September 12, 2026

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बिजनौर 12सितंबर 26*विज्ञान, साहित्य और सार्वजनिक संसाधनों के दोहन पर सामाजिक चिंतक एड. रीता भुइयार ने उठाया सवाल;

बिजनौर 12सितंबर 26*विज्ञान, साहित्य और सार्वजनिक संसाधनों के दोहन पर सामाजिक चिंतक एड. रीता भुइयार ने उठाया सवाल;

बिजनौर 12सितंबर 26*विज्ञान, साहित्य और सार्वजनिक संसाधनों के दोहन पर सामाजिक चिंतक एड. रीता भुइयार ने उठाया सवाल;

जनता से की जागरूक होने की अपील

बिजनौर (उत्तर प्रदेश): वर्तमान सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य में जनहित के बुनियादी मुद्दों, बौद्धिक विमर्श और लोकतांत्रिक चेतना को लेकर सामाजिक चिंतक एड. रीता भुइयार (जिला बिजनौर, उत्तर प्रदेश) ने एक व्यापक विचार प्रस्तुत किया है। उन्होंने समाज में गहराते आर्थिक व वैचारिक संकट पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि विज्ञान और साहित्य मूल रूप से कभी भी मानवता या जनता के विरोधी नहीं रहे, बल्कि आज उनके इस्तेमाल के तरीके ने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

ज्ञान और विचारों के दोहन पर चिंता

​एड. रीता भुइयार ने स्पष्ट किया कि ऐतिहासिक रूप से विज्ञान ज्ञान का आधार रहा है और साहित्य हमेशा जनभावनाओं व वैचारिक अभिव्यक्ति की आवाज बनता आया है। आज भी उनका बुनियादी स्वरूप वही है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में उनका उपयोग बदल चुका है। जब विज्ञान का प्रयोग जनकल्याण, लोकहित और समाज के उत्थान की जगह केवल असीमित कॉरपोरेट मुनाफे के लिए होने लगे और साहित्य का उपयोग सच को उजागर करने के बजाय आम जनता की सोच को प्रभावित करने या भटकाने के लिए किया जाने लगे, तो यह समाज के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है। उन्होंने कहा कि ज्ञान का काम जनता को जागरूक करना, विज्ञान का उद्देश्य मानवता की सेवा करना और साहित्य का दायित्व सत्ता के सामने सच बोलने का साहस देना होना चाहिए।

सार्वजनिक संसाधनों और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग

​सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण और कथित लाभ के खेल पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि जब सरकारी जमीन, जल-जंगल-जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधन और पूरी सरकारी मशीनरी का उपयोग आम जनता के कल्याण के बजाय कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों या प्रभावशाली लोगों के व्यक्तिगत लाभ के लिए होने लगे, तो यह मामला महज ‘विकास’ का नहीं रह जाता। यह सीधे तौर पर जनता के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के हनन का प्रश्न बन जाता है।

​उन्होंने जनता का ध्यान इस बात की ओर आकर्षित किया कि शोषण या ‘लूट’ केवल जेबकतरी या सीधे पैसे छीनने तक सीमित नहीं होती। जनता को इसकी कीमत कई अप्रत्यक्ष रूपों में चुकानी पड़ती है:

  • महंगाई और बेरोजगारी: बुनियादी जरूरतों की बढ़ती कीमतें और युवाओं के लिए घटते रोजगार के अवसर।
  • महंगी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं: शिक्षा और इलाज जैसी मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं का बाजारीकरण, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग बाहर होता जा रहा है।
  • सार्वजनिक संपत्तियों की क्षति: सरकारी जमीनों, प्राकृतिक संसाधनों और प्रशासनिक तंत्र का उपयोग जब जनता के हितों के खिलाफ होने लगे, तो उसका अंतिम बोझ आम नागरिक पर ही पड़ता है।

अंधविश्वास और प्रचार के प्रभाव से बाहर निकलने का आह्वान

​एड. रीता भुइयार ने नागरिकों से आह्वान किया कि वे किसी भी नेता, उद्योगपति या बड़े संस्थान की बात को केवल इसलिए सच न मान लें क्योंकि उनके पास अकूत धन, राजनीतिक सत्ता, मीडिया प्रचार या प्रभाव की ताकत है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में विचार निर्माण को नियंत्रित करने के बड़े प्रयास हो रहे हैं, ऐसे में जनता का तार्किक होना अनिवार्य है।

​उन्होंने आम जनता से सीधे, तीखे और लोकतांत्रिक सवाल पूछने की अपील की:

  • ​सरकारी जमीन और सार्वजनिक संपत्तियां वास्तव में किसके फायदे के लिए आवंटित की जा रही हैं?
  • ​देश और राज्य के संसाधनों का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है?
  • ​सरकारी मशीनरी और प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल किसके हितों की रक्षा में हो रहा है?
  • ​इन सभी व्यवस्थाओं और नीतियों की अंतिम कीमत अपनी जेब और जीवन से आखिर कौन चुका रहा है?

जागरूक नागरिक ही स्वस्थ लोकतंत्र की रीढ़

​अपने विचार के समापन में उन्होंने कहा कि जब ज्ञान जनता को जागरूक बनाए, विज्ञान मानवता के काम आए, साहित्य व्यवस्था को सच का आईना दिखाए और सरकारी व्यवस्था पूरी तरह जनता के प्रति जवाबदेह हो, तभी एक स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र की रक्षा संभव है। उन्होंने संदेश दिया कि नागरिकों को जागना होगा, व्यवस्था को समझना होगा और सवाल पूछने की आदत डालनी होगी, क्योंकि एक सचेत और जागरूक नागरिक को सत्ता या प्रचार तंत्र द्वारा भ्रमित करना कभी आसान नहीं होता।