May 20, 2026

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नई दिल्ली20मई26*हथियारों पर रिकॉर्ड 8.91 लाख करोड़ रुपये, लेकिन किन्नर कल्याण का बजट खर्च भी नहीं कर पा रही सरकार_*

नई दिल्ली20मई26*हथियारों पर रिकॉर्ड 8.91 लाख करोड़ रुपये, लेकिन किन्नर कल्याण का बजट खर्च भी नहीं कर पा रही सरकार_*

नई दिल्ली20मई26*हथियारों पर रिकॉर्ड 8.91 लाख करोड़ रुपये, लेकिन किन्नर कल्याण का बजट खर्च भी नहीं कर पा रही सरकार_*

*नई दिल्ली:* आज सुबह जब हमारी संपादकीय बैठक शुरू हुई, तो मेज पर दो खबरें थीं. पहली खबर अंतरराष्ट्रीय हलकों से आई थी, जिसने भारत के बढ़ते सैन्य रसूख पर मुहर लगाई. दूसरी खबर एक समाचार पत्र के पन्नों में दबी एक खोजी रिपोर्ट थी, जो हमारे अपने समाज के सबसे उपेक्षित कोने की बेबसी बयां कर रही थी. पहली खबर कहती है कि भारत ने अपनी सरहदों को सुरक्षित करने के लिए 92.1 बिलियन डॉलर यानी लगभग 7.6 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर डाले हैं. वहीं दूसरी खबर यह पोल खोलती है कि देश के करीब छह लाख ट्रांसजेंडर्स के कल्याण के लिए जो चंद करोड़ रुपये रखे गए थे, वे भी अफसरों की सुस्ती और कागजी चक्रव्यूह के कारण बिना खर्च हुए सरकारी खजाने में वापस लौट गए. यह विरोधाभास सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है. यह हमारे देश की प्राथमिकताओं, हमारी व्यवस्था की सोच और हमारे बजट प्रबंधन का वह सच है जो अक्सर राष्ट्रवाद और चमचमाती हेडलाइंस के शोर में कहीं खो जाता है. जब मई 2025 में सीमा पर तनाव बढ़ा, तो मिसाइलों, ड्रोनों और लड़ाकू जहाजों के लिए तिजोरी का मुंह तुरंत खोल दिया गया. सुरक्षा के नाम पर एक फाइल को रुकने नहीं दिया गया.

लेकिन जब बात समाज के सबसे हाशिए पर खड़े किन्नर समुदाय को मुख्यधारा में लाने की आई, तो उसी तिजोरी पर लालफीताशाही का ऐसा ताला लटका कि करोड़ों का बजट धरा का धरा रह गया. आखिर हम एक राष्ट्र के तौर पर कहां जा रहे हैं? क्या सरहद की सुरक्षा ही हमारी इकलौती चिंता है, और समाज के भीतर जो लोग हर दिन पहचान और वजूद की जंग लड़ रहे हैं, उनके प्रति हमारी कोई जवाबदेही नहीं है? इस पूरे गणित और सामाजिक बेरुखी को समझने के लिए हमें गहराई में उतरना होगा. यह कहानी सिर्फ सेना के बजट और एक सरकारी योजना की नहीं है. यह कहानी उस मिडिल क्लास टैक्सपेयर की भी है जो दिन-रात मेहनत करके टैक्स भरता है और यह उम्मीद करता है कि उसका पैसा देश को हर मोर्चे पर मजबूत बनाएगा.