कानपुर09जुलाई23* नई शिक्षा नीति समस्याओं और चुनौतियों पर हुई चर्चा- सीएसजेएमयू में दूसरे दिन शिक्षा मंथन में विशेषज्ञों ने रखे विचार
सीएसजेएमयू
कानपुर। सीएसजेएमयू में आयोजित दो दिवसीय शिक्षा मंथन-2023 के दूसरे दिन रविवार को नई शिक्षा नीति समस्याओं और चुनौतियां विषय पर विशेषज्ञों ने विचार रखे। वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई सभागार में आयोजित कार्यक्रम में विशेष कार्याधिकारी डॉ. पंकज एल जानी ने 2021 से शिक्षण संस्थानों द्वारा NEP और CBCS के कार्यान्वयन में किए गए प्रयासों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में क्रेडिट ट्रांसफर, एकाधिक प्रवेश और निर्गम विकल्प, चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम, डिप्लोमा डिग्री, स्नातकोत्तर कार्यक्रम और सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का सम्मिलन मुख्य ध्येय क्षेत्रों में थे।
डॉ. जानी ने कहा कि राज्य विश्वविद्यालयों को प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों के मुकाबले संसाधन संकट, अध्यापक की कमी और सीमित बुनियादी ढांचे जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसे दूर करने की आवश्यकता है। तकनीकी शिक्षा से संबंधित मुद्दों पर ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE), नई दिल्ली के अध्यक्ष, डॉ. टीजी सीथाराम ने प्रकाश डाला। उन्होंने सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली मूल्यांकन प्रणाली और परख टूल पर जोर दिया। डॉ. सीथाराम ने क्रेडिट ट्रांसफर तंत्र और डिजिटल साक्षरता की महत्वपूर्णता पर भी जोर दिया। इसके अलावा, डॉ. सीथाराम ने एआईसीटीई टीचिंग एंड लर्निंग अकादमी के बारे में जानकारी साझा की, जिसका उद्देश्य विभिन्न राज्यों में शिक्षकों को प्रशिक्षण देना है। उन्होंने एआईसीटीई द्वारा आरंभ की गई आगामी परियोजनाओं की भी जानकारी दी। जो संबंधों को प्रोत्साहित करने, शिक्षकों और छात्रों दोनों को प्रशिक्षण प्रदान करती है।
सत्र का समापन दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के उपाध्यक्ष और तकनीकी शिक्षा, उच्चतर शिक्षा और मेडिकल शिक्षा के विशेष सचिव, प्रो. योगेश सिंह ने किया। उन्होंने चुनौतियों के बारे में बात की। प्रो. सिंह ने पाठ्यक्रम अद्यतन, व्याख्याता भर्ती, और रिक्त पदों के निर्माण की महत्वता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि समग्र रूप से, उच्च शिक्षा संस्थानों और छात्रों के उन्नयन के लिए शिक्षा अनुदान आयोग (UGC) को शिक्षा मंथन से निकलने वाले मुद्दों को हल करने पर जोर देना चाहिए।
[09/07, 8:13 pm] Monu shivrajpur: स्किल कोर्सेज में पर्याप्त शिक्षकों की कमी ।
– राज्यपाल के विशेष कार्य अधिकारी डॉ पंकज एल जानी ने गिनाईं राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में आ रही समस्याएं
कानपुर : राष्ट्रीय नई शिक्षा नीति को प्रदेश सरकार ने पूरे देश में सबसे पहले अपनाया और विश्वविद्यालयों में इसे लागू किया। नतीजा यह है कि अगले साल हम स्नातक का पहला बैच देने जा रहे हैं। फिर भी विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों में आज भी नई शिक्षा नीति को लेकर तमाम तरह की समस्याएं हैं जिन्हें दूर किए जाने की आवश्यकता है…। राज्यपाल के विशेष कार्य अधिकारी डॉ पंकज एल जानी ने रविवार को शिक्षा मंत्री ने रविवार को शिक्षा मंथन कार्यक्रम में नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में आ रही समस्याओं पर बिंदुवार प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि महाविद्यालयों में स्किल कोर्सों की शुरुआत हो चुकी है लेकिन आज भी कई कॉलेजों में स्किल कोर्स पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं है। महाविद्यालयों के पास फंड की भी बेहद कमी है जिसके कारण वह अपने इंफ्रास्ट्रक्चर व संसाधनों में सुधार वह अपेक्षित बदलाव नहीं कर पा रहे हैं। नई शिक्षा नीति में क्रेडिट ट्रांसफर प्रणाली शुरू की गई है लेकिन क्रेडिट बैंक