जम्मू कश्मीर24मई2025*फतेह सिंह बुटोला की 27वीं पुण्यतिथि पर श्रद्दांजलि अर्पित की-योगेन्द्र यादव।
जयंती/पुण्यतिथि पर इनके बारे में
फतेह सिंह बुटोला
जन्म 10 अक्टूबर 1917
अविभाजित भारत की ब्रिटिश प्रेसीडेंसी के इंडियन किंगडम के उत्तरी भाग के पठारी और दरियाई क्षेत्र के आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत (युनाइटेड प्रोविंस) के अवध प्रांत के गढ़वाल संभाग की पौड़ी गढ़वाल रियासत के बधाण पट्टी क्षेत्र के सिमली गांव पिंडार नदी किनारे अब सिमली गांव तहसील कर्णप्रयाग और जिला चमोली पहले उत्तर प्रदेश अब उत्तराखंड
निधन 24 मई 1998
सिमली गाँव जिला चमोली पहले उत्तर प्रदेश अब उत्तराखंड
फतेह सिंह बुटोला
वह एक स्वतंत्रता सेनानी,क्रांतिकारी,सुभाष वादी,आज़ाद हिन्द फौज में मेजर,दानी और समाज सुधारक थे।इनका जन्म अविभाजित भारत की ब्रिटिश प्रेसीडेंसी के इंडियन किंगडम के उत्तरी भाग के पठारी और दरियाई क्षेत्र के आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत (युनाइटेड प्रोविंस) के अवध प्रांत के गढ़वाल संभाग की पौड़ी गढ़वाल रियासत के बधाण पट्टी क्षेत्र के सिमली गांव पिंडार नदी किनारे अब सिमली गांव तहसील कर्णप्रयाग और जिला चमोली पहले उत्तर प्रदेश अब उत्तराखंड में एक मध्यम वर्गीय हिंदू राजपूत जमींदार परिवार में हुआ था।इनकी प्राथमिक शिक्षा गांव में हुई थी और उन्होंने अपनी मैट्रिक चमोली से की थी।अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वह अपनी खेती बाड़ी देखने लगे।1940 में जब पूरा देश आजादी की लड़ाई में सक्रिय था तब वे 18 ब्रिटिश इंडियन आर्मी के रॉयल गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हो गए।नियति ने उनके लिए कुछ खास तय कर रखा था।15 फरवरी 1942 को, उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आह्वान का जवाब दिया और सिंगापुर में नेताजी द्वारा गठित आज़ाद हिंद फौज में शामिल होने के लिए ब्रिटिश आर्मी छोड़कर एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया।अपनी अटूट प्रतिबद्धता के प्रदर्शन के कारण वह आज़ाद हिंद फौज में शामिल हो गए।उनके लंबे कद काठ के कारण नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उनकी वीरता को पहचाना और उन्हें अग्रिम पंक्ति में रखा।नेताजी ने उनको आज़ाद हिन्द फौज में मेजर के पद पर आसीन किया।नेताजी के मार्गदर्शन में उन्होंने आज़ाद हिंद में तैनात रहते हुए स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।सिंगापुर में रहते हुए उनके कानों में 1.50 तोला कान के कुंडल थे जो उन्होंने नेताजी के कहने पर उन्होंने ये कुंडल आजाद हिंद फौज को दान स्वरूप भेंट कर दिए।उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ इम्फाल और बर्मा की लड़ाई में सक्रिय रूप से भाग लिया था।5 नवम्बर 1945 को लालकिले पर आजाद हिंद फौज के सेनानियों पर चल रहे मुकदमे के दौरान फतेह सिंह बुटोला को ब्रितानी हुकूमत द्वारा नजरबंद किया हुआ था।लाल किले में खुले में चले मुकदमे में पंडित जवाहरलाल नेहरू आदि के बैरिस्टर के रूप में पेश होने के बाद अंग्रेजों ने सबको देश का मूड़ देखते हुए मुक्त कर दिया था।आज़ादी के बाद वह अपने गांव वापिस आकर अपनी खेती बाड़ी और समाज सुधार के कामों में व्यस्त रहते थे।उनके गांव लौटने के बाद भी 1960 तक सरकार की ओर से उनकी जासूसी होती रही।नेताजी और आज़ाद हिंद फौज से जुड़ी उनकी यादें नेताजी और आज़ाद हिंद संग्रहालय में सावधानीपूर्वक संरक्षित की गई हैं जो लाल किले के भीतर स्थित है और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सार को समेटे हुए है।24 मई 1998 को सिमली गाँव जिला चमोली पहले उत्तर प्रदेश अब उत्तराखंड में उनका निधन हो गया था।

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