वाराणसी7जनवरी26*काशी में बढ़ा साइबेरियन पक्षियों का परिवार, नन्हे परिंदे भर रहे पहली उड़ान, विदेशी मेहमानों की चहचहाहट से गूंज रहे गंगा घाट*
*वाराणसी।* ठंड के मौसम में काशी आने वाले साइबेरियन प्रवासी पक्षियों की संख्या प्रजनन काल के बाद तेजी से बढ़ने लगी है। गंगा नदी और उसके घाट इन दिनों इन पक्षियों की चहचहाहट और रंग-बिरंगे पंखों से गुलजार नजर आ रहे हैं। प्रजनन के बाद जब इनके बच्चे उड़ने लायक हो रहे हैं, तब घाटों पर इनकी मौजूदगी और भी बढ़ गई है, जो काशी की प्राकृतिक सुंदरता को खास बना रही है।
*साइबेरिया से काशी तक का सफर*
हर साल अक्टूबर-नवंबर से मार्च तक साइबेरियन प्रवासी पक्षी कड़ाके की ठंड से बचने के लिए काशी का रुख करते हैं। करीब 6 हजार किलोमीटर की यात्रा करते हुए ये पक्षी विशाल हिमालय के ऊपर से उड़ते हुए काशी, प्रयागराज आदि स्थानों पर पहुंचते हैं। दिसंबर के मध्य से फरवरी के अंत तक इनका प्रमुख प्रजनन काल रहता है। इस दौरान गंगा तट का शांत वातावरण, जल और भोजन की उपलब्धता इनके लिए अनुकूल मानी जाती है। प्रजनन के बाद मार्च-अप्रैल तक इनके बच्चे उड़ान भरने में सक्षम हो जाते हैं और इसके बाद ये पक्षी वापस अपने मूल स्थान साइबेरिया लौट जाते हैं।
*घाटों पर बढ़ी चहल-पहल*
इन दिनों अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, राजघाट सहित अन्य प्रमुख घाटों पर साइबेरियन पक्षियों की संख्या बढ़ती दिख रही है। इनके रंगीन पंख और मधुर कलर घाटों की शोभा बढ़ा रहे हैं। श्रद्धालु, सैलानी और स्थानीय लोग इन मनमोहक दृश्यों को देखकर सहज ही आकर्षित हो रहे हैं।
*नावों के साथ उड़ते दिखे पक्षी*
सुबह और शाम के समय गंगा में नाव की सैर के दौरान लोग इन प्रवासी पक्षियों को दाना खिलाते नजर आते हैं। दाना मिलते ही ये पक्षी नावों के पीछे-पीछे उड़ते हैं और पानी की सतह पर उतरकर चुगते दिखाई देते हैं। यह दृश्य पर्यटकों के लिए खास आकर्षण बन गया है, जिसे लोग अपने मोबाइल कैमरों में कैद कर रहे हैं।
*पर्यावरण संतुलन का सकारात्मक संकेत*
पक्षी विशेषज्ञों और पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि साइबेरियन पक्षियों की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि गंगा घाटों का पर्यावरण इनके लिए अब भी अनुकूल है। यह जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन के लिहाज से एक अच्छा संकेत माना जा रहा है।
*संरक्षण और सावधानी जरूरी*
विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि पक्षियों को दाना खिलाते समय सावधानी बरती जानी चाहिए, ताकि उनके प्राकृतिक आहार और व्यवहार पर असर न पड़े। घाटों पर शोरगुल और प्लास्टिक कचरे से बचाव जरूरी है, जिससे प्रवासी पक्षी सुरक्षित और शांत वातावरण में अपना प्रवास पूरा कर सकें। काशी के घाटों पर साइबेरियन पक्षियों की यह मौजूदगी न केवल शहर की सुंदरता बढ़ा रही है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के महत्व को भी उजागर कर रही है।

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