January 13, 2026

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वाराणसी 8 जनवरी 26 * हंसराज विश्वकर्मा लगातार तीसरे कार्यकाल से बनारस के जिलाध्यक्ष। ..

वाराणसी 8 जनवरी 26 * हंसराज विश्वकर्मा लगातार तीसरे कार्यकाल से बनारस के जिलाध्यक्ष। ..

वाराणसी 8 जनवरी 26 * हंसराज विश्वकर्मा लगातार तीसरे कार्यकाल से बनारस के जिलाध्यक्ष। ..

➡️ *बनारस में बीजेपी के विकल्पहीनता का क्या है राज… दो पद तीन कार्यकाल से हैं हंसराज !*

देश की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी बनारस में आज जिस बेचारगी और विकल्पहीनता की स्थिति में दिखाई दे रही है, वह कई सवाल खड़े करती है। वही बनारस जिसका प्रतिनिधित्व स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते हैं, वहां पार्टी अपने ही घोषित सिद्धांत “एक व्यक्ति एक पद” की खुली अनदेखी करती नजर आ रही है।

हंसराज विश्वकर्मा लगातार तीसरे कार्यकाल से बनारस के जिलाध्यक्ष हैं। इतना ही नहीं, उन्हें एमएलसी बनाकर नेतृत्व ने उनके कद को और ऊंचा किया, लेकिन जिलाध्यक्ष का पद यथावत बनाए रखा। जबकि पार्टी समय-समय पर कहती रही है कि संगठन और सरकार में एक व्यक्ति को एक ही जिम्मेदारी दी जाएगी। प्रदेश के कई जिलों में जिलाध्यक्ष बदले गए, कई मंत्रियों और पदाधिकारियों ने “एक व्यक्ति एक पद” के सिद्धांत के तहत एक पद छोड़ा, जैसे बिहार में पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद दिलीप जायसवाल ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया, गुजरात और अन्य राज्यों में भी ऐसे उदाहरण सामने आए, मगर बनारस इस सिद्धांत का अपवाद बना हुआ है। इससे कार्यकर्ताओं में निराशा और असंतोष स्वाभाविक है।मैं यह नहीं कह रहा कि हंसराज अयोग्य हैं या उनकी कार्यशैली खराब है, लेकिन सवाल यह है कि क्या बनारस जैसे बड़े जिले में उनसे बेहतर या उनके बराबर कोई दूसरा कार्यकर्ता नहीं है।

यही तो वह स्थिति है जिसे चिराग तले अंधेरा कहा जाता है। हंसराज विश्वकर्मा का राजनीतिक अतीत भी सभी जानते हैं, कल्याण सिंह के साथ पार्टी छोड़ना, कैंट से चुनाव लड़ना और हारना, फिर वापसी के साथ पुनः मजबूत होना। उनके जिलाध्यक्ष रहते कई प्रदेश अध्यक्ष बदले, सरकारें बदलीं, मगर बनारस का जिलाध्यक्ष नहीं बदला। ओबीसी कोटे से तीन बार जिलाध्यक्ष और फिर एमएलसी बनने के बाद भी पद पर बने रहना सामान्य औऱ पुराने कार्यकर्ताओं निराशा गहरा कर रहा है, खासकर सवर्ण वर्ग के कार्यकर्ताओं में यह भावना गहरी है कि उन्हें जानबूझकर हाशिये पर रखा जा रहा है। सत्ता में होने के कारण विरोध खुलकर नहीं दिखता, वरना असंतोष का बिगुल कब का बज चुका होता। एक व्यक्ति एक पद की बात करने वाली पार्टी बनारस में उसी सिद्धांत को लागू करने में असफल दिख रही है। आखिर ऐसा क्या कारण है कि हंसराज विश्वकर्मा के सामने पूरी पार्टी बेबस, लाचार और विकल्पहीन नजर आती है। वजह जो भी हो, सच यही है कि बनारस में बीजेपी अपने ही सिद्धांतों को ताक पर रखकर चल रही है।

विनय मौर्या
बनारस
की कलम से साभार