झाँसी 29दिसम्बर 25*अरावली संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान20 नवंबर के आदेश पर रोक, न्याय अधिकार चौपाल भारत ट्रस्ट ने जताया आभार*
झांसी। अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए मामले पर पुनः विचार शुरू कर दिया है। यह संज्ञान न्याय अधिकार चौपाल भारत ट्रस्ट की ओर से 10 दिसंबर 2025 को भेजे गए पत्र के क्रम में लिया गया, जिसमें अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण से संबंधित प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर पुनः विचार किए जाने की प्रार्थना की गई थी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की स्पष्ट, वैज्ञानिक और व्यापक परिभाषा को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की तथा केंद्र सरकार से कई तकनीकी, पर्यावरणीय और कानूनी प्रश्नों पर विस्तृत जवाब तलब किया। न्यायालय ने इस प्रकरण में 20 नवंबर को पारित पूर्व आदेश पर अंतरिम रूप से रोक लगा दी है। साथ ही, अरावली के पर्यावरणीय, भू-वैज्ञानिक और कानूनी पहलुओं के समग्र अध्ययन हेतु एक हाई पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी गठित करने का प्रस्ताव भी रखा है।
कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि अरावली पर्वतमाला मात्र पहाड़ियों का समूह नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन, भूजल संरक्षण, जैव विविधता और जलवायु सुरक्षा की आधारशिला है। ऐसे में इसके संरक्षण से जुड़े निर्णय अत्यंत सावधानी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक दायित्व के साथ लिए जाने आवश्यक हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के इस हस्तक्षेप का न्याय अधिकार चौपाल भारत ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने स्वागत करते हुए न्यायालय के प्रति आभार व्यक्त किया है। ट्रस्ट के अध्यक्ष एडवोकेट बी.एल. भास्कर ने कहा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय का यह कदम पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक और दूरदर्शी है। उन्होंने कहा कि अरावली पर्वतमाला उत्तर भारत की जीवनरेखा है और इसकी परिभाषा को सीमित करना या संरक्षण के दायरे से बाहर करना भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय संकट को जन्म दे सकता है।
एड. भास्कर और नरेन्द्र कुशवाहा (पर्यावरण कार्यकर्ता) ने केंद्र सरकार से अपेक्षा जताई कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए सभी तकनीकी, वैज्ञानिक और कानूनी प्रश्नों का निष्पक्ष एवं ईमानदारी से उत्तर देगी। उन्होंने हाई पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी के गठन के प्रस्ताव को स्वागतयोग्य बताते हुए कहा कि इससे तथ्यों और विशेषज्ञों की राय के आधार पर अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को कानूनी मजबूती मिलेगी।
नरेन्द्र कुशवाहा ने विश्वास व्यक्त किया कि आगामी सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट अरावली पर्वतमाला की स्पष्ट, व्यापक और वैज्ञानिक परिभाषा तय करते हुए इसके संरक्षण के लिए सख्त और प्रभावी दिशा-निर्देश जारी करेगा, जिससे अवैध खनन, अतिक्रमण और पर्यावरणीय क्षरण पर निर्णायक रोक लग सकेगी।
उल्लेखनीय है कि इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी को निर्धारित की गई है। पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों की निगाहें इस सुनवाई पर टिकी हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख न केवल अरावली क्षेत्र बल्कि पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण के संघर्ष को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।

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