार में मज़दूरों ने बताया कि पुलिस ने उन्हें 1 जुलाई तक का समय दिया था, उसके बाद डिटेंशन की धमकी दी गई थी।
सीपीआई(एमएल) उन नागरिकों, प्रगतिशील मीडिया और इंडिया गठबंधन के नेताओं को बधाई देती है जिन्होंने गुरुग्राम में सभी बंदियों की रिहाई सुनिश्चित कराने के लिए जनदबाव बनाया। लेकिन स्थिति अभी भी गंभीर बनी हुई है।
सीपीआई(एमएल) की मांग है कि एमएचए का आदेश और मानक संचालन प्रक्रिया तुरंत सार्वजनिक की जाए। पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए।
सीपीआई(एमएल) सभी मज़दूर यूनियनों, नागरिक संगठनों और राजनीतिक दलों से अपील करती है कि वे एकजुट होकर इस प्रशासनिक मनमानी, भाषायी-धार्मिक भेदभाव और बंगालीभाषी प्रवासी मज़दूरों को नागरिकता से वंचित करने के प्रयास का विरोध करें।
सीपीआई(एमएल) दिल्ली-एनसीआर

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