अयोध्या 18जनवरी 26*दहलीज़ के भीतर उतरी संवेदना: जब प्रतिनिधि सत्ता नहीं, इंसान बनकर आया
भेलसर(आयोध्या)यह कोई औपचारिक दौरा नहीं न यह किसी प्रचार की पटकथा है न किसी कैमरे की रिहर्स की हुई फ्रेमिंग। यह उस भारत की तस्वीर है, जो अक्सर आँकड़ों में छूट जाता है और घोषणाओं में दब जाता है।
विधानसभा क्षेत्र रुदौली के नेवरा स्थिति सालार पुर गांव में फूस की झोंपड़ी के संकरे द्वार पर बैठा वृद्ध और उसके सामने ज़मीन की ओर झुके रुशदी मियां—यह दृश्य किसी घटना से ज़्यादा एक स्वीकारोक्ति है। स्वीकारोक्ति इस बात की कि लोकतंत्र तब जीवित होता है, जब प्रतिनिधि दहलीज़ के भीतर उतरता है।
वृद्ध के चेहरे पर उम्र की नहीं, हालात की रेखाएँ थीं। वे रेखाएँ जो वर्षों से सवाल पूछती रहीं, पर जवाब की आहट तक नहीं मिली। उसके खुले हाथ किसी शिकायत का इशारा नहीं थे, बल्कि उस भरोसे का प्रतीक थे, जो टूटने के बाद भी कहीं बचा रहता है। आँखों में न उम्मीद की चमक थी, न निराशा की चीख़—बस एक थकी हुई प्रतीक्षा, जो बरसों से किसी अपने के आने का इंतज़ार करती रही।
और सामने खड़े रुशदी मियां—उनका झुकना औपचारिक नहीं था। वह झुकाव सत्ता का नहीं, संवेदना का था। यह वह झुकाव था, जो फाइलों की मोटी जिल्द से नहीं, इंसानी पीड़ा के बोझ से पैदा होता है। हाथ पीछे बँधे—मानो कह रहे हों, “आज मैं बोलने नहीं, सुनने आया हूँ।” यह दृश्य बताता है कि असली नेतृत्व ऊँचे मंचों पर खड़े होकर नहीं, नीची चौखटों पर बैठकर गढ़ा जाता है।
तस्वीर में फूस की दीवारें हैं—गरीबी की नहीं, संघर्ष की कहानी कहती हुई। पीछे अधूरी ईंटों की दीवार—जो अधूरे सपनों का प्रतीक बन जाती है। यह दृश्य साफ़ कहता है कि विकास और व्यवस्था के बीच आज भी बहुत से जीवन अटके हुए हैं—न पूरी तरह टूटे, न पूरी तरह जुड़े। योजनाएँ हैं, पर पहुँच अधूरी है; वादे हैं, पर भरोसा थका हुआ है।
यहाँ राजनीति दिखाई नहीं देती, बल्कि राजनीति का अर्थ उभरता है। न नारा है, न भाषण; न माइक है, न मंच। है तो बस दो इंसान और उनके बीच बहती हुई ख़ामोश बातचीत। यही ख़ामोशी बताती है कि जब प्रतिनिधि सवाल करने नहीं, हाल पूछने आता है, तब लोकतंत्र साँस लेता है। जब वह ऊपर से नहीं, सामने बैठकर देखता है, तब आँकड़े इंसान बनते हैं।
इस मुलाक़ात का सबसे बड़ा संदेश यह है कि बदलाव का रास्ता बड़ी घोषणाओं से नहीं, छोटे-छोटे विश्वासों से बनता है। जब कोई जनप्रतिनिधि दरवाज़े पर खड़े होकर आदेश नहीं देता, बल्कि दहलीज़ के भीतर जाकर दर्द सुनता है, तब उम्मीद ज़िंदा रहती है। यही उम्मीद गाँव से देश तक जाती है—धीरे, मगर सच्ची।
आज जब राजनीति पर अविश्वास का साया गहरा है, यह तस्वीर एक रोशनी की तरह सामने आती है। यह याद दिलाती है कि असली जनसेवा कैमरों के सामने नहीं, लोगों के बीच होती है और जब सत्ता इंसान बनकर आती है, तब फूस की झोंपड़ी भी लोकतंत्र का सबसे मज़बूत भवन बन जाती है।

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