एटा3अगस्त25*सजा दो लेकिन इस तरह से नहीं की किसी की जान ले लो*शक करो लेकिन किसी को बर्बाद नहीं*
एटा*यह तस्वीर सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आइना है जो इंसाफ के नाम पर लोगों की जान ले रहा है। एक बहन अपने मासूम भाई की लाश के पास बिलख रही है। कुछ ही दिन बाद रक्षाबंधन है, अब वह किसकी कलाई पर राखी बांधेगी? क्या उसका भाई अब कभी लौटेगा?
खाट पर बेसुध पड़ा यह लड़का है सत्यवीर। उम्र सिर्फ 17 साल। एटा के निधौलकला थाने के चंद्रभानपुर गांव का रहने वाला था। नौकरी के लिए जयपुर गया था। मार्च में एक लड़की लापता हुई और शक उस पर गया। कोई सबूत नहीं, सिर्फ शक। पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया। परिवार ने जयपुर से बुलाकर बेटे को थाने भेजा। 1 अगस्त को उसका भाई उसे लेकर पहुंचा।
आरोप है कि थाने में दरोगा सुरेंद्र यादव, आसिफ अली और सिपाही पुष्पेन्द्र, दिलीप समेत कई पुलिसकर्मियों ने उसे एक कमरे में ले जाकर बर्बरता से पीटा। और अब, सत्यवीर की लाश गांव के खेतों में पड़ी मिली है। उसके शरीर पर गंभीर चोटों के निशान हैं।
क्या ये वही कानून है जो हर नागरिक को सुरक्षा देने का वादा करता है? क्या इसी के भरोसे देश चलता है? क्या 16 साल की उम्र में सिर्फ शक के आधार पर किसी को मार डालना न्याय है?
यह कोई इकलौती घटना नहीं है। याद कीजिए, 2021 में कासगंज में एक नाबालिग लड़की की गुमशुदगी के केस में 22 साल के अल्ताफ को थाने बुलाया गया। उसके पिता साथ में थे। वहां उसकी जमकर पिटाई हुई और बाद में उसकी लाश थाने की हवालात में लटकती मिली। पुलिस ने कहा उसने आत्महत्या कर ली। पर क्या वाकई?
यूपी में ऐसे नामों की लिस्ट लंबी होती जा रही है-
लखनऊ में मोहित पांडे
गोरखपुर में मनीष गुप्ता
आगरा में राजू गुप्ता
प्रयागराज में हीरालाल और लवकेश शर्मा
बागपत में साजिद
सीतापुर में राजू
नोएडा में योगेश
ये सभी लोग पुलिस कस्टडी या कथित पिटाई के शिकार बने।
2018 में आगरा में हुई राजू गुप्ता की मौत की सीआईडी जांच में 17 पुलिसकर्मी अवैध हिरासत और गैर इरादतन हत्या के दोषी पाए गए।
गूगल कर लीजिए। भारत में पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के आंकड़े सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश से आते हैं।
सवाल यह कि अगला सत्यवीर कौन?

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