बाराबंकी09मई24*शहर के दो प्रमुख चौराहों पर लगाए जा रहे अशोक स्तंभ- शासन,संस्कृति और शांति का सबसे बड़ा प्रतीक
बाराबंकी। शहर के दो प्रमुख चौराहों पर अशोक स्तम्भ लगाए जाने की कवायद शुरू हो गई है। जिसमे नाका सतरिख व पल्हरी चौराहा शामिल है। नाका चौराहे पर बुधवार की देर शाम अशोक स्तंभ स्थापित कर दिया गया। यह अशोक स्तंभ वाराणसी के सारनाथ से मिलता है। इसे देखने पर जनपद वासियों को अपने देश के स्वतंत्र अस्तित्व का अहसास होगा। साथ ही अशोक स्तंभ को देखने के लिए उन्हें कई किलोमीटर की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी। जानकारी के मुताबिक इसके लिए बीती जनवरी माह से जिला प्रशासन प्रयास कर रहा था। जो कि अब धीरे-धीरे मूर्त रूप ले रहा है।
*(अशोक स्तंभ का इतिहास)*
यह राष्ट्रीय चिन्ह देश की संस्कृति और स्वतंत्र अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रतीक है। विश्व में भारत की पहचान सुनहरी परंपराओं वाले महान राष्ट्र के रूप में होती है। जिसमें अशोक स्तंभ की बड़ी भूमिका है। संवैधानिक रूप से भारत सरकार ने 26 जनवरी वर्ष 1950 को राष्ट्रीय चिन्ह के तौर पर अशोक स्तंभ को अपनाया गया।इसे शासन,संस्कृति और शांति का भी सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
*(सैकड़ो वर्षों का लंबा इतिहास)*
इसे अपनाने के पीछे सैकड़ों वर्षों का लंबा इतिहास छुपा है। जिसे समझने के लिए आपको 273 ईसा पूर्व के कालखंड में चलना होगा। जब भारत वर्ष में मौर्य वंश के तीसरे राजा….सम्राट अशोक का शासन था। यह वह दौर था जब सम्राट अशोक को एक क्रूर शासक माना जाता था। लेकिन कंलिंग युद्ध में हुए नरसंहार को देखकर सम्राट अशोक को बहुत आघात लगा और वो हिंसा त्यागकर बौद्ध धर्म की शरण में चले गये। जिसके बाद अपने शासन संस्कृति और शांति के प्रतीक को दर्शाने के लिए अशोक स्तंभ को स्थापित किया गया।

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