तमिलनाडु15जुलाई26*”यदि अस्पताल में किसी मरीज की मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिवार को कोई भुगतान नहीं करना होगा।” — मुख्यमंत्री विजय का क्रांतिकारी प्रस्ताव
हमारे यहाँ की कड़वी सच्चाई: “जब तक बिल क्लियर नहीं, तब तक शव नहीं”
सीएम विजय का यह प्रस्ताव हमारे देश के मौजूदा हालात में किसी सपने जैसा लगता है। हमारे यहाँ की हकीकत बेहद दर्दनाक और अमानवीय है।
शवों को बंधक बनाना: आज कई निजी अस्पतालों की स्थिति यह है कि इलाज के दौरान मरीज की मौत हो जाने पर भी संवेदनशीलता गायब रहती है। जब तक लाखों रुपये का बकाया बिल क्लियर नहीं होता, तब तक अस्पताल प्रबंधन परिवार को शव (Body) तक सौंपने से इनकार कर देता है।
शोक के समय मानसिक उत्पीड़न: एक तरफ परिवार अपने प्रियजन को खोने के गम में डूबा होता है, और दूसरी तरफ उनसे पैसों के लिए तगादा किया जाता है। कई बार लोगों को शव लेने के लिए अपनी जमीन, गहने बेचने पड़ते हैं या कर्ज के जाल में फंसना पड़ता है।
🏛️ दूसरी सरकारों के लिए एक बड़ी नसीहत
सीएम विजय का यह कदम देश की अन्य राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के लिए एक आईना भी है और नसीहत भी:
स्वास्थ्य सेवा व्यापार नहीं, अधिकार है: सरकारों को यह समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवा कोई मुनाफा कमाने का धंधा नहीं है। निजी अस्पतालों की इस ‘गुंडागर्दी’ और लूट पर लगाम कसने के लिए कड़े कानूनों की जरूरत है।
सहानुभूतिपूर्ण नीतियां बनाएं: दूसरी सरकारों को इस प्रस्ताव से सीख लेते हुए अपने राज्यों में भी ऐसे नियम लागू करने चाहिए, जहाँ मरीज की मौत के बाद कम से कम उसके शव को सम्मान मिले और पीड़ित परिवार पर वित्तीय बोझ न डाला जाए।
कानून का सख्ती से पालन हो: हालांकि कई अदालतों ने कहा है कि बिल बकाया होने पर शव को रोकना गैर-कानूनी है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह धड़ल्ले से जारी है। सरकारों को इस पर तुरंत सख्त एक्शन लेना चाहिए।

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