October 6, 2026

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हल्द्वानी 6 अक्टूबर 26*🚩 पितृ दोष से मुक्ति का महामार्ग, सर्वपितृ अमावस्या और दत्तगुरु साधना- स्वामी प्रणवानंद योगी 

हल्द्वानी 6 अक्टूबर 26*🚩 पितृ दोष से मुक्ति का महामार्ग, सर्वपितृ अमावस्या और दत्तगुरु साधना- स्वामी प्रणवानंद योगी 

हल्द्वानी 6 अक्टूबर 26*🚩 पितृ दोष से मुक्ति का महामार्ग, सर्वपितृ अमावस्या और दत्तगुरु साधना- स्वामी प्रणवानंद योगी 

वर्ष 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को है। इसी दिन पितृ पक्ष का समापन और पितरों का विसर्जन माना जाता है।

🕉️ तिथि एवं समय

• अमावस्या तिथि प्रारंभ — 9 अक्टूबर 2026, रात्रि 9:35 बजे से
• अमावस्या तिथि समाप्त — 10 अक्टूबर 2026, रात्रि 9:19 बजे तक
• उदया तिथि — 10 अक्टूबर 2026
अतः सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध 10 अक्टूबर को किया जाएगा।

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🔱 (क) “ॐ श्री गुरुदेव दत्त” महामंत्र का जाप

दत्तात्रेय उपासना की परंपरा में “ॐ श्री गुरुदेव दत्त” मंत्र का पितृ-स्मरण और पितृशांति के लिए विशेष महत्त्व माना जाता है।

साधक अपनी श्रद्धा, समय और सामर्थ्य के अनुसार जाप कर सकता है—

1. सामान्य स्थिति / कृतज्ञता के लिए
प्रतिदिन 1 से 2 माला — अर्थात् 108 या 216 जाप।

2. अधिक मानसिक या पारिवारिक बाधाओं की स्थिति में
प्रतिदिन 3 से 5 माला अथवा अपनी सुविधा के अनुसार अधिक समय तक जाप।

3. विशेष अनुष्ठान के रूप में
9 से 11 माला या साधक की सामर्थ्य के अनुसार अधिक जाप किया जा सकता है।

परिवार के सदस्य भी सामूहिक रूप से दत्तगुरु का स्मरण और मंत्र-जाप कर सकते हैं।

॥ ॐ श्री गुरुदेव दत्त ॥

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🪔 (ख) दक्षिण दिशा में दीपदान

सर्वपितृ अमावस्या की संध्या को घर की दक्षिण दिशा में सरसों के तेल अथवा घी का दीपक जलाकर दत्तगुरु का ध्यान करें।

प्रार्थना करें—

“हे दत्तगुरु! हमारे जितने भी पूर्वज अतृप्त हैं, आप उन्हें अपनी शरण प्रदान करें, उन्हें सद्गति दें और हमारे परिवार को पितृ ऋण से मुक्त होने की शक्ति प्रदान करें।”

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🍚 (ग) अन्न एवं जल का दान

अमावस्या के दिन अपनी श्रद्धा के अनुसार—

🐄 गौ माता को भोजन
🐕 कुत्ते को भोजन
🐦 कौओं को अन्न
🐜 चींटियों को भोजन

अर्पित करें।

साथ ही किसी जरूरतमंद व्यक्ति अथवा ब्राह्मण को सात्विक भोजन और वस्त्र आदि का दान करना भी पुण्यकारी माना गया है।

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🕉️ पंचबलि कर्म का महत्व

सर्वपितृ अमावस्या के दिन पंचबलि की परंपरा का विशेष महत्त्व माना जाता है। श्राद्ध में अन्न का एक अंश विभिन्न जीवों के लिए निकालना जीवमात्र के प्रति कृतज्ञता और सह-अस्तित्व की भावना का प्रतीक है।

🥣 श्राद्ध भोजन की तैयारी

श्राद्ध का भोजन सात्विक रखा जाता है। परंपरा के अनुसार इसमें खीर, पूड़ी, उड़द के बड़े अथवा अन्य सात्विक व्यंजन बनाए जा सकते हैं।

भोजन बनाते समय शुद्धता और सात्त्विकता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

🍽️ पंचबलि निकालने की सरल विधि

श्राद्ध भोजन तैयार होने के बाद, ब्राह्मण भोजन अथवा अन्य अर्पण से पहले भोजन के पाँच अलग-अलग भाग निकालकर श्रद्धापूर्वक अर्पित किए जाते हैं।

1️⃣ गो-बलि 🐄

गौ माता के लिए भोजन का एक भाग निकालकर श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।

गौ को सनातन परंपरा में पवित्रता और समस्त देवशक्तियों के प्रतीक के रूप में सम्मान दिया गया है।

2️⃣ श्वान-बलि 🐕

कुत्ते के लिए भोजन का दूसरा भाग निकालें। परंपरा में श्वान का संबंध यमराज के दूतों श्याम और शबल से जोड़ा गया है।

भोजन किसी कुत्ते को श्रद्धापूर्वक खिलाएं।

3️⃣ काक-बलि 🐦‍⬛

तीसरा भाग कौओं के लिए रखें। सनातन परंपरा में कौए को पितरों से संबंधित प्रतीक माना गया है।

इसे किसी स्वच्छ एवं सुरक्षित ऊँचे स्थान पर रखकर पितरों की तृप्ति की प्रार्थना करें।

