July 13, 2026

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नोयडा/भोजपुर12जुलाई26*न भूतो,न भविष्यति : इस्सयोग आध्यात्मिक क्रांति

नोयडा/भोजपुर12जुलाई26*न भूतो,न भविष्यति : इस्सयोग आध्यात्मिक क्रांति

नोयडा/भोजपुर12जुलाई26*न भूतो,न भविष्यति : इस्सयोग आध्यात्मिक क्रांति

नोयडा/भोजपुर/ब्रह्मलीन महात्मा सुशील कुमार जी के 89वें महाअवतरण दिवस पर विशेष आलेख -विनोद कुमार सिंह ‘तकियावाला’स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार
विज्ञान,तकनीक और भौतिक उपलब्धियों के इस युग में मनुष्य ने पृथ्वी से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी विजय का परचम लहरा दिया है। जीवन पहले की अपेक्षा अधिक सुविधासंपन्न हुआ है।संचार के साधनों ने दूरियों को लगभग समाप्त कर दिया है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दौर मानव सभ्यता को नई दिशा दे रहा है।फिर भी यदि कोई सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने है,तो वह है—मनुष्य के भीतर बढ़ती मानसिक अशांति, तनाव,अकेलापन और आत्मिक रिक्तता। बाहरी समृद्धि के बीच भी मन की शांति आज दुर्लभ होती जा रही है। ऐसे समय में भारतीय अध्यात्म की सनातन परम्परा पुनः प्रासंगिक हो उठती है,जिसने सदैव मनुष्य को बाहर नहीं,अपने भीतर झाँकना सिखाया है।भारत की गुरु-शिष्य परम्परा केवल धार्मिक आस्था की नहीं,बल्कि आत्मबोध, लोककल्याण और मानवीय मूल्यों की परम्परा रही है।जब-जब समाज दिशाहीन हुआ,तब-तब किसी संत- महापुरुष ने अपने जीवन से मानवता को नई दिशा दी।ब्रह्मलीन महात्मा सुशील कुमार जी ऐसे ही विरल संतों में गिने जाते हैं, जिन्होंने आध्यात्मिक साधना को जन-जन तक पहुँचाने का सहज,सरल और अनुभवपरक मार्ग प्रदान किया, जिसे आज विश्व ‘इस्सयोग’ के नाम से जानता है।13 जुलाई उनके अनुयायियों के लिए केवल जन्मदिवस नहीं,बल्कि आत्ममंथन, साधना और गुरु-चिंतन का पावन पर्व है।वर्ष 1938 में बिहार के भोजपुर जनपद में वैदिक विद्वान श्री श्रीशचंद्र शास्त्री तथा पूजनीया कर्पूर कमला जी के घर जन्मे महात्मा सुशील कुमार जी को अध्यात्म संस्कारों के रूप में विरासत में मिला।उनके पिता चारों वेदों के प्रकाण्ड ज्ञाता,संस्कृत के विद्वान और आर्य समाज के प्रतिष्ठित आचार्य थे।भारत सरकार उन्हें थाईलैंड,श्रीलंका सहित अनेक देशों में वेद और संस्कृत के प्रचार- प्रसार के लिए भेजती थी।माता कर्पूर कमला जी भी विदुषी और समाजसेवा के प्रति समर्पित थीं। ऐसे वातावरण में बालक सुशील के मन में बचपन से ही सत्य,ईश्वर और जीवन के रहस्यों को जानने की तीव्र जिज्ञासा जाग उठी।गायत्री मंत्र, वैदिक संस्कार और आत्मानुशासन ने उनके व्यक्तित्व की मजबूत आधारशिला रखी।महात्मा सुशील कुमार जी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि आध्यात्मिकता और कर्मयोग एक-दूसरे के पूरक हैं।उन्होंने वर्ष 1961 में सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की तथा बाद में विधि की पढ़ाई भी पूरी की।बिहार सरकार के पथ निर्माण विभाग में अभियंता के रूप में उन्होंने महात्मा गांधी सेतु,बोकारो इस्पात परियोजना तथा अनेक राष्ट्रीय महत्व की योजनाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया।नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी उन्होंने निर्भीक होकर विकास कार्य सम्पन्न कराए।उत्कृष्ट सेवाओं के लिए वर्ष 1997 में उन्हें ‘इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।किन्तु उनकी वास्तविक पहचान एक सफल अभियंता या प्रशासक भर नहीं थी। उनके भीतर का साधक निरंतर उस परम सत्य की खोज में लगा था, जिसे पद, प्रतिष्ठा या पुरस्कार से प्राप्त नहीं किया जा सकता।उन्होंने यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिक उपलब्धि केवल हिमालय की गुफाओं में नहीं,बल्कि गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए भी प्राप्त की जा सकती है।वे कहा करते थे कि गृहस्थ आश्रम त्याग का नहीं,बल्कि साधना का श्रेष्ठतम आश्रम है।यदि जीवन में सच्चे सद्गुरु का सान्निध्य मिल जाए तो परिवार ही तपोवन बन जाता है और दैनिक कर्म साधना का माध्यम।