जोधपुर20अगस्त 25*जब अमेरिकी चैलेंज को स्वीकार कर राजीव गांधी ने दुनिया को दिया इंडियन ‘सुपर कंप्यूटर’!*
👉ये बात साल 1988 की है। देश के प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी। दुनिया के ताकतवर देश कंप्यूटर युग में प्रवेश कर रहे थे। इसी समय अमेरिका की एक कंपनी ‘क्रे’ ने सुपर कंप्यूटर बनाने का दावा किया।
👉दूरदर्शी सोच वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी को लगा कि भारत के पास भी सुपर कंप्यूटर होना चाहिए। सो उन्होंने अधिकारियों को इस कंप्यूटर को बनाने वाली कंपनी से संपर्क करने को कहा। मगर अमेरिका की इस कंपनी ने भारत को ये कंप्यूटर बेचने से मना कर दिया।
➡️ये वो समय था जब किसी भी अमेरिकी कंपनी को अपना सामान विदेश में बेचने के लिए अमेरिकी सरकार से अनुमति लेनी होती थी। कंपनी ने भारत को ‘सुपर कंप्यूटर’ बेचने से पहले अमेरिकी सरकार से अनुमति मांगी तो सरकार ने इनकार कर दिया।
👉भारत लौटकर अधिकारियों ने ये बात प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बताई। राजीव को ये बात थोड़ी सी चुभी, कुछ देर तक वे शांत रहे। फिर उन्होंने कहा कि *अब अमेरिका देगा तो भी अब हम ‘सुपर कंप्यूटर’ खरीदेंगे नहीं, अब हम पूरी दुनिया को ‘सुपर कंप्यूटर’ बेचेंगे।* सामने बैठे अधिकारियों को कुछ समझ नहीं आया। राजीव ने तुरंत देश के चुनिंदा वैज्ञानिकों की मीटिंग बुलाने का आदेश दिया।
👉ठीक दूसरे दिन वैज्ञानिकों के साथ राजीव गांधी की मीटिंग शुरू हो चुकी थी। राजीव ने वैज्ञानिकों से पूछा- भारत में ‘सुपर कंप्यूटर’ कैसे बनेगा ? इस प्रश्न के बाद कुछ देर तक मीटिंग में सन्नाटा छा गया। तभी अचानक एक आवाज आती है कि यहां ‘सुपर कंप्यूटर’ बनना मुश्किल है। बहुत पैसा खर्च करना पड़ेगा, हमारे पास तो अभी कुछ भी नहीं है।
➡️वैज्ञानिक की बात सुनकर *राजीव गांधी ने कहा कि ये चिंता मत करिए कि बहुत पैसा खर्च करना होगा

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