लखनऊ 18 अप्रैल 26*उत्तर प्रदेश बिजली विवाद और गहराया प्राइवेटाइजेशन अटकने की नाराजगी उपभोक्ताओं पर निकाली जा रही?*
लखनऊ,– उत्तर प्रदेश में बिजली क्षेत्र की समस्याएं अब चिंता का विषय बन गई हैं। बिना उपभोक्ता की लिखित सहमति के लाखों पोस्टपेड कनेक्शनों को प्रीपेड स्मार्ट मीटर में बदलने, अनुरक्षण (मेंटेनेंस) कार्य को आउटसोर्स करने और संविदा कर्मियों की छंटनी के कारण गर्मी में बिजली कटौती, ट्रांसफार्मर जलने और महंगे बिल का खतरा बढ़ गया है।
*चिनहट निवासी बीजेपी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ नेता अशफाक उल्ला खान ने कहा, “मैंने कभी प्रीपेड मीटर के लिए सहमति नहीं दी। बिना पूछे मेरा कनेक्शन प्रीपेड कर दिया गया।*
*गर्मी में बिजली खपत बढ़ेगी तो रिचार्ज बार बार करने पड़ेंगे नहीं तो भीषण गर्मी में कनेक्शन कट जाएगा। यह गरीब परिवारों पर बड़ा बोझ है।*
उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन में अवैध रूप से विराजमान भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के आदेश पर प्रीपेड मीटर का जबरन बदले गए
राज्य में 84.5 लाख से ज्यादा स्मार्ट मीटर लग चुके हैं, जिनमें से करीब 75.5 लाख बिना लिखित सहमति के प्रीपेड मोड में बदल दिए गए। केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने लोकसभा में स्पष्ट किया कि डिफॉल्ट मोड पोस्टपेड ही रहेगा और इस मोड को चुनना उपभोक्ता की मर्जी पर निर्भर है। परंतु UPPCL के एमडी पंकज कुमार ने एक तानाशाही आदेश जारी किया है कि सभी नये कनेक्शन पर प्रीपेड मीटर ही लगेंगे इसे ही कहते हैं तानाशाही
अब वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग के तहत कई क्षेत्रों में मेंटेनेंस कार्य यानी अनुरक्षण का कार्य प्राइवेट एजेंसियों को आउटसोर्स पर दिए गए हैं। बाराबंकी, मथुरा और मेरठ में मेंटेनेंस का काम पहले ही प्राइवेट हाथों में सौंपा जा चुका है। हालांकि कमर्शियल बिलिंग अभी आउटसोर्स नहीं करे गए है।
वैसे पंकज कुमार जो कि अवैध रूप से विराजमान एमडी पावर कॉरपोरेशन द्वारा ऊर्जा विभाग में आउटसोर्स सेवा निगम के द्वारा संविदाकर्मियों की भर्ती ना करके विभाग द्वारा ही संविदाकर्मियों की भर्ती करने की छूट प्रदान करने का अनुरोध किया गया। इसके संदर्भ में महोदय द्वारा लिखे गए पत्र पर महानिदेशक, आउटसोर्स सेवा निगम आयोग द्वारा स्पष्ट किया गया कि सरकार के इस महत्वाकांक्षी योजना से उक्त छूट केवल मुख्यमंत्री के अनुमोदन के उपरांत ही संभव है। सवाल यह है कि आखिर पंकज कुमार को आउटसोर्स सेवा निगम से संविदाकर्मियों की भर्ती पर क्या आपत्ति है? जिसमें न्यूनतम 18000 का वेतन, मेडिकल एवं अन्य सुविधाएं निहित है। अगर इनके संविदाकर्मियों को बेहतर सैलरी और सुविधाएं मिलती है तो इस पर क्या आपत्ति हो सकती है?