यही भारतीय दर्शन की वह परम्परा है जिसमें राजा जनक जैसे गृहस्थ भी ब्रह्मज्ञानी कहलाए।18 मई 1963 को उनका विवाह पूज्य माँ विजया जी के साथ हुआ।यह केवल वैवाहिक संबंध नहीं,बल्कि दो आध्यात्मिक यात्राओं का दिव्य संगम था। दोनों ने साथ-साथ साधना का कठिन मार्ग अपनाया। प्रारम्भ में उन्हें एक लौकिक गुरु से दीक्षा मिली,किन्तु साधना की गहराइयों में उन्होंने अनुभव किया कि स्वयं सद्गुरु भगवान शिव उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं।यही अनुभूति उनके जीवन की निर्णायक आध्यात्मिक घटना बनी और इसी साधना से जन्म हुआ ‘इस्सयोग’ का—एक ऐसा सूक्ष्म साधना-पथ जो जाति, धर्म,भाषा और संप्रदाय की सीमाओं से परे सम्पूर्ण मानवता के लिए समर्पित है।महात्मा जी का उद्देश्य कोई नया पंथ स्थापित करना नहीं था,बल्कि मनुष्य को उसके भीतर स्थित परम चेतना से जोड़ना था।उनका स्पष्ट मत था कि बाहरी पूजा,आडम्बर और कर्मकाण्ड तभी सार्थक हैं,जब उनका लक्ष्य अंतर्मन की शुद्धि हो। यदि मनुष्य अपने भीतर उतरना सीख जाए तो परमात्मा की अनुभूति दूर नहीं रहती।इसी विश्वास के साथ उन्होंने इस्सयोग को सहज,सरल और अनुभवपरक साधना के रूप में जन-जन तक पहुँचाया।उनका उद्घोष था—”इस्सयोग न भूतो, न भविष्यति—एक आध्यात्मिक क्रांति है।” उनका विश्वास था कि इस्सयोग की लयावस्था साधना साधक को अल्प समय में ही उस आत्मिक शांति का अनुभव करा सकती है,जिसकी खोज में लोग वर्षों तक भटकते रहते हैं।आज जब मनुष्य बाहर की दुनिया को जीत चुका है,लेकिन स्वयं से हारता जा रहा है, तब महात्मा सुशील कुमार जी का यह संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है कि वास्तविक विजय बाहर नहीं, भीतर प्राप्त होती है।श्रद्धा,सेवा,समर्पण और आत्मबोध—ये चार आधार ऐसे हैं जिन पर सुखी व्यक्ति, स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। उनका सम्पूर्ण जीवन इसी सत्य का सजीव उदाहरण था।
उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि संसार का त्याग करके ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है।उनका स्पष्ट मत था कि परिवार,समाज और अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करते हुए भी साधना के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचा जा सकता है। उनके व्यक्तित्व में कर्मयोग, ज्ञानयोग,भक्तियोग और राजयोग का अद्भुत समन्वय दिखाई देता था। यही कारण था कि उनके संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल प्रभावित ही नहीं होता था, बल्कि अपने जीवन को सकारात्मक दिशा देने के लिए प्रेरित भी होता था।महात्मा जी का मानना था कि अध्यात्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना है। यदि साधना के बाद भी अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या और भेदभाव बने रहें तो वह साधना अधूरी है।सच्चा साधक वही है,जिसके भीतर करुणा, सेवा, विनम्रता और समर्पण का भाव स्वतः विकसित हो।इस्सयोग की साधना इसी आंतरिक परिवर्तन का माध्यम है।यह मनुष्य को बाहर की नहीं, भीतर की यात्रा पर ले जाती है और वहीं से जीवन का वास्तविक रूपांतरण प्रारम्भ होता है।आज का समाज अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। विज्ञान और तकनीक ने जीवन को गति दी है,किन्तु इसी तीव्र गति ने मनुष्य के भीतर धैर्य और संतुलन को भी चुनौती दी है।परिवारों में संवाद कम हो रहे हैं,सामाजिक रिश्तों में आत्मीयता घट रही है और युवा पीढ़ी मानसिक तनावों से जूझ रही है।ऐसे समय में अध्यात्म को केवल कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं रखा जा सकता।आवश्यकता ऐसे अध्यात्म की है,जो जीवन को सरल बनाए,मन को स्थिर करे और व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराए। इस दृष्टि से इस्सयोग का संदेश समकालीन समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।महात्मा सुशील कुमार जी का विश्वास था कि आने वाला समय केवल आर्थिक या तकनीकी प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण का भी होगा। भौतिक प्रगति तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ नैतिकता, संवेदनशीलता और आत्मिक चेतना का विकास भी होगा।