के जरिए क्रेडिट ट्रांसफर किए जाने के बारे में विभिन्न तरह की भ्रांतियां हैं। कोई विश्वविद्यालय 100 अंक के प्रश्न पत्र में 4 क्रेडिट पॉइंट दे रहा है तो कोई 3 क्रेडिट प्वाइंट दे रहा है। नई शिक्षा नीति के अनुसार स्टडी मेटेरियल का भी अभाव है। कोई छात्र चाहता है कि वह अपने दो क्रेडिट पॉइंट लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी कोर्स में प्रवेश ले ले लेकिन प्रॉपर जानकारी ना होने से वह ऐसा नहीं कर पाता। विज्ञान के तमाम महाविद्यालयों मैं लैब भी नहीं है जिसके कारण रिसर्च वर्क नहीं हो पा रहा है। तकनीकी का उपयोग करने में भी महाविद्यालय काफी पीछे हैं।
[09/07, 8:13 pm] Monu shivrajpur: सेमेस्टर परीक्षाओं से आया बड़ा बदलाव, खुद को बदलें शिक्षक
– दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो योगेश सिंह ने दी जानकारी
– विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से लीडरशिप विकसित करने की अपील की
– वर्ष 2047 तक राष्ट्र को विकसित बनाने का लक्ष्य निर्धारित करने के लिए कहा
कानपुर : सेमेस्टर परीक्षाओं के होने से शिक्षा में काफी बड़ा बदलाव हुआ है, जब भी कोई नया बदलाव किया जाता है तो लोगों को कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मगर बदलाव तभी किया जाता है, जब कुछ अच्छा होना होता है। हम बदलाव करेंगे तभी शिक्षा का स्तर बढ़ा सकते हैं…। छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर में आयोजित दो दिवसीय शिक्षा मंथन कार्यक्रम के दूसरे दिन रविवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर योगेश सिंह ने यह जानकारी दी।
प्रो योगेश सिंह ने कहा कि जब कोई नई चीज लागू हो और उसे करना पड़े तो वह थोड़ा सा दुख देती है, लेकिन कुछ समय बाद जब हम उसे सीख लेते हैं तो उसी में ही हमें मजा आने लगता है। टीचरों को थोड़ा सा जागरूक होना पड़ेगा, क्योंकि बेहतर बनने के लिए हमें आधुनिक युग की तरफ जाना है। टीचरों की कमी पहले भी थी। क्लासरूम पहले भी गड़बड़ थे। हमको इसमें ही बेहतर करके दिखाना होगा। उन्होंने कहा कि रिसोर्सेज को सही समय पर प्रयोग करें। सभी विश्वविद्यालय के पास रिसोर्सेज है, लेकिन उन्हें कब और किस समय पर प्रयोग करना है। यह किसी को नहीं मालूम या फिर वह तक सोचते नहीं है। हमें अपने रिसोर्सेज का प्रयोग कब करना है और कहां करना है, इसका चयन करना बहुत जरूरी है। इसका फायदा बच्चों को मिलना चाहिए, तभी वह आगे बढ़ पाएंगे। प्रो सिंह ने नई शिक्षा नीति में क्रेडिट ट्रांसफर पॉलिसी के बारे में भी जानकारी दी साथ ही बताया कि सरकार संसाधनों को बेहतर करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। विश्वविद्यालयों को मल्टीपल एंट्री और मल्टीपल एग्जिट सिस्टम शुरू करना चाहिए ताकि बच्चे दूसरे विश्वविद्यालयों में जाकर वहां के बेहतरीन कोर्सो में प्रवेश ले सकें। उन्होंने बताया कि यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार $1 शिक्षा में निवेश करने से $20 का ग्रोथ आता है। इस बात को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री के संकल्प के अनुसार 2047 तक राष्ट्र को विकसित देश बनाना है। उन्होंने विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से आग्रह किया कि वह अपने यहां लीडरशिप विकसित करें ताकि छात्र-छात्राएं आगे चलकर देश का नेतृत्व करने में सक्षम हो सकें।
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नेशनल एजुकेशन पॉलिसी से है नई उम्मीदें
प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि इस पॉलिसी से लोगों को बहुत उम्मीदें हैं। हमें अपनी क्वालिटी मैनपावर को मजबूत बनाना है। उसे कैसे बढ़ाना है यह हमको अपने स्तर से सोचना पड़ेगा। समझ की समझ को विकसित करना ही शिक्षा है। अब स्किल पर बात करनी शुरू कर दी गई है। शिक्षकों को भी अपने को नई तरह से बदलना है। यह तो सभी लोग चाहते हैं कि हमारा बच्चा खुश रहे, लेकिन जब घर में मां बाप कुछ नहीं स्कूल में टीचर कुछ नहीं, जब बच्चा किसी को कुछ नहीं देखता तो वह कैसे खुश रहे। इसलिए पहले हमको खुश रहना पड़ेगा फिर बच्चे खुश होंगे। इस पर विचार करने की बहुत जरूरत है। फंड की समस्या दूर करने के लिए विश्वविद्यालयों को अपने यहां सेक्शन 8 कंपनी बनाकर बजट जुटाना चाहिए।