ऊर्जा विभाग में निविदा संविदा कर्मियों को कुशल संविदा कर्मी को लगभग 11500/- और कुशल संविदा कर्मी को लगभग 9500/- रु मिलते हैं, अभी कल ही उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश में न्यूनतम मजदूरी का रेट की अधिसूचना जारी किया है, जिसके अनुसार नगर निगम वाले शहरों मे कुशल कर्मियों 16025/-को और अकुशल कर्मी को 13005/- न्यूनतम मजदूरी निर्धारण किया गया है। जबकि ऊर्जा विभाग के संविदा कर्मी अपने जान को दांव पर लगाकर 24 घंटे बिजली संबंधित अनुरक्षण कार्य करते हैं और तमाम हादसों के शिकार भी होते हैं, उसके बाद भी इन्हें न्यूनतम मजदूरी तक नसीब नहीं हो रहा है। अधिकारियों को उनके न्यूनतम मजदूरी दिलाने की चिंता न होकर इनके टेंडर की और अपने कमीशन की चिंता है।
अभी पूर्वान्चल मे विद्युत बिल वसूल करने वाली फिनटेक कंपनी द्वारा उपभोक्ताओं को फर्जी रसीद देने के घोटाले का खुलासा विभाग के अधिकारियों द्वारा ही किया गया है। जबकि यही राजस्व वसूली पहले विभागीय तकनीशियन कर्मियों से कराया जाता था। सुचारु रूप से चल रहे विद्युत वसूली के इस कार्य को जबरदस्ती फिनटेक कंपनी को दिया गया। यानि जो काम विभाग द्वारा फ्री मे कराया जा रहा था अब उसी काम के लिए फर्म को पैसा दिया जा रहा है और फर्म द्वारा जो घोटाला किया जा रहा है, वो अलग है।
UPPCL के पास वर्तमान में करीब 78,000 आउटसोर्स्ड वर्कर्स हैं, जिनमें से कई सब स्टेशनों के ऑपरेशन और मेंटेनेंस में लगे हुए हैं। संविदा कर्मियों की छंटनी से फील्ड स्टाफ और कम हो गया है और कुछ इनके द्वारा वर्टिकल व्यवस्था लागू करने के बाद छांट दिए गए हैं वैसे कर्मचारी संगठन चेतावनी दे रहे हैं कि गर्मी में लोड बढ़ने पर ट्रांसफार्मर ओवरलोड होकर जलेंगे, लाइन फॉल्ट बढ़ेंगे और रिपेयर में देरी होगी।
प्राइवेटाइजेशन अटका, तो वितरण को तबाह करने की रची जा रही साजिश?
उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन में अवैध रूप से तैनात भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी पूर्वांचल और दक्षिणांचल वितरण निगमों के 42 जिलों में 51/ 49 PPP मॉडल पर प्राइवेटाइजेशन की कोशिश कर रहे हैं। UPERC ने एसेट वैल्यूएशन, लोन और टैरिफ को लेकर कई सवाल उठाए हैं। प्रक्रिया अभी अटकी हुई है। कर्मचारी यूनियन और उपभोक्ता संगठन इसका विरोध कर रहे हैं।
अब उपभोक्ताओं के बीच चर्चा है कि “प्राइवेटाइजेशन फंस रहा है तो IAS अधिकारी और उनके चाहते पूंजीपति लोग अपने चहेते अधिकारियों के द्वारा जानबूझकर व्यवस्था बर्बाद कर रहे हैं? प्रीपेड मीटर + मेंटेनेंस आउटसोर्स + स्टाफ छंटनी = गर्मी में महंगा बिल और कटौती। यह निजीकरण न कर पाने की खीझ नहीं तो क्या है और क्या यह योगी सरकार को बदनाम करने और मुख्यमंत्री बनने की अभिलाषा लिए अंदरूनी साजिश तो नहीं?”
वहीं दूसरी तरफ जनता की चिंता बढ़ रही है गर्मी चरम पर पहुंच रही है मौसम विभाग ने भी भयंकर कर गर्मी पड़ेगी । प्रीपेड मीटर से रिचार्ज का बोझ, प्राइवेट मेंटेनेंस से रिपेयर में देरी और स्टाफ कमी से लंबी कटौती का डर सता रहा है।
फिलहाल लखनऊ में ही आंधी-तूफान के बाद संविदाकर्मियों की कमी की वजह से 22 घंटे बिजली आपूर्ति बाधित रही। इससे पाठक खुद समझ सकते हैं कि मई-जून में गर्मी चरम पर होने की चेतावनी जारी है और उसके बाद उमस भारी बारिश में क्या हाल होगा?
क्या यह IAS अधिकारियों की अनुभवहीनता का जीता-जागता सबूत है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के कुछ अधिकारी नहीं चाहते कि आगामी चुनाव में योगी आदित्यनाथ फिर मुख्यमंत्री बनें क्योंकि कि उनको तो किसी और को ही गद्दी पर बैठाना है समझने वाले समझ गये । खैर

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