March 5, 2026

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नई दिल्ली9सितम्बर25*यूपीआजतक न्यूज़ चैनल पर श्राद्ध पक्ष का है धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व➖*

नई दिल्ली9सितम्बर25*यूपीआजतक न्यूज़ चैनल पर श्राद्ध पक्ष का है धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व➖*

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नई दिल्ली9सितम्बर25*यूपीआजतक न्यूज़ चैनल पर श्राद्ध पक्ष का है धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व➖*

नई दिल्ली*आश्विन मास में पड़ने वाला श्राद्ध पक्ष पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का पर्व है। साल में एक वक्त ऐसा भी आता है जब गत पूर्वज स्वर्ग से उतर पृथ्वी पर आते हैं। यह वक्त आता है महालया श्राद्ध पक्ष में। मान्यता है कि इस पक्ष में पूर्वज धरा पर सूक्ष्म रूप में निवास करते हैं। साथ ही अपने संबंधियों से तर्पण व पिंडदान प्राप्त कर उन्हें सुख- समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। महालया पक्ष में पिंडदान व श्राद्धकर्म का विशेष महत्व है। पितृ पक्ष के सोलह श्राद्धों का धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक महत्व भी है।
पितृ पक्ष का वैज्ञानिक रहस्य भी है। पक्ष के दौरान पृथ्वी सूर्यमंडल के निकट रहती है। इसलिए श्राद्धकर्ताओं द्वारा किए गए सभी तर्पण आदि सर्वप्रथम सूर्यमंडल पर पहुंचते हैं।
आत्मा कभी न नष्ट होने वाली उर्जा है, जो केवल मोक्ष प्राप्त होने पर ईश्वर की अनन्त उर्जा में समाहित हो जाती है। विज्ञान अनुसार उर्जा हमेशा संरक्षित रहती है, यह एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो जाती है। इसीलिए धर्मशास्त्र में कहा गया है, मृत्यु अन्त नहीं प्रारम्भ है। जीवित और मृत भेद मात्र स्थूल जगत तक ही सीमित रहता है, सूक्ष्म जगत में सभी जीवित हैं। प्रत्येक शिशु का जुड़ाव उसके पूर्वजों से बना रहता है।
क्रोमोजोम्स के माध्यम से वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है कि नवजात शिशु में कुछ गुण दादा व परदादा के व कुछ गुण नानामह व नाना के समाहित रहते हैं। जैनैटिक साइन्स पर शोधकर्ताओं के अनुसार आज भी हम अपने पूर्वजों से जुड़े हुए है, पितरो के डी.एन.ए. का विस्तार ही हमारा अस्तित्व है। वैज्ञानिकों ने पितरों के सूक्ष्म शरीर को *‘एक्टोप्लाज़्म’* की संज्ञा दी है। पितरों के निमित्त श्राद्ध आदि कर्म करने से पितरों के साथ-साथ स्वयं का भी कल्याण होता
श्राद्ध आत्मा के गमन जिसे संस्कृत में प्रैति कहते हैं, से जुड़ा हुआ है। प्रैति ही बाद में बोलचाल में प्रेत बन गया। यह कोई भूत-प्रेत वाली बात नहीं है। शरीर में आत्मा के अतिरिक्त मन और प्राण हैं। आत्मा तो कहीं नहीं जाती, वह तो सर्वव्यापक है, उसे छोड़ दें तो शरीर से जब मन को निकलना होता है, तो मन प्राण के साथ निकलता है। प्राण मन को लेकर निकलता है। प्राण जब निकल जाता है तो शरीर को जीवात्मा को मोह रहता है। इसके कारण वह शरीर के इर्द-गिर्द ही घूमता है, कहीं जाता नहीं। शरीर को जब नष्ट किया जाता है, उस समय प्राण मन को लेकर चलता है। मन कहाँ से आता है? कहा गया है चंद्रमा मनस: लीयते यानी मन चंद्रमा से आता है। यह भी कहा है कि चंद्रमा मनसो जात: यानी मन ही चंद्रमा का कारक है। मन का जुड़ाव चंद्रमा से है। इसलिए हृदयाघात जैसी समस्याएं पूर्णिमा के दिन अधिक होती हैं।
चंद्रमा वनस्पति का भी कारक है। रात को चंद्रमा के कारण वनस्पतियों की वृद्धि अधिक होती है। इसलिए रात को ही पौधे अधिक बढ़ते हैं। दिन में वे सूर्य से प्रकाश संश्लेषण के द्वारा भोजन लेते हैं और रात चंद्रमा की किरणों से बढ़ते हैं।
दाह संस्कार के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होगा, मन उसी ओर अग्रसर होगा। प्राण मन को उस ओर ले जाएगा। चूंकि 27 दिनों के अपने चक्र में चंद्रमा 27 नक्षत्र में घूमता है, इसलिए चंद्रमा घूम कर अठाइसवें दिन फिर से उसी नक्षत्र में आ जाता है। मन की यह 28 दिन की यात्रा होती है। इन 28 दिनों तक मन की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए श्राद्धों की व्यवस्था की गई है।
चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी 385000 कि.मी. की दूरी पर है। हम जिस समय पितृपक्ष मनाते हैं, यानी कि आश्विन महीने के पितृपक्ष में, चंद्रमा पृथ्वी के सर्वाधिक निकट यानी कि लगभग 381000 कि.मी. पर ही रहता है। उसका परिक्रमापथ ही ऐसा है कि वह इस समय पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है। इसलिए कहा जाता है कि पितर हमारे निकट आ जाते हैं। शतपथ ब्राह्मण में कहा है *विभु: उध्र्वभागे पितरो वसन्ति यानी विभु* अर्थात् चंद्रमा के दूसरे हिस्से में पितरों का निवास है। चंद्रमा का एक पक्ष हमारे सामने होता है जिसे हम देखते हैं। परंतु चंद्रमा का दूसरा पक्ष हम कभी देख नहीं पाते। इस समय चंद्रमा दक्षिण दिशा में होता है। दक्षिण दिशा को यम का घर माना गया है। आज हम यदि आकाश को देखें तो दक्षिण दिशा में दो बड़े सूर्य हैं जिनसे विकिरण निकलता रहता है। हमारे ऋषियों ने उसे श्वान प्राण से चिह्नित किया है। शास्त्रों में इनका उल्लेख लघु श्वान और वृहद श्वान के नाम से हैं। इसका उल्लेख अथर्ववेद में भी आता है। वहाँ कहा है श्यामश्च त्वा न सबलश्च प्रेषितौ यमश्च यौ पथिरक्षु श्वान। अथर्ववेद 8/1/19 के इस मंत्र में इन्हीं दोनों सूर्यों की चर्चा की गई है। श्राद्ध में हम एक प्रकार से उसे ही हवि देते हैं कि पितरों को उनके विकिरणों से कष्ट न हो।
इस प्रकार से देखा जाए तो पितृपक्ष और श्राद्ध में हम न केवल अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं, बल्कि पूरा खगोलशास्त्र भी समझ ले रहे हैं। श्रद्धा और विज्ञान का यह एक अद्भुत मेल है, जो हमारे ऋषियों द्वारा बनाया गया है।
पितर का अर्थ होता है पालन या रक्षण करने वाला। पितर शब्द पा रक्षणे धातु से बना है। इसका अर्थ होता है पालन और रक्षण करने वाला। एकवचन में इसका प्रयोग करने से इसका अर्थ जन्म देने वाला पिता होता है और बहुवचन में प्रयोग करने से पितर यानी सभी पूर्वज होता है।
मृत्युलोक के देवता यमराज इस दौर में आत्मा को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे अपने परिवार जन के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। पितृपक्ष में पितरों को याद किया जाता है। इसके महत्व के बारे में पुराणों में भी वर्णन मिलता है।
पितृपक्ष में पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष दूर होते हैं। जन्म कुंडली में पितृ दोष होने से व्यक्ति को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जिन लोगों की कुंडली में यह दोष पाया जाता है, उन्हें हर कार्य में बाधा का सामना पड़ता है। मान-सम्मान में भी कमी बनी रहती है। जमा पूंजी नष्ट हो जाती है, रोग आदि भी घेर लेते हैं।
भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक पितृ पक्ष में पूर्वजों की आत्मा शांति के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। इस वर्ष 7 से 21 सितंबर तक यह समय है लेकिन एक ही पक्ष में दो ग्रहण लगने से चिंता है। 7 सितंबर को चंद्र ग्रहण भारत में दिखेगा जिसका सूतक काल मान्य होगा इसलिए श्राद्ध दोपहर से पहले करें।
*चंद्र ग्रहण पर मान्य होगा सूतक काल*
इसे लेकर लोगों में असमंजस की स्थिति है कि क्या किया जाए। दरअसल, 7 सितंबर को चंद्र ग्रहण लग रहा है, जो भारत में दिखाई देगा, इसलिए इसका सूतक काल भी मान्य होगा। चंद्र ग्रहण 7 सितंबर 2025 को रात 9 बजकर 58 मिनट से शुरू होगा।
ग्रहण का मोक्ष 3 घंटे 28 मिनट बाद रात 1 बजकर 26 मिनट पर होगा। इसका सूतक काल 9 घंटे पहले शुरू हो जाएगा। ऐसे में दोपहर 12 बजकर 58 मिनट से पहले श्राद्ध और तर्पण करना उचित होगा।

