September 17, 2026

UPAAJTAK

TEZ KHABAR, AAP KI KHABAR

हरिद्वार 16 सितंबर 26*53 साल बनाम 8 महीने — हरिद्वार में विकास की दो तस्वीरें सामने हैं

हरिद्वार 16 सितंबर 26*53 साल बनाम 8 महीने — हरिद्वार में विकास की दो तस्वीरें सामने हैं

हरिद्वार 16 सितंबर 26*53 साल बनाम 8 महीने — हरिद्वार में विकास की दो तस्वीरें सामने हैं 

हरिद्वार से कालूराम जयपुरिया की रिपोर्ट यूपीआजतक 

हरिद्वार, 16 सितंबर 2026। हरिद्वार में विकास कार्यों की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक ओर करीब 53 साल पुराना गंगा सेतु आज भी मजबूती के साथ खड़ा दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर महज आठ महीने पुराने नए पुल की सड़क पर गड्ढे और टूट-फूट दिखाई देने की बात सामने आ रही है। इन दोनों निर्माणों की स्थिति को लेकर स्थानीय स्तर पर तुलना शुरू हो गई है और निर्माण की

गुणवत्ता तथा जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
हरिद्वार से कालूराम जयपुरिया की रिपोर्ट, यूपीआजतक।
2 दिसंबर 1973 को हुआ था गंगा सेतु का शिलान्यास
बताया जाता है कि हरिद्वार के गंगा सेतु का शिलान्यास 2 दिसंबर 1973 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा किया गया था।

इस पुराने पुल को बने हुए लगभग 53 वर्ष हो चुके हैं। इतने लंबे समय के बाद भी पुल का अस्तित्व और उपयोग अपने निर्माण की मजबूती की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
पुराने पुल की मौजूदा स्थिति की तुलना जब हाल के निर्माण से की जाती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पुराने निर्माणों में ऐसी कौन-सी निर्माण पद्धति और गुणवत्ता अपनाई जाती थी, जिससे वे लंबे समय तक टिके रहे।

महज आठ महीने में नए पुल की सड़क पर सवाल
दूसरी ओर, हरिद्वार में नए पुल के निर्माण को अभी लगभग आठ महीने ही हुए हैं, लेकिन उसकी सड़क पर गड्ढे और टूट-फूट दिखाई देने की शिकायत सामने आ रही है।

यदि निर्माण के इतने कम समय बाद ही सड़क की स्थिति खराब होने लगे तो स्वाभाविक रूप से निर्माण की गुणवत्ता, इस्तेमाल की गई सामग्री, तकनीकी मानकों और रखरखाव व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े होते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि किसी भी नए पुल या सड़क निर्माण से जनता को लंबे समय तक बेहतर सुविधा मिलने की उम्मीद रहती है। ऐसे में यदि निर्माण के कुछ ही महीनों बाद मरम्मत की आवश्यकता महसूस होने लगे, तो संबंधित विभाग और निर्माण एजेंसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

53 साल बनाम 8 महीने पुराना निर्माण
हरिद्वार में सामने आई यह तुलना केवल दो पुलों की उम्र का अंतर नहीं है, बल्कि यह निर्माण की गुणवत्ता और टिकाऊपन पर बहस को भी सामने लाती है।

एक तरफ 1973 में शिलान्यास हुआ पुल दशकों बाद भी अपनी उपयोगिता बनाए हुए है, वहीं दूसरी तरफ नए निर्माण में कम समय में सड़क संबंधी समस्या सामने आने की बात कही जा रही है।

आधुनिक दौर में निर्माण तकनीक पहले की तुलना में काफी विकसित हो चुकी है। निर्माण कार्यों में नई मशीनरी, आधुनिक सामग्री और तकनीकी मानकों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में जनता की अपेक्षा भी यही रहती है कि नए निर्माण अधिक मजबूत और लंबे समय तक टिकाऊ हों।

गुणवत्ता और जवाबदेही पर उठ रहे सवाल
नए पुल की सड़क में गड्ढे और टूट-फूट की स्थिति यदि निर्माण से जुड़ी कमी के कारण है, तो इसकी तकनीकी जांच आवश्यक हो सकती है। वहीं यदि इसके पीछे यातायात का अत्यधिक दबाव, जलभराव, मौसम या रखरखाव से संबंधित कोई कारण है, तो संबंधित विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि निर्माण कार्य निर्धारित मानकों के अनुसार हुआ या नहीं और यदि निर्माण में कोई कमी पाई जाती है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। सरकारी धन से तैयार होने वाले किसी भी बड़े सार्वजनिक निर्माण में गुणवत्ता और पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण होती है।

विकास केवल दिखना नहीं, टिकना भी चाहिए
हरिद्वार जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक और पर्यटन शहर में पुलों और सड़कों का मजबूत होना आम लोगों के साथ-साथ बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए भी महत्वपूर्ण है।

किसी भी विकास कार्य का वास्तविक मूल्यांकन उसकी लागत या उद्घाटन से नहीं, बल्कि लंबे समय तक उसकी उपयोगिता और मजबूती से किया जाता है।

53 साल पुराने गंगा सेतु और आठ महीने पुराने नए पुल की स्थिति ने इसी सवाल को सामने ला दिया है कि विकास कार्यों में निर्माण की गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है या नहीं।

पुराना पुल अपने लंबे उपयोग के जरिए टिकाऊ निर्माण का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जबकि नए पुल में बताई जा रही टूट-फूट संबंधित विभागों के सामने गुणवत्ता और जवाबदेही से जुड़े प्रश्न रखती है।

अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित जिम्मेदार विभाग मौके की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करें और यदि निर्माण में तकनीकी कमी सामने आती है तो उसके कारणों को सार्वजनिक किया जाए।

हरिद्वार से कालूराम जयपुरिया की रिपोर्ट, यूपीआजतक।

 

Taza Khabar