उन्होंने अपने साधकों से केवल ध्यान करने का आग्रह नहीं किया,बल्कि सेवा को साधना का अभिन्न अंग बनाया। उनका कहना था कि जिस साधना का परिणाम समाज के कल्याण में दिखाई न दे, वह साधना अपने उद्देश्य को पूर्ण नहीं करती।उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय 13 जुलाई 2003 से जुड़ा है।इसी पावन दिन उन्होंने अपने मानस संतानों के भौतिक कल्याण और लोकमंगल की भावना से पूज्य सद्गुरुदेव माँ विजया जी के माध्यम से दिल्ली में शक्ति पिंड माँ मनोकामना देवी की स्थायी स्थापना का शुभारम्भ कराया।इससे पूर्व उन्होंने सहज भाव से संकेत दिया था कि समय के साथ साधकों की संख्या इतनी बढ़ेगी कि इस दिव्य शक्ति केंद्र की स्थायी स्थापना आवश्यक हो जाएगी। समय ने उनके इस कथन को सत्य सिद्ध किया। बाद में अंतरराष्ट्रीय इस्सयोग समाज के समर्पित सचिव के. एस. वर्मा एवं वंदना वर्मा के विशेष अनुरोध पर पूज्य सद्गुरुदेव माँ विजया जी के करकमलों से मंदिर की स्थायी स्थापना सम्पन्न हुई।
आज यह स्थान केवल एक मंदिर नहीं,बल्कि आस्था,साधना,सेवा और आत्मिक ऊर्जा का जीवंत केंद्र बन चुका है।देश-विदेश से श्रद्धालु यहाँ पहुँचकर आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं तथा अपने सद्गुरुदेव के प्रति श्रद्धा अर्पित करते हैं।प्रतिवर्ष आयोजित महाअवतरण दिवस केवल स्मरण का कार्यक्रम नहीं होता,बल्कि गुरु-परम्परा के मूल संदेश—श्रद्धा, सेवा और समर्पण—को जीवन में उतारने का संकल्प भी होता है। गुरु का सम्मान केवल पुष्प अर्पित करने से नहीं, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलने से सिद्ध होता है।व्यक्तिगत रूप से मुझे भी महात्मा सुशील कुमार जी के सान्निध्य में कुछ अमूल्य क्षण बिताने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आज भी वे स्मृतियाँ मेरे लिए आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत हैं।मैंने निकट से अनुभव किया कि सच्चा गुरु केवल ज्ञान नहीं देता,बल्कि साधक के भीतर सुप्त चेतना को जागृत कर देता है।उसकी दृष्टि में न कोई बड़ा होता है और न छोटा; सभी आत्माएँ परमात्मा की संतान हैं।यही समभाव किसी भी महान आध्यात्मिक परम्परा की सबसे बड़ी पहचान है।आज जब अंतरराष्ट्रीय इस्सयोग समाज के श्रद्धालु ब्रह्मलीन महात्मा सुशील कुमार जी का 89वाँ महाअवतरण दिवस मना रहे हैं, तब यह केवल श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर नहीं,बल्कि उनके विचारों की समकालीन प्रासंगिकता पर गंभीर चिंतन का भी समय है। यदि मानवता को स्थायी शांति, सामाजिक समरसता और नैतिक पुनर्जागरण की दिशा में आगे बढ़ना है, तो उसे विज्ञान और अध्यात्म, विकास और मूल्य, प्रगति और करुणा के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। महात्मा जी का जीवन इसी संतुलन का सजीव उदाहरण है।उनकी सबसे बड़ी विरासत कोई भौतिक उपलब्धि नहीं,बल्कि वह आध्यात्मिक चेतना है,जिसे उन्होंने इस्सयोग के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया। उनका विश्वास था कि जब मनुष्य स्वयं को पहचान लेता है, तभी वह संसार को सही अर्थों में समझ पाता है।आत्मबोध से सेवा का जन्म होता है,सेवा से समर्पण का और समर्पण से ईश्वरानुभूति का।ब्रह्मलीन महात्मा सुशील कुमार जी के श्रीचरणों में यही विनम्र श्रद्धांजलि है कि हम उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लें, अपने जीवन में सदाचार,करुणा और सेवा को स्थान दें तथा आध्यात्मिकता को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित न रखकर अपने आचरण का अभिन्न अंग बनाएँ।यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा होगी और यही इस्सयोग की आध्यात्मिक क्रांति का वास्तविक विस्तार भी।परम आराध्य ब्रह्मलीन महात्मा सुशील कुमार जी एवं पूज्य सद्गुरुदेव माँ विजया जी के श्रीचरणों में कोटिशः प्रणाम।
शक्ति पिंड माँ मनोकामना देवी की जय।

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