October 29, 2026

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कवि ऋतुराज को जनवादी लेखक संघ की श्रद्धांजलि*

कवि ऋतुराज को जनवादी लेखक संघ की श्रद्धांजलि*

*कवि ऋतुराज को जनवादी लेखक संघ की श्रद्धांजलि*

प्रगतिशील काव्यधारा की तीसरी पीढ़ी के अत्यंत महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर ऋतुराज का 26 अक्टूबर 2026 को छियासी वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनका जन्म राजस्थान के भरतपुर जिले में 10 फरवरी 1940 को हुआ था। अंग्रेजी से एम.ए. करने के बाद उन्होंने लेक्चरर पद पर ज्वाइन किया और 35 वर्षों तक अंग्रेजी भाषा एवं साहित्य का अध्यापन किया। वे मुख्यतः बूँदी जिले में पदस्थ रहे। अध्यापन से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर उन्होंने चाइना रेडियो इंटरनेशनल में विदेशी भाषा विशेषज्ञ के रूप में तीन वर्षों तक कार्य किया। उसके बाद ऋतुराज जयपुर में बस गए। वे मंचों पर, कार्यक्रमों में प्रायः नहीं दिखते थे लेकिन स्वयं को हमेशा अद्यतन रखते थे। मोबाइल फ़ोन के इस वक़्त में भी वे फोन से दूर ही रहते थे। उनसे मिलने वाले लोग अक्सर उनके आवास के पास रहने वाले जनवादी लेखक संघ से जुड़े वरिष्ठ कवि शैलेन्द्र सिंह चौहान की मदद लिया करते थे। उनकी रुचि फिल्मों में थी और जयपुर में जितेन्द्र भाटिया द्वारा स्थापित स्टूडियो में दिखाई जाने वाली फिल्मों के प्रदर्शन में उनकी उपस्थिति रहती थी। हिंदी के चर्चित लेखक, बुद्धिजीवी, सिनेमा विशेषज्ञ और अनुवादक जितेन्द्र भाटिया भी उनके ख़ास मित्रों में थे।

ऋतुराज के काव्य-संग्रहों में ‘मैं आंगिरस’ (1964), ‘एक मरणधर्मा और अन्य कविताएँ’ (1967), ‘कितना थोड़ा वक़्त’ (1970), ‘अबेकस’ (1983), ‘नहीं प्रबोधचन्द्रोदय’ (1984), ‘सुरत निरत’ (1987), ‘लीला मुखारविंद’ (2002), ‘आशा नाम नदी’ (2007), चुनी हुई कविताएँ (2008) हैं। उन्होंने कविताओं की एक किताब का संपादन किया और ‘लज्जाराम मेहता’ नामक एक आलोचनात्मक ग्रंथ भी लिखा।

जनवादी लेखक संघ ऋतुराज के निधन पर शोक व्यक्त करता है और उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। अपनी रचनात्मकता और वैचारिक प्रतिबद्धता के बूते ऋतुराज हमारे बीच में बने रहेंगे। उन्हीं की एक कविता की पंक्तियाँ हैं-

नहीं होना भी एक मौज़ूदगी है
दुख उसे दुबारा रचते-रचते वापिस ले आता है
होने को तो हवा है
दूर पर्वत शृंखलाएं हैं
पूरे विश्वास से लौटते हुए परिंदे हैं
कि दिन हँसी खुशी से गुज़र गया
तो रात भी बीत ही जाएगी।