March 23, 2026

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बाँदा 22मार्च26*30अप्रैल को उठनी थी डोली, अब आंखों से बह रहे आंसू...*

बाँदा 22मार्च26*30अप्रैल को उठनी थी डोली, अब आंखों से बह रहे आंसू…*

*BREAKING NEWS BANDA-*

बाँदा 22मार्च26*30अप्रैल को उठनी थी डोली, अब आंखों से बह रहे आंसू…*

युपीआजतक बांदा से ब्यूरो सुनैना निषाद की रिपोर्ट

*बाँदा* -खैरई गाँव का वो मंजर जिसे देख पत्थर भी पसीज जाए: तिनका-तिनका जोड़कर सजाया था बेटी का संसार, बसाने का समान आग की एक लपट ने छीन लीं खुशियाँ”
बेटी के जन्म होते ही एक पिता अपनी पूरी जिंदगी पसीना बहाता है ताकि उसकी संतानों के सिर पर छत रहे और बेटियों के हाथ सम्मान से पीले हो सकें। लेकिन पैलानी तहसील के खैरई निवासी बाबूराम निषाद की किस्मत ने ऐसा क्रूर मजाक किया कि आज उनके घर में शहनाइयों की जगह सिसकियों ने लें लिया है जन्म जिस आँगन में 30 अप्रैल को बेटी शोभा की डोली उठनी थी, आज उसी आँगन में सिर्फ काली राख और अधजले अरमान बिखरे पड़े हैं।
आपको बताते चलें किसान की आमदनी ही फसल काटने के बाद होती है एक तरफ मौसम की मार वहीं दूसरी तरफ बुधवार की वो दोपहर (11 मार्च) किसी काल से कम नहीं थी। जब बाबूराम अपने भाइयों चुन्नू और शिवमंगल के साथ खेतों में तपती धूप में फसल काट रहे थे, तब उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि गाँव की ओर से उठ रहा काला धुआं उनके सपनों का जनाज़ा लेकर आ रहा है। बदहवास होकर जब ये भाई घर पहुंचे, तो वहाँ न छत बची थी, न अनाज, और न ही वो संदूक जिसमें बेटी की शादी के लिए पाई-पाई जोड़कर रखे गए 50 हजार रुपये और कुछ जेवर रखे थे।सब जल गया सहाब
बाबूराम के घर की चौखट और दरवाजे तक जलकर कोयला हो गए हैं। उनकी बेटी शोभा की आँखें पथरा गई हैं। पिता ने रोते हुए बताया— “बेटी के लिए जो कपड़े खरीदे थे, जो अनाज जुटाया था, सब खाक हो गया। आग ने सिर्फ घर नहीं जलाया, मेरा मान-सम्मान और मेरी हिम्मत भी जला दी है।” तीनों भाइयों का करीब 5 से 7 लाख का नुकसान हुआ है। शिवमंगल और चुन्नू की जमा-पूँजी भी इस आग की भेंट चढ़ गई। आज ये परिवार खुले आसमान के नीचे एक-एक दाने को मोहताज है।
मजबूरी की इंतहा: पॉलिथीन के नीचे कटी काली रात
कल (20 मार्च) की रात जब आसमान से आफत (बारिश और आंधी) बरस रही थी, तब यह परिवार फटी हुई पॉलिथीन को सिर पर ताने जागते हुए रात काट रहा था। वह केवल ‘लेखपाल’ की एक रिपोर्ट तक सीमित रह गया। क्या एक गरीब की बेटी की शादी और उसके उजड़े आशियाने की कीमत सिर्फ एक कागजी खानापूर्ति है?एक अपील: क्या हम इस बेटी के ‘मामा-ताऊ’ नहीं बन सकते ?
बाबूराम निषाद आज अपनी बेबसी पर रो रहे हैं। उन्होंने अपनी बेटी की शादी रोक दी है क्योंकि उनके पास अब खिलाने को रोटी तक नहीं बची, बेटी का दान-दहेज तो बहुत दूर की बात है।मदद के लिए पुकार
एक समाज के तौर पर हमारा भी फर्ज है। आइए, इस दुखी पिता के आंसुओं को पोंछने का प्रयास करें। क्या पता, हमारे एक छोटे से सहयोग से शोभा की डोली फिर से सज सके और उस उजाड़ घर में फिर से रोशनी लौट आए।
क्या प्रशासन समय रहते मदद करेगा?
क्या सांसद, मंत्री, विधायकआगे बढ़कर आएंगे?
क्या तमाम समाजसेवी मदद के लिए आगे आएंगे बाँदा की प्रसासन से लेकर आमजनमास मदद करने के लिए अपने हाथ खोलेंगे?
संपर्कसूत्र):
बाबूराम निषाद: 8177005116
शिवमंगल निषाद: 9512448615
चुन्नू निषाद: 7607812695

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