August 30, 2025

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भागलपुर7नवम्बर24*छट पर्व को पर्यावरणविदों ने सूर्य उपासना के इस अनुष्ठान को'प्रकृति पर्व'का भी नाम दिया है।

भागलपुर7नवम्बर24*छट पर्व को पर्यावरणविदों ने सूर्य उपासना के इस अनुष्ठान को’प्रकृति पर्व’का भी नाम दिया है।

भागलपुर बिहार से शैलेन्द्र कुमार गुप्ता यूपी आजतक।

भागलपुर7नवम्बर24*छट पर्व को पर्यावरणविदों ने सूर्य उपासना के इस अनुष्ठान को’प्रकृति पर्व’का भी नाम दिया है।

लोक आस्था के महापर्व(बड़का परब) की महिमा ऐसी कि बिहार के जन-जन की आत्मा से जुड़ा यह अनुष्ठान अब भारतवर्ष ही नहीं वरन् विश्व के अन्य देशों की संस्कृति में आत्मसात किया जा चुका है।
पर्यावरणविदों ने हाल ही में सूर्य उपासना के इस अनुष्ठान को
‘प्रकृति पर्व’
का भी नाम दिया है।
वैदिक काल से मनाया जाने वाला यह पर्व वास्तव में क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा की मूलभूत महत्ता के प्रति हमारी गहरी श्रद्धा को दर्शाता है।
पहले दिन शुद्ध जल(नदी) में स्नान के साथ नहाय-खाय द्वारा पंचतत्व के प्रति आभार प्रकट करने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है।
फिर शुद्ध लकड़ी के ‘आग’ पर खरना के महाप्रसाद को पकाया जाता है।
सम्पूर्ण ब्रह्मांड में इकलौते उदाहरण के तौर पर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य देकर