बनारस 22 अक्टूबर 26*काशी का विश्व प्रसिद्ध भरत मिलाप: नाटी इमली में जब गले मिले चारों भाई, भाव-विभोर हो उठी धर्मनगरी
विस्तृत समाचार रिपोर्ट
काशी का विश्व प्रसिद्ध नाटी इमली का भरत मिलाप: एक ऐतिहासिक एवं भावात्मक दृश्य
रिपोर्ट: नीलिमा राय, वाराणसी (यूपी आजतक)
https://youtu.be/Z7jc2IuIcA8?si=dBfezhtGaYtc62hm
वाराणसी:मोक्ष की नगरी काशी में विजयादशमी के ठीक अगले दिन एक ऐसा दृश्य जीवंत होता है, जो हर आंख को आंसुओं से भिगो देता है और हृदय को भक्ति व प्रेम के असीम सागर में डुबो देता है। यह अवसर होता है काशी के विश्व प्रसिद्ध ‘नाटी इमली’ मैदान में होने वाले ऐतिहासिक एवं पारंपरिक ‘भरत मिलाप’ का।
विजयादशमी के अगले दिन एकादशी की पावन बेला पर काशी का पूरा वातावरण ‘सियावर रामचंद्र की जय’ और ‘हर-हर महादेव’ के गगनभेदी उद्घोष से गूंज उठता है। चौदह वर्षों के वनवास और लंका विजय के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जब अपने अनुज लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटते हैं, तो भाइयों के मिलन का वह दृश्य केवल एक नाट्य रूपांतरण नहीं रह जाता, बल्कि साक्षात त्रेतायुग की अनुभूति कराता है।
सैकड़ों वर्ष पुरानी ऐतिहासिक परंपरा और यदुवंशियों की भूमिका
नाटी इमली की यह विश्वप्रसिद्ध रामलीला और भरत मिलाप की परंपरा सदियों पुरानी है। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी के शिष्य मेधा भगत द्वारा शुरू की गई इस लीला का स्वरूप आज भी अपनी संपूर्ण दिव्यता और मौलिकता के साथ अक्षुण्ण है। इस ऐतिहासिक आयोजन में यदुवंशियों (यादव समाज) की अत्यंत महत्वपूर्ण और पारंपरिक सहभागिता रहती है। सफेद धोती-बनियान, सिर पर सजी पारंपरिक पगड़ी और आंखों में सुरमा लगाए यादव बंधु पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ भगवान श्रीराम के पुष्पक विमान रूपी रथ को अपने मजबूत कंधों पर उठाकर लीला स्थल तक लाते हैं। यह दृश्य सामाजिक सौहार्द और अटूट भक्ति की मिसाल प्रस्तुत करता है।

काशी नरेश की शाही मौजूदगी और पारंपरिक पूजन
इस ऐतिहासिक मेले का एक अन्य मुख्य आकर्षण काशी नरेश की शाही उपस्थिति है। परंपरा के अनुसार, काशी नरेश (राज परिवार के प्रतिनिधि) अपनी पारंपरिक शाही सवारी और लाव-लश्कर के साथ नाटी इमली मैदान पहुंचते हैं। उनके आगमन के साथ ही जनसमूह में अपार उत्साह छा जाता है। काशी नरेश रथ पर विराजमान प्रभु श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के स्वरूपों का नमन करते हैं, उनकी आरती उतारते हैं तथा परंपरा के अनुसार देव स्वरूपों को दक्षिणा स्वरूप स्वर्ण मुद्राएं (अशर्फियां) भेंट करते हैं।
वे भावुक कर देने वाले 5 मिनट
इस पूरी लीला का चरमोत्कर्ष वह बहुप्रतीक्षित 5 मिनट का समय होता है, जिसका इंतजार लाखों भक्त सांसें थामे करते हैं। समय की सटीकता इस लीला का सबसे बड़ा चमत्कार है। जैसे ही अस्ताचलगामी सूर्य की अंतिम किरणें मैदान के एक निश्चित स्थान पर पड़ती हैं, ठीक उसी क्षण भरत और शत्रुघ्न अपने अग्रजों के स्वागत में जमीन पर साष्टांग लेट जाते हैं।
विमान से उतरकर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण दौड़ते हुए आते हैं और अपने दोनों अनुजों को उठाकर छाती से लगा लेते हैं। चारों भाइयों के इस दिव्य आलिंगन, परस्पर अश्रुधारा और असीम भ्रातृ-प्रेम को देखकर मैदान में उपस्थित लाखों श्रद्धालुओं के नेत्र सजल हो उठते हैं। चारों तरफ से पुष्पों की भारी वर्षा होने लगती है, नगाड़ों की गूंज और भक्तों के जयकारों से संपूर्ण आकाश गुंजायमान हो जाता है।
भरत मिलाप का यह अलौकिक दृश्य न केवल पारिवारिक प्रेम और मर्यादा का संदेश देता है, बल्कि काशी की सनातन संस्कृति, लोक आस्था और परंपरा का एक सजीव प्रमाण बनकर हर वर्ष जनमानस को भाव-विभोर कर जाता है।
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