हरिद्वार 21 अक्टूबर 26*शांति आश्रम में पंच जूना अखाड़ा के साधु-संतों ने धूमधाम से मनाया ‘गोला पूजा’ का पर्व, हुआ भव्य स्वागत व जलपान
विशेष संवाददाता कालूराम जयपुरिया यूपीआजतक
हरिद्वार *सनातन परंपरा और अखाड़ा संस्कृति के पावन सानिध्य में पंच दशनाम जूना अखाड़ा के पूज्य साधु-संतों द्वारा विभिन्न आश्रमों में पहुंचकर ‘गोला पूजा’ (गोला पुजा) का पारंपरिक उत्सव अत्यंत हर्षोल्लास, श्रद्धा एवं धूमधाम के साथ मनाया गया। इसी धार्मिक अनुष्ठान व भ्रमण की शृंखला में साधु-संतों का पावन दल शांति आश्रम पहुंचा, जहां पूरे विधि-विधान और परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार पूजन कार्य संपन्न हुआ।

आश्रम पहुंचने पर संतों का आत्मीय स्वागत
प्राप्त विवरण के अनुसार, पंच जूना अखाड़ा के पूज्य साधु-संत जब शांति आश्रम में पधारे, तो वहां उपस्थित संत समाज एवं श्रद्धालुओं ने उनका अभिनंदन किया। शांति आश्रम में स्वामी सत्यनन्द गिरि के सानिध्य में सभी साधु-महात्माओं की अगवानी की गई। इस अवसर पर कुकु माई तथा कालूराम डेरिया ने आगे बढ़कर सभी साधु-संतों का तिलक, माल्यार्पण और चरण वंदना कर पारंपरिक स्वागत-सत्कार किया। संतों के आगमन से संपूर्ण आश्रम परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर हो गया।

‘गोला पूजा’ की धार्मिक महत्ता
अखाड़ा परंपरा में ‘गोला पूजा’ का अपना एक विशिष्ट आध्यात्मिक और पारंपरिक महत्व माना जाता है। यह अनुष्ठान अखाड़े के त्याग, तपस्या और संगठनात्मक एकता का प्रतीक है। उत्सव के दौरान साधु-संत विभिन्न आश्रमों में जाकर धूनी, शास्त्र एवं पारंपरिक प्रतीकों का पूजन करते हैं तथा विश्व कल्याण की कामना करते हैं। इसी क्रम में शांति आश्रम में उपस्थित सभी नागा साधुओं व संतों ने विधिवत मंत्रोच्चार के साथ पूजा संपन्न की तथा आश्रम के वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
स्वागत एवं जलपान वितरण
हस्तलिखित विवरण के अनुसार, आश्रम परिसर में पधारे सभी संतों के सम्मान में विशेष प्रबंध किए गए थे। कुकु माई तथा कालूराम डेरिया द्वारा सभी संत-महात्माओं के स्वागत के उपरांत उन्हें आदरपूर्वक फल, मिष्ठान व फलाहारी जलपान ग्रहण कराया गया। सभी संतों ने पंगत में बैठकर प्रसाद स्वरूप जलपान स्वीकार किया और आयोजकों को धर्म लाभ एवं सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान किया।

तस्वीरों में दिखी अखाड़ा संस्कृति की जीवंत झलक
आयोजन से जुड़ी तस्वीरों में जूना अखाड़े के विभिन्न संप्रदायों के साधु भगवा वस्त्र, जटाजूट, भस्म और पारंपरिक वेशभूषा में नजर आ रहे हैं। एक दृश्य में संत समाज गंभीर आध्यात्मिक विचार-विमर्श करता दिख रहा है, तो वहीं अन्य तस्वीरों में शंखनाद, परंपरागत वाद्य और प्रसाद ग्रहण करते हुए संतों की दिव्य उपस्थिति स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही है।
धार्मिक अनुष्ठान के समापन पर स्वामी सत्यनन्द गिरि सहित उपस्थित वरिष्ठ संतों ने सनातन संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और संत सेवा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संतों का सानिध्य और उनकी सेवा ही जीवन में शांति और अध्यात्म का मार्ग प्रशस्त करती है। अंत में सभी उपस्थित भक्तों में प्रसाद वितरण किया गया तथा मंगल कामना के साथ आयोजन संपन्न हुआ।
(स्रोत: शांति आश्रम हस्तलिखित विवरण एवं छायाचित्र)

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