4️⃣ देवादि-बलि 🕊️

चौथा भाग अन्य पक्षियों एवं जीवों के लिए रखें। यह प्रकृति के अन्य जीवों के प्रति करुणा और अन्न-साझेदारी की भावना को दर्शाता है।

5️⃣ पिपीलिकादि-बलि 🐜

पाँचवाँ भाग चींटियों एवं छोटे जीवों के लिए रखा जाता है। इसे किसी स्वच्छ स्थान अथवा वृक्ष की जड़ के समीप रखा जा सकता है।

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⚠️ पंचबलि कर्म में ध्यान रखने योग्य बातें

1. दिशा
पितृकर्म में दक्षिण दिशा का विशेष महत्त्व माना जाता है।

2. कुश एवं जल
परंपरा के अनुसार कुश और जल का प्रयोग करके संकल्प एवं तर्पण किया जा सकता है।

3. दत्तगुरु का स्मरण
पंचबलि एवं पितृकर्म करते समय मन में श्रद्धापूर्वक—

॥ ॐ श्री गुरुदेव दत्त ॥

का स्मरण करें।

4. समय
श्राद्ध कर्म सामान्यतः दिन के अपराह्न भाग में किया जाता है। स्थानीय पंचांग में दिए गए कुतुप, रौहिण एवं अपराह्न काल को प्राथमिकता देना उचित है।

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🔱 पितृ श्राद्ध और दत्तगुरु का आध्यात्मिक संबंध

दत्तात्रेय परंपरा में दत्तगुरु को गुरु-तत्त्व, करुणा और आध्यात्मिक उन्नति के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। पितृ पक्ष में दत्तगुरु का स्मरण साधक को अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, सेवा, दान और आत्मचिंतन की भावना से जोड़ता है।

1️⃣ पितरों की सद्गति की प्रार्थना

पितृकर्म का मूल भाव अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और उनकी सद्गति की कामना है।

दत्तगुरु का स्मरण इसी प्रार्थना को गुरु-तत्त्व से जोड़ता है।

2️⃣ पितृशांति के लिए दत्तगुरु मंत्र

श्रद्धालु पितृ पक्ष में—

॥ ॐ श्री गुरुदेव दत्त ॥

का जाप कर सकते हैं।

जाप की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा, नियमितता और शुद्ध भाव है।

3️⃣ श्राद्ध परंपरा और ऋषि निमि

श्राद्ध की उत्पत्ति से संबंधित पुराणिक आख्यानों में ऋषि निमि की कथा आती है। उनके पुत्र के निधन के बाद उन्होंने पितृकर्म किया और इसी प्रसंग से श्राद्ध परंपरा की व्याख्या की जाती है।

इसलिए श्राद्ध केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति स्मरण, कृतज्ञता और ऋण स्वीकार करने की परंपरा भी है।

4️⃣ दत्तगुरु और त्रिदेव तत्त्व

दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त तत्त्व के रूप में मानने की परंपरा है। इसलिए दत्तगुरु की उपासना में सृष्टि, पालन और संहार—तीनों दिव्य शक्तियों के समन्वित तत्त्व का ध्यान किया जाता है।

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🕉️ श्राद्ध पक्ष में दत्तगुरु साधना कैसे करें?

यदि आप पितृशांति और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा के भाव से साधना करना चाहते हैं तो—

1. मंत्र जाप

प्रतिदिन अपनी सुविधा के अनुसार—

॥ ॐ श्री गुरुदेव दत्त ॥

का जाप करें।

एक-दो माला से शुरुआत करके साधक अपनी श्रद्धा एवं सामर्थ्य के अनुसार जाप बढ़ा सकता है।

2. दीपक

संध्या के समय दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर दत्तगुरु से अपने पूर्वजों की सद्गति की प्रार्थना करें।

3. तर्पण एवं दान

पितरों के निमित्त विधिपूर्वक तर्पण करें तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र और आवश्यक सामग्री का दान करें।

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🕰️ श्राद्ध और तर्पण के शुभ मुहूर्त

स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में कुछ अंतर संभव है। दिए गए समयानुसार—

• कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:34 बजे से दोपहर 12:21 बजे तक
• रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:21 बजे से 1:07 बजे तक
• अपराह्न काल: दोपहर 1:07 बजे से 3:28 बजे तक

अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार अंतिम समय अवश्य देख लें।

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🌑 सर्वपितृ अमावस्या का महत्व

सर्वपितृ अमावस्या को महालय अमावस्या भी कहा जाता है।

इस दिन—

🔸 जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, उनका श्राद्ध किया जाता है।
🔸 किसी कारण से छूटे हुए पितृकर्म को करने की परंपरा है।
🔸 पितृ पक्ष का समापन होता है।
🔸 पितरों के प्रति अंतिम श्रद्धा, तर्पण और विसर्जन का भाव प्रकट किया जाता है।

इसलिए यह दिन केवल कर्मकांड का दिन नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व में पूर्वजों के योगदान को स्मरण करने और उनके प्रति कृतज्ञ होने का पवित्र अवसर है।

हमारे भीतर हमारे पूर्वजों की जैविक विरासत, संस्कार और पारिवारिक स्मृतियाँ किसी न किसी रूप में आगे बढ़ती हैं। इसलिए पितृ स्मरण का वास्तविक संदेश है—

“जिस वंश ने हमें जीवन दिया, उसके प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और अपने कर्तव्य का निर्वाह।”

और इसी भाव के साथ—

🔱 ॥ ॐ श्री गुरुदेव दत्त ॥ 🔱
स्वामी प्रणवानंद योगी
सूर्या देवी Haldwani