*सूर्य ग्रहण पर नहीं लगेगा सूतक काल*
इसके बाद 21 सितंबर को लगने वाला सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इसलिए इस ग्रहण का सूतक काल भी नहीं माना जाएगा। लिहाजा, इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने में कोई परेशानी नहीं है। इसके अलावा ग्रहण के दिन दान और पुण्य भी करना चाहिए। पितृ पक्ष में यह समय होने से इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
*पितृपक्ष में श्राद्ध की तिथियां*
पूर्णिमा का श्राद्ध – 7 सितंबर
प्रतिपदा का श्राद्ध – 8 सितंबर
द्वितीया का श्राद्ध – 9 सितंबर
तृतीया और चतुर्थी का श्राद्धा – 10 सितंबर
पंचमी का श्राद्ध – 11 सितंबर
षष्ठी का श्राद्ध – 12 सितंबर
सप्तमी का श्राद्ध – 13 सितंबर
अष्टमी का श्राद्ध – 14 सितंबर
नवमी का श्राद्ध – 15 सितंबर
दशमी का श्राद्ध – 16 सितंबर
एकादशी का श्राद्ध – 17 सितंबर
द्वादशी का श्राद्ध – 18 सितंबर
त्रयोदशी का श्राद्ध – 19 सितंबर
चतुर्दशी का श्राद्ध – 20 सितंबर
सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध – 21 सितंबर
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