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बच्चों की विधा को इंप्रूव करने की जरूरत है
प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि हमें बच्चों की विधा को इंप्रूव करने की जरूरत है, जब तक हम अपने विश्वविद्यालय के बच्चों को यह नहीं बताएंगे कि टीमवर्क के क्या फायदे हैं तब तक कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। हमें उनकी विधा को इंप्रूव करना है। हम जिस चीज को प्रीमियम देंगे वह चीज आगे जरुर बढ़ेगी। बच्चों को यह समझाना है कि सीखने के साथ-साथ हमें सिखाना भी बहुत जरूरी है। आज के समय में हमने अच्छाई को प्रमोट करना बंद कर दिया है। इसका असर गलत पड़ रहा है। बच्चे हमारे आचरण से ही तैयार होंगे, जब घर में मां बाप के पास टाइम नहीं, स्कूल कॉलेज में टीचर के पास टाइम नहीं तो बच्चों में इंप्रूवमेंट करना बहुत मुश्किल है। इसलिए हमें अपने सिस्टम को बदलना है और उसे मजबूत बनाना है।
[09/07, 8:13 pm] Monu shivrajpur: छात्रों को मनचाही भाषा में पढ़ाई कर अवसर मिल सकेगा।
कानपुर-
छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में आयोजित शिक्षा मंथन- 2023 में डा. चामू कृष्ण शास्त्री ने कहा की यूजीसी में अभी तक सभी क्षेत्रों में फिर वो चाहे मेडिकल हो, लॉ हो, इंजीनियरिंग हो,सभी जगह इंग्लिश में पढ़ाई होती थी।लेकिन न्यू एजुकेशन पॉलिसी के तहत सभी छात्र अपनी मनचाही भाषा वा प्रांतीय भाषा के साथ साथ राष्ट्रीय भाषा में पढ़ाई कर सकेंगे।जिसके लिए हम अपनी शिक्षा व्यवस्था के पारिस्थितिकी तंत्र को बदलने की आवश्यकता है।साथ ही शिक्षा के माध्यम में परिवर्तन की आवश्यकता है।जिसके लिए लोगो की मानसिकता को बदलने का काम किया जाएगा।और इन सभी होने वाले परिवर्तनों में अंग्रेजी भाषा के अस्तित्व पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। ग्रामीण क्षेत्र के लगभग 90% छात्रों को विश्वविद्यालयों में जब प्रवेश मिलता है तो उन्हें भाषाई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।यह भी एक कारण है की यूजीसी ने प्रांतीय एवम राष्ट्रीय भाषा को बढ़ावा देने में जोर डाला।
इन सभी व्यवस्थाओं को आधारशिला से ही सुधारने के लिए शिक्षण सामग्री को, पठन पाठन के कार्यों में उपयोग लाने वाली वस्तुओं को हिंदी भाषा में तैयार करने का निर्देश दिया है।प्राप्त गणना के अनुसार मानविकी में 80%, कॉमर्स में 50% ही है इसलिए विश्वविद्यालयों को इस समस्या पर प्रकाश डालना चाहिए और उसका समाधान करना चाहिए।जिसके लिए उन्हें कुछ सूची बनानी चाहिए।की कितने कोर्सेज की जिसमे हिंदी किताबे नही है? है तो कितनी है? यदि वे काम है तो उनकी संख्या में इजाफा करना चाहिए।अब यदि आपको हिंदी की पुस्तकों को बढ़ाना है तो इसके दो तरीके है।
1-अनुवाद
2-स्वतंत्र लेखन
या तो आप पहले लिखी हुई पुस्तकों को हिंदी भाषा में अनुवाद कर उन्हे लोगो के सामने प्रस्तुत करे या तो आप स्वयं उन्हे प्रांतीय या भारतीय भाषा में स्वतंत्र लेखन करे।
अब जब आप ऐसा करने चलेंगे तो हो सकता है आपके पास कॉपीराइट की समस्या आए तो इसके पहले हूं कॉपीराइट की समस्या का समाधान करना होगा।अभी हम शिक्षा के जगत ने इस चीज की जरूरत को पैदा कर रहे है।इसके बाद हमे इसके लिए प्रावधान बनाएंगे।इस कार्य में सभी विश्वविद्यालयों को आगे आना होगा सभी को एक साथ होना होगा।साथ ही उन्होंने उत्तर प्रदेश को कुछ सुझाव देते हुए कहा की हर विश्वविद्यालयों में दो प्रकार की योजनाएं हो सकती है।
1-अध्यापक को स्वतंत्र रूप से पढ़ना चाहिए। स्वतंत्र लेखन से अच्छी एवं सहज रूप से शिक्षा प्रचार प्रसार हो सकता है।
2-सभी को अनुवाद करते समय अच्छी तरह से संशोधन करना चाहिए एवम यह कार्य प्रधानाध्यापक को करना चाहिए।
