July 29, 2026

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नई दिल्ली28 जुलाई26*संसद मार्च में कैसे पहुंचे 2873 अपराधी? दिल्ली पुलिस महसंघ ने उठाए सवाल

नई दिल्ली28 जुलाई26*संसद मार्च में कैसे पहुंचे 2873 अपराधी? दिल्ली पुलिस महसंघ ने उठाए सवाल

नई दिल्ली28 जुलाई26*संसद मार्च में कैसे पहुंचे 2873 अपराधी? दिल्ली पुलिस महसंघ ने उठाए सवाल, 31 जुलाई को करेंगे प्रदर्शन_*

*नई दिल्ली:* संसद मार्च के दौरान 20 जुलाई को हुई हिंसा व उसके बाद दिल्ली पुलिस की प्रारंभिक जांच में सामने आए तथ्यों ने पूरे घटनाक्रम को नए मोड़ पर ला दिया है. पुलिस का दावा है कि प्रदर्शन में शामिल 2,873 ऐसे लोगों की पहचान हुई है, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड रहा है. इनमें हत्या, लूट, डकैती, स्नैचिंग, एनडीपीएस, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों के आरोपी भी शामिल बताए गए हैं. 31 जुलाई को दिल्ली पुलिस महसंघ सीजेपी प्रदर्शन में घायल हुए पुलिसकर्मियों के मद्देनजर प्रदर्शन करने जा रहा है.

अगर जांच में ये तथ्य सही साबित होते हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि इतने बड़ी संख्या में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग एक छात्र आंदोलन का हिस्सा कैसे बने? क्या ये सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर चूक थी या फिर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आड़ में हिंसा भड़काने की सुनियोजित कोशिश थी. इसी पूरे घटनाक्रम पर दिल्ली पुलिस महासंघ के अध्यक्ष एवं दिल्ली पुलिस के पूर्व एसीपी वेद भूषण ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष व गहन जांच होनी चाहिए, जिससे ये स्पष्ट हो सके कि हिंसा के पीछे वास्तविक जिम्मेदार कौन थे.

*जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के क्या हैं नियम:*

उनके मुताबिक, जंतर-मंतर पर सामान्यतः एक दिन के लिए लगभग 1,000 लोगों की सभा की अनुमति दी जाती है. इससे बड़ी भीड़ के लिए रामलीला मैदान और उससे बड़े आयोजनों के लिए बुराड़ी मैदान निर्धारित है. दिल्ली हाईकोर्ट व अन्य न्यायिक निर्देशों के अनुरूप जंतर-मंतर पर बड़े और लंबे समय तक चलने वाले प्रदर्शनों पर सीमाएं तय हैं, क्योंकि यह घनी आबादी वाला क्षेत्र है. उनका दावा है कि शुरुआत में प्रदर्शन को सीमित अवधि के लिए अनुमति दी गई थी, लेकिन बाद में लगातार अवधि बढ़ने व विभिन्न राजनीतिक दलों की सक्रियता से स्थिति जटिल होती चली गई.

*छात्रों के अधिकार का सम्मान, लेकिन कानून की भी सीमा:*

पूर्व एसीपी वेद भूषण ने कहा कि भारतीय संविधान हर नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने व प्रदर्शन करने का अधिकार देता है. हालांकि ये अधिकार असीमित नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था और कानून के दायरे में ही इसका प्रयोग किया जा सकता है. अगर किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा, सरकारी संपत्ति को नुकसान या पुलिसकर्मियों पर हमला होता है तो उसकी निष्पक्ष जांच अनिवार्य है. वास्तविक छात्रों का भविष्य प्रभावित नहीं होना चाहिए और निर्दोष विद्यार्थियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई से बचना चाहिए.

*2,873 संदिग्धों को लेकर उठे सवाल:*

उन्होंने दिल्ली पुलिस के प्रारंभिक जांच आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि जिन लोगों की पहचान की गई है, उनमें हत्या, डकैती, लूट, स्नैचिंग, एनडीपीएस, अपहरण व महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों के आरोपी भी शामिल बताए जा रहे हैं. उनका सवाल है कि अगर ऐसे लोग वास्तव में प्रदर्शन में मौजूद थे, तो क्या उन्हें छात्र माना जा सकता है या फिर उन्होंने भीड़ का इस्तेमाल किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया? उन्होंने कहा कि इन सभी तथ्यों की जांच पूरी होने के बाद ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए.

*पुलिसकर्मियों पर हमले की भी हो जांच:*

उनका कहना है कि संसद मार्च के दौरान 128 पुलिस अधिकारी व जवान घायल हुए. कई पुलिसकर्मियों के हाथ-पैर टूटे, सिर में चोटें आईं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. अगर किसी पुलिसकर्मी के साथ मारपीट हुई है तो उन मामलों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. पुलिसकर्मी भी किसी परिवार का हिस्सा होते हैं और ड्यूटी के दौरान उन पर हमला लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

*सोशल मीडिया व भीड़ की भूमिका पर भी उठे सवाल:*

उन्होंने ये भी दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया के माध्यम से भीड़ को संगठित करने, पहचान छिपाने और रिकॉर्डिंग से बचने जैसे संदेश प्रसारित किए गए. उन्होंने कहा कि अगर ऐसे दावे सही हैं तो उनकी डिजिटल फॉरेंसिक जांच भी की जानी चाहिए, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि हिंसा स्वतः हुई या किसी रणनीति का हिस्सा थी. इस पूरे मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या न्यायिक निगरानी में कराए जाने पर भी विचार होना चाहिए, जिससे सभी पक्षों के तथ्य सामने आ सकें. जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा. अगर छात्र निर्दोष हैं तो उन्हें राहत मिलनी चाहिए, लेकिन अगर किसी ने छात्र आंदोलन की आड़ में हिंसा या कानून व्यवस्था बिगाड़ने का प्रयास किया है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए.

*सवाल जो अभी भी कायम हैं:*

20 जुलाई के संसद मार्च की घटना सिर्फ एक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह गई है. यह मामला कानून-व्यवस्था, प्रदर्शन की संवैधानिक सीमाओं, खुफिया तंत्र, भीड़ प्रबंधन व राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर रहा है. दिल्ली पुलिस की जांच आगे बढ़ने के साथ यह स्पष्ट होगा कि 2,873 संदिग्धों से जुड़े दावे कितने सही साबित होते हैं. हिंसा के पीछे वास्तव में कौन जिम्मेदार था. फिलहाल सबसे बड़ी जरूरत तथ्यों पर आधारित निष्पक्ष जांच की है, जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों और कानून के शासन दोनों की रक्षा सुनिश्चित हो सके.

 

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