भागलपुर 7 अप्रैल 26*राजा परीक्षित के जन्म की दिव्य कथा: आस्था और ज्ञान का अद्भुत संगम*
भागलपुर बिहार से शैलेन्द्र कुमार गुप्ता
भागलपुर श्रीमद् भागवत महापुराण की अलौकिक और दिव्य कथाओं में राजा परीक्षित का जन्म विशेष महत्व रखता है यह कथा केवल एक राजकुमार के जन्म की नहीं, बल्कि भगवान की कृपा, धर्म की रक्षा और मानव जीवन के गूढ़ संदेशों को प्रकट करती है राजा परीक्षित पांडव वंश के उत्तराधिकारी थे और उनके जीवन की शुरुआत ही चमत्कारों से भरी हुई थी महाभारत युद्ध के पश्चात जब पांडवों का वंश संकट में था, तब अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु पर अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया यह अस्त्र गर्भ में पल रहे शिशु को नष्ट करने के लिए छोड़ा गया था उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य सुदर्शन चक्र से गर्भ की रक्षा की और उस बालक को जीवनदान दिया। यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुए ‘परीक्षित’ नाम का अर्थ है ‘परीक्षा लेने वाला’ कहा जाता है कि जन्म के बाद से ही वे हर व्यक्ति में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करने का प्रयास करते थे, क्योंकि उन्होंने गर्भ में ही भगवान के दिव्य रूप का अनुभव किया था। इस कारण उनका नाम परीक्षित रखा गया। राजा परीक्षित ने अपने जीवन में धर्म, न्याय और सत्य का पालन किया। उनके शासनकाल में प्रजा सुखी और संतुष्ट थी। उनके जीवन की कथा यह सिखाती है कि ईश्वर की कृपा से असंभव भी संभव हो सकता है और सच्चे धर्म का पालन ही जीवन का सर्वोत्तम मार्ग है। इस प्रकार, राजा परीक्षित की जन्म कथा हमें आस्था, भक्ति और धर्म के महत्व का संदेश देती है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन काल में था।

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