हरिद्वार16 अक्टूबर 26*अर्धकुंभ की तैयारियों पर संतों का मंथन, स्वामी गोपाल गिरि से मिले कालूराम जयपुरिया
अर्धकुंभ मेला: आह्वान अखाड़ा अध्यक्ष स्वामी गोपाल गिरि जी महाराज से मिले स्वामी सत्यानंद जी के शिष्य कालूराम जयपुरिया, व्यवस्थाओं और परंपराओं पर हुआ गहरा मंथन
हरिद्वार (कालूराम जयपुरिया, यूपी आजतक):
हरिद्वार *धर्मनगरी हरिद्वार के पावन क्षेत्र भूपतवाला में सनातन संस्कृति, परंपरा और आगामी अर्धकुंभ मेले की व्यवस्थाओं को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गरिमामयी आध्यात्मिक बैठक संपन्न हुई। पूज्यपाद स्वामी सत्यानंद जी महाराज के परम शिष्य कालूराम जयपुरिया ने श्री पंचदशनाम आह्वान अखाड़े के राष्ट्रीय अध्यक्ष परम पूज्य स्वामी गोपाल गिरि जी महाराज से शिष्टाचार भेंट कर उनका पावन आशीर्वाद प्राप्त किया। इस आत्मीय व वैचारिक मुलाकात के दौरान आगामी अर्धकुंभ मेले के सफल आयोजन, श्रद्धालुओं की सुविधाओं, संतों की भूमिका और आयोजन की दिव्यता को अक्षुण्ण बनाए रखने से जुड़े विविध पक्षों पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ।
भूपतवाला स्थित आश्रम परिसर में आयोजित इस शिष्टाचार भेंट में सनातन परंपरा के संवर्धन और हरिद्वार में होने वाले आगामी धार्मिक आयोजनों की रूपरेखा पर विस्तार से चर्चा की गई। स्वामी सत्यानंद जी के शिष्य कालूराम जयपुरिया ने पूज्य गुरुदेव स्वामी गोपाल गिरि जी महाराज को नमन करते हुए आगामी धार्मिक समागमों में संत समाज की अग्रणी भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि तीर्थनगरी हरिद्वार सदैव से ही विश्व भर के संन्यासियों, तपस्वियों और भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र रही है। ऐसे में कुंभ और अर्धकुंभ जैसे महापर्व केवल धार्मिक स्नान तक सीमित नहीं रहते, बल्कि ये भारतीय संस्कृति के वैश्विक संदेश, एकात्मता और विश्व कल्याण के विराट मंच होते हैं।
मुलाकात के दौरान आह्वान अखाड़े के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी गोपाल गिरि जी महाराज ने आगामी अर्धकुंभ मेले की व्यवस्थाओं, प्रशासनिक तालमेल, अखाड़ों की प्राचीन परंपराओं और मेले के आध्यात्मिक महत्व पर अपना अमूल्य मार्गदर्शन प्रदान किया। पूज्य महाराज श्री ने कहा कि कुंभ एवं अर्धकुंभ पर्व भारत की उस प्राचीन ऋषि परंपरा का जीवंत स्वरूप हैं, जहां देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु गंगा की अविरल धारा में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं। उन्होंने कुंभ के ऐतिहासिक संदर्भों, अखाड़ा व्यवस्था, पेशवाई की भव्यता और शाही स्नान की सदियों पुरानी मर्यादाओं पर विस्तृत प्रकाश डाला। स्वामी जी ने इस बात पर विशेष बल दिया कि मेले की भव्यता के साथ-साथ उसकी शुचिता, पर्यावरण संरक्षण और मां गंगा की निर्मलता बनाए रखना संत समाज और प्रशासन दोनों का सर्वोपरि कर्तव्य है।
चर्चा के दौरान अखाड़ों के बीच आपसी सौहार्द और प्रशासनिक सहयोग के महत्व पर भी बात रखी गई। महाराज श्री ने कहा कि जब संत समाज और शासन-प्रशासन परस्पर समन्वय बनाकर कार्य करते हैं, तो बड़े से बड़े धार्मिक आयोजन भी सुगमता और दिव्यता के साथ संपन्न होते हैं। तीर्थयात्रियों के ठहरने, सुरक्षा, शुद्ध पेयजल, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं को पहले से ही चाक-चौबंद किया जाना आवश्यक है ताकि धर्मनगरी आने वाले किसी भी श्रद्धालु को असुविधा का सामना न करना पड़े। कालूराम जयपुरिया जी ने महाराज श्री के विचारों का समर्थन करते हुए कहा कि पूज्य संतों के आशीर्वाद और दिशा-निर्देशों से ही समाज को सही दिशा मिलती है और ऐसे विराट आयोजनों की सार्थकता सिद्ध होती है।
इस महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी आध्यात्मिक संवाद के साक्षी वरिष्ठ पत्रकार पदम सिंह तथा ‘यूपी आज तक’ के पत्रकार संतोष बिष्ट भी रहे। उन्होंने इस पूरी शिष्टाचार भेंट और संतों के बीच हुए विचार-मंथन को प्रमुखता से संकलित किया। उपस्थित पत्रकारों ने कहा कि संतों का यह वैचारिक आदान-प्रदान समाज में सकारात्मक संदेश प्रसारित करता है और आगामी महापर्व की महत्ता से जन-जन को अवगत कराने में सहायक सिद्ध होता है।
भेंट के समापन पर स्वामी गोपाल गिरि जी महाराज ने कालूराम जयपुरिया को शॉल व आशीर्वाद स्वरूप प्रसाद भेंट कर उनके सामाजिक व आध्यात्मिक प्रयासों की सराहना की। इस अवसर पर उपस्थित संतों व प्रबुद्धजनों ने एक स्वर में माना कि यह सार्थक संवाद आगामी अर्धकुंभ मेले की दिव्यता, भव्यता और सुव्यवस्था को नई ऊंचाई प्रदान करने में अत्यंत उपयोगी और दूरगामी साबित होगा। धर्मनगरी का यह पावन संवाद सनातन परंपरा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक सशक्त कदम के रूप में देखा जा रहा है।
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