दिल्ली23अप्रैल* मेहनतकश लोगों की आमदनी पर सबसे बड़ा डाला गया डाका-अमजद हसन।
“रिज़र्व बैंक ने अपने हैंडबुक ऑफ स्टैटिस्टिक्स ऑन इंडियन स्टेटस् में लेबर ब्यूरो के 2014-15 से 2021-22 तक के आंकड़ों के सहारे सालाना मज़दूरी के अनुमान पेश किये हैं. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के सहारे मज़दूरों की नकद मज़दूरी को वास्तविक मज़दूरी में बदला जा सकता है और पता किया जा सकता है कि इस अवधि में वास्तविक मज़दूरी में कितनी बढ़ोतरी हुई।
साल 2014-15 से 2021-22 के बीच वास्तविक मज़दूरी की वृद्धि-दर समग्र रूप से सालाना एक प्रतिशत से भी कम रही है- खेतिहर मज़दूरी के लिए 0.9 प्रतिशत, निर्माण मज़दूरी के लिए 0.2 प्रतिशत तथा ग़ैर खेतिहर मज़दूरी के लिए 0.3 प्रतिशत. बीते आठ सालों में अखिल भारतीय स्तर पर वास्तविक मज़दूरी में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है. खेतिहर मज़दूरों के लिए वास्तविक मज़दूरी की सालाना वृद्धि दर सिर्फ दो बड़े राज्यों में दो प्रतिशत से कुछ अधिक रही- कर्नाटक (2.4 प्रतिशत) तथा आंध्र प्रदेश (2.7 प्रतिशत). पांच बड़े राज्यों (हरियाणा, केरल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश राजस्थान तथा तमिलनाडु) में वास्तविक मज़दूरी 2014-15 से 2021-22 के बीच घटी है.”
ग़ौरतलब है कि इस दौरान मुद्रास्फीति का औसत 6-7 फ़ीसदी तक रहा है। यानि 2014 से पहले मज़दूर अपनी मज़दूरी से जो कुछ ख़रीद सकते थे अब उससे कम से कम पाँच फ़ीसदी सालाना की दर से कम ख़रीद सकने लायक़ रहे ।
यह सूचना उस आकलन की पुष्टि करती है जिसके अनुसार ग़रीबी लगातार बढ़ रही है और ज़्यादातर लोगों की आय मोदीजी के राज में कम हुई है जबकि एक फ़ीसदी से कम लोगों की आय में असाधारण वृद्धि हुई है।
तकलीफ़देह यह है कि सांप्रदायिक कड़ाही में भूने जाते समाज का विमर्श इन सवालों पर नदारद है!
वर्तमान में महंगाई को देखते हुए दिल्ली सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मजदूरी में नाम मात्र की बढ़ोतरी मजदूरो के साथ एक प्रकार का छलावा है।
दूसरी बात यह भी कड़वी सच्चाई है की सरकार द्वारा घोषित/निर्धारित न्यूनतम वेतन किसी भी कर्मचारियों/श्रमिकों को किसी भी संस्थान या कंपनी द्वारा प्रदान नही किया जाता।
यहां तक की सरकारी विभाग में अनुबंध पर कार्यरत कर्मचारियों को भी नही मिलता।
सरकार को चाहिये की इसको लागू करवाने के तन्त्र को मजबूत करे। मिनिमम वेज नही देने वालो के खिलाप कठोर कार्यवाही करे।
तीसरी बात वर्तमान महंगाई को देखते हुए कम से कम 25 हजार रुपये महीना मिनिमम वेज होना चाहिये। यह श्रमिक संगठनो की बहुत ही लम्बित मांग है।
दिल्ली में श्रमिकों द्वारा न्यूनतम मजदूरी तक वास्तविक पहुंच पर केंद्रीय ट्रेड यूनियनों (WPC) द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि आवश्यक कौशल सेट होने के बावजूद 95% श्रमिकों को दिल्ली सरकार द्वारा निर्धारित वैधानिक न्यूनतम मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा रहा है। अध्ययन कहता है कि 75% से अधिक कर्मचारी पर्याप्त सुविधाओं या सुरक्षा के बिना काम करते हैं।
*अमजद हसन*
महासचिव
दिल्ली असंगठित निर्माण मजदूर यूनियन (इंटक)

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