नई दिल्ली ४ जनवरी २६ * मार्क्सवादी होने की एक बुनियादी शर्त। ..
*मार्क्सवादी होने की एक बुनियादी शर्त यह भी है कि आपने मार्क्सवाद पढ़ा हो, कम से कम उसके बुनियादी सिद्धांतों से परिचित हों, कम से कम बुनियादी मार्क्सवादी क्लासिक्स से परिचित हों !*
यह और बेहतर होगा कि आप मार्क्सवाद के अमल के अतीत के अनुभवों से, यानी सर्वहारा क्रांतियों के इतिहास से भी परिचित हों !
इसके बिना, मार्क्सवाद के नाम पर अटकलपच्चू, और सुनी-सुनाई बातें करके आप लोगों को कंफ्यूज करते हैं, मार्क्सवादी विज्ञान का अवमूल्यन करते हैं और अगर व्यवहार में उतरते भी हैं तो आपकी दशा बिना पतवार वाले नाविक की होती है I आप जैसे लोग खुद को कम्युनिस्ट भी कहते हैं और बुर्जुआ प्रचार तंत्र के कम्युनिज्म-विरोधी दुष्प्रचार और कथित मार्क्सवादी अकादमीशियनों के छद्म-मार्क्सवाद के चपेट में भी जल्दी आ जाते हैं !
‘मार्क्सवाद कर्मों का मार्गदर्शक सिद्धांत है !’ –आप इस सिद्धांत को जाने बिना न तो सही पद्धति और दिशा के साथ क्रांतिकारी व्यवहार में उतर सकते हैं, न ही मार्क्सवाद और संशोधनवाद के बीच का फर्क समझ सकते हैं !
जो तमाम नकली मार्क्सवादी दल हैं, उनकी कतारों को देखिये ! वे न तो द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद के बारे में कुछ जानते हैं, न मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के बारे में, न पार्टी और राज्य के मार्क्सवादी सिद्धांतों के बारे में, न ही सर्वहारा क्रान्ति की रणनीति और आम रणकौशल के बारे में, न किसान और भूमि-प्रश्न विषयक मार्क्सवादी चिंतन के बारे में और न ही समाजवाद की प्रकृति और समस्याओं के बारे में ! दोष कतारों का नहीं होता I नेतृत्व उन्हें इन सारी चीज़ों की शिक्षा ही नहीं देता I अगर वे ऐसा करने लगेंगे तो उनका छद्म नंगा हो जाएगा और ये पार्टियाँ बिखर जायेंगी, क्योंकि कार्यकर्ताओं का बड़ा हिस्सा ईमानदार होता है और क्रान्ति की बात सोचकर ही पार्टी में आता है I धीरे-धीरे एक गलत राजनीतिक प्रणाली और संस्कृति के प्रभाव में आकर भ्रष्ट और कैरियरवादी होता जाता है या निराश होकर अपनी ज़िंदगी और कैरियर के चरखे में लग जाता है I कुछ ऐसे भी कार्यकर्ता होते हैं जो क्रान्ति की चुनौतियों के बारे में कुछ नहीं जानते, वे छद्म-मार्क्सवादी पार्टियों का आचरण देखकर खुद कैरियरवादी महत्वाकांक्षाओं के साथ ही पार्टी में आते हैं I ऐसे कई महानुभाव आपसे ऐसे विषयों पर बहस करने लगते हैं, जिस विषय पर कोई मार्क्सवादी लेखन उन्होंने पढ़ा ही नहीं है I थोड़ी देर कठदलीली और अनडब्बू अनुभववादी बातें करने के बाद वे तोहमतबाज़ी और लेबल लगाने पर आ जाते हैं ! फिर तो अपना सिर धुनने के अलावा आपके पास कोई चारा नहीं रह जाता I
यह एक गंभीर समस्या है I इसका उपाय एक ही है ! समाज के उन्नत-चेतस तत्वों के बीच से, विशेषकर युवाओं के बीच से नयी क्रांतिकारी भरती करनी होगी और मज़दूरों, छात्रों-युवाओं, स्त्रियों और गाँव के गरीबों के मोर्चों पर ज़मीनी काम के प्रशिक्षण के साथ ही इन लोगों को लेकर मार्क्सवादी अध्ययन-मण्डलों का बहुसंस्तरीय जाल बिछा देना होगा, मार्क्सवाद की शिक्षा की नयी संस्थाएँ विक्सित करनी होगी और मध्यवर्गीय अराजकतावाद, “खानाबदोश बौद्धिक क्रांतिकारिता” और पल्लवग्राही “मुक्त चिंतन” की प्रवृत्तियों से अहर्निश संघर्ष करते हुए उन्नत-चेतस, बहादुर युवाओं के बीच एक गंभीर बौद्धिक माहौल का निर्माण करना होगा ! जाहिर है, ये काम बुनियादी वर्गों के बीच ज़मीनी कामों के साथ-साथ ही किये जा सकते हैं !
इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं है I जो पुराने “बौद्ध भिक्षु” अपने-अपने मठ चलाते हुए, “जबतक जीवन है, घंटा डोलाते रहेंगे” के सिद्धांत पर अमल कर रहे हैं, हम उनको पूरीतरह अपने हाल पर छोड़ देते, लेकिन जब वे अपने तरह-तरह के संसदवादी, अर्थवादी, अराजकतावादी संघाधिपत्यवादी, लोकवादी, कौमवादी, अस्मितावादी आदि भटकावग्रस्त कूड़ा विचारों को नए युवाओं ,कम समझदार लेकिन ईमानदार बौद्धिकों और मज़दूरों के एक उन्नत संस्तर के दिमाग में उड़ेलने की कोशिश करते हैं, तो हमें उनके विरुद्ध वैचारिक युद्ध का, पोलिमिक्स का मोर्चा खोलना ही पड़ता है I बहरहाल, इससे भी एक लाभ ही होता है और जो भी गंभीर पाठक होता है, उसकी विभिन्न मुद्दों पर अच्छी शिक्षा हो जाती है और उसे पता चल जाता है कि वैज्ञानिक दृष्टि से कौन सही है और कौन गलत ! रही बात कुछ मूढ़मति, अनुभववादी, अतिभावुक, अंधपक्षधर भक्त जनों की, तो उन्हें तो साक्षात् आचार्य वृहस्पति और शुक्राचार्य भी मिलकर नहीं समझा सकते ! तुलसीदास ने कम से कम यह बात तो ठीक ही कही है :
“फूलहिं-फलहिं न बेंत जदपि सुधा बरसें जलद
मूरख हृदय न चेत जदि गुरु मिलहिं बिरंचि सम I”
✍️ कविता कृष्णपल्लवी

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