लद्दाख29सितम्बर25*प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की गिरफतारी पर डीपीएफ का बयान
लद्दाख*हम लद्दाख में हाल के जनता के न्यायोचित आंदोलनों पर हुए दमन के दौरान मारे गए युवाओं के प्रति हार्दिक संवेदना जाहिर करते हैं। साथ ही प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक और अन्य युवाओ की गिरफ्तारियों की कड़ी निंदा करते हैं। एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह के न्यायोचित और शांतिपूर्ण आंदोलन पर ऐसी कार्रवाईयां बढ़ते फासिस्ट रवैये और घटते लोकतांत्रिक स्पेस की परिचायक हैं। यह न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों पर हमला हैं, बल्कि क्षेत्रीय शांति, न्याय और नागरिक स्वतंत्रता के लिए गहरी चिंता का विषय भी है।
24 सितम्बर, 2025 को लद्दाख में गोलीबारी में 4 लोगों की मौत हुई और करीब 80 लोग घायल हुए। यहाँ पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक सितम्बर 2025 से पहले भी दो बार अनशन कर चुके हैं—मार्च 2024 में 21 दिन का अनशन और अक्टूबर 2024 में 16 दिन की भूख हड़ताल। एक माह की पदयात्रा के बाद जब वे 150 साथियों के साथ 1 अक्टूबर, 2024 को दिल्ली में प्रवेश कर रहे थे, तो उन्हें दिल्ली के सिंधू बॉर्डर पर गिरफ्तार कर लिया गया था।
पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की माँगें पूरी तरह लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ी हैं। लद्दाख के लोग अपनी विधानसभा की बहाली की माँग कर रहे हैं, जो 2019 में उनसे छीन ली गई थी। लद्दाख की अधिकांश आबादी आदिवासी समुदायों से आती है, इसलिए वे छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की माँग भी कर रहे हैं। पहले उनकी ज़मीन और संसाधन अनुच्छेद 370 के तहत सुरक्षित थे। अब लोगों को डर है कि बाहरी कंपनियाँ और पूंजीपति लद्दाख की भूमि, जल और खनिज संसाधनों पर कब्ज़ा कर लेंगे। युवाओं में बेरोज़गारी दर लगातार बढ़ रही है। वहाँ बेतहाशा सड़कों, हवाई अड्डों और बड़े-बड़े निर्माण कार्यों को पर्यटन के नाम पर आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसे लद्दाख के लोग पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के लिए गंभीर खतरे के रूप में देख रहे हैं।
लोकतांत्रिक माँगों की अनदेखी केंद्र सरकार के अड़ियल रुख को दर्शाती है। 24 सितम्बर की हिंसा से 15 दिन पहले से लोग अनशन पर बैठे थे और उनकी तबीयत बिगड़ रही थी। ऐसे में जनता का आक्रोशित होना स्वाभाविक था। लेकिन इस आक्रोश को जिस तरह शासन-प्रशासन को संभालना चाहिए था, उसमें वे पूरी तरह विफल रहे। लोगों की संवैधानिक माँगों और आक्रोश का जवाब गोलियों से देना एक आपराधिक कार्रवाई है।
लद्दाख ने हमेशा से शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक विविधता की मिसाल पेश की है। ऐसे में हिंसा फैलाना और नागरिक समाज की आवाज़ को दबाना अस्वीकार्य है। सोनम वांगचुक ने लगातार पर्यावरण संरक्षण, हिमालयी पारिस्थितिकी और लद्दाख के लोगों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन और अनशन का सहारा लिया। बावजूद इसके, उनकी माँगों की अनदेखी की गई और उन्हें गिरफ्तार कर लोकतांत्रिक असहमति को दबाने की कोशिश की गई। यह रवैया बेहद निंदनीय और अलोकतांत्रिक है। सोनम वांगचुक को पाकिस्तान और बांग्लादेश यात्राओं को लेकर देशद्रोही ठहराने की कोशिश करना बेहद शर्मनाक है। इस तरह के प्रोपेगेंडा के ज़रिए आंदोलन को बदनाम करना घातक है।
हम सरकार और प्रशासन से माँग करते हैं कि:
1. लद्दाख हिंसा की निष्पक्ष और त्वरित जाँच कर दोषियों को सख्त सज़ा दी जाए।
2. पीड़ित परिवारों को तत्काल सहायता और मुआवज़ा दिया जाए।
3. गिरफ्तार लोगों को तुरंत रिहा किया जाए।
4. पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक पर से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून हटाया जाए और उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
5. लद्दाख की सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय एकता को बनाए रखने के लिए सभी समुदायों और जन संगठनों के बीच संवाद सुनिश्चित किया जाए।
6. स्थानीय जनता की लंबे समय से चली आ रही माँगों को गंभीरता से सुना और समाधान किया जाए।
हम सभी नागरिकों, सामाजिक संगठनों, न्याय पसंद लोगों और राजनीतिक दलों से अपील करते हैं कि वे मिलकर लद्दाख के लोगों को न्याय दिलाने के लिए आगे आयें और शांति, सद्भाव का माहौल बनाए रखने में सहयोग करें।
लद्दाख के साथ साथ पिछले दिनों हमने असम में और बाद में उत्तराखंड में अपने न्यायोचित मांगों के लिए युवाओं को सड़को पर उतरते देखा है। हम ऐसे किसी भी आंदोलन के दमन का विरोध करते हैं और संबधित सरकारों से इन समस्याओं के यथोचित निराकरण की मांग करते हैं। यह तो मानी हुई बात है की दमन किसी समस्या का समाधान नहीं है।
डेमोक्रेटिक पिपुल्स फ्रंट (DPF)
दिनांक 29-09-2025

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