इसके बाद डा.पंकज. एल.जानी (ओएसडी माननीय कुलाधिपति) ने मेडिकल आदि मे ऐसे पेपर्स पर पुस्तक अनुवाद करने को कहा जो अधिकांश विश्वविद्यालयों में सामान्यत: उपयोग में लाए जाते हो।
[09/07, 8:13 pm] Monu shivrajpur: स्वयं पोर्टल विद्यार्थियों की बढ़ा रहा है स्किल
– अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के चेयरमैन डॉक्टर सीताराम ने दी जानकारी
कानपुर : शिक्षा मंथन कार्यक्रम के छठे सत्र में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के चेयरमैन डॉक्टर टीजी सीता राम ने उच्च और तकनीकी शिक्षा में स्किल डेवलपमेंट, इन्क्यूबेशन व प्लेसमेंट विषय पर व्याख्यान दिया। सत्र की अध्यक्षता मदन मोहन मालवीय विश्वविद्यालय गोरखपुर के कुलपति प्रो जेपी पांडेय ने की।
डॉ सीताराम ने भारतवर्ष में स्किल डेवलपमेंट इकोसिस्टम की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मिनिस्ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट एंड एंटरप्रेन्योरशिप के अंतर्गत रोजगार एवं प्रशिक्षण निदेशालय, नेशनल काउंसिल फ़ॉर वोकेशनल एजुकेशन एंड ट्रेनिंग, नेशनल स्किल डेवलपमेंट कारपोरेशन कार्य कर रहे हैं। जिनके माध्यम से छात्र छात्राओं के साथ ही शिक्षकों को भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। डॉ सीताराम ने स्वयं पोर्टल के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि स्वयं (स्टडी वेब्स ऑफ एक्टिव-लर्निंग फॉर यंग एस्पायरिंग माइंड्स) भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया एक कार्यक्रम है और इसे शिक्षा नीति के तीन प्रमुख सिद्धांतों, पहुंच, समानता और गुणवत्ता को प्राप्त करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह प्लेटफ़ॉर्म दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाइन मुफ़्त ई-लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म पोर्टल है, जिसे स्कूल/वोकेशनल, अंडर-ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, इंजीनियरिंग और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को कवर करके शिक्षा नीति के तीन प्रमुख सिद्धांतों, पहुंच, समानता और गुणवत्ता को प्राप्त करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। करीब एक करोड़ से ज्यादा छात्र इंडस्ट्री ओरिएंटेड कोर्स में प्रतिभाग कर रहे हैं। गुवाहाटी, जयपुर, भोपाल व चंडीगढ़ में फिजिकल ट्रेनिंग सेंटर भी जल्द शुरू कराए जा रहे हैं। विद्यार्थियों के लिए तमाम नए वोकेशनल कोर्स भी डिजाइन किए गए हैं। समर्थ प्रणाली को भी अपनाने के लिए शैक्षिक संस्थानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
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एआईसीटीई की आईडिया लैब 24 घंटे कर रही काम
स्टार्टअप इकोसिस्टम पर बात करते हुए प्रोफेसर सीताराम ने बताया कि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की आइडिया लैब 24 घंटे सातों दिन काम कर रही है। यहां एक ऐसा वातावरण उपलब्ध कराया जाता है जहां प्रतिभागी अपने विचारों को नवाचारों में परिवर्तित करते हैं। आइडिया लैब सबसे लंबे समय तक चलने वाला प्रौद्योगिकी इनक्यूबेटर है और अब तक सैकड़ों कंपनियां यहां से निकलकर सफलतापूर्वक व्यवसाय कर रही हैं। उन्होंने बताया कि एआईसीटीई की ओर से नेशनल इन्नोवेशन एंड स्टार्टअप पॉलिसी 2019 की शुरुआत भी की गई थी जो मील का पत्थर साबित हो रही है। तकनीकी महाविद्यालयों के छात्र छात्राएं युक्ति 2.0 के माध्यम से अपने नवाचारों को मूर्त रूप दे रहे हैं। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा समन्वय पर भी जोड़ दिया और कहा कि विदेश के शैक्षिक संस्थानों से एमओयू के लिए पॉलिसी की जरूरत है। वर्तमान में तकनीकी शिक्षा संस्थानों को एमओयू के लिए राज्य सरकार के अनुमति जरूरी है, जिसमें काफी समय लग जाता है। इसमें सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने ए++ ग्रेड वाले विश्वविद्यालयों से खुद का ऑनलाइन प्रोग्राम भी शुरू करने का आह्वान किया।
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