देवबंद05मई25 आह! एक दौर ख़त्म हुआ…*
दारुल उलूम देवबंद के पूर्व मोहतमिम, जामिया इशाअतुल उलूम अकल कुवा के संस्थापक व सरपरस्त, हिंदुस्तान की एक अज़ीम शख्सियत, ख़ादिम-ए-क़ुरआन, मेरे मुहसिन हज़रत मौलाना ग़ुलाम मोहम्मद वस्तानवी साहब, तवील बीमारी के बाद रब-ए-हक़ के हज़ूर पहुंच गए।
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन
हज़रत मौलाना की वफ़ात की ख़बर ने दिल को गहरा सदमा पहुंचाया है। उनसे जुड़ी कई यादें आज दिलो-दिमाग़ में ताज़ा हो गईं। मौलाना साहब मेरे वालिद मजरूह, हज़रत मौलाना क़ारी अहमद गोरा रहमतुल्लाह अलैह के हमदर्स और मदरसों के साथी थे। मुझसे भी उनकी मुहब्बत और उन्स का रिश्ता बहुत गहरा था।
ख़ाकसार से अक्सर मदारिस के हालात और तालीम के फ़रोग़ पर गुफ़्तगू करते रहते थे और हमेशा एक रहबर की तरह शाबाशी भी दिया करते थे।
अल्लाह तआला मौलाना वस्तानवी साहब की मग़फिरत फ़रमाए, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए और तमाम अहले ख़ाना, ख़ास तौर पर हमारे अज़ीज़ भाई मौलाना हुजैफ़ा वस्तानवी और मौलाना ओवैस वस्तानवी को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।
दुआ है कि अल्लाह हमें उनके नक़्श-ए-क़दम पर चलने की तौफ़ीक़ दे और उनके इल्मी व इस्लाही मिशन को जारी रखने की तौफ़ीक़ बख़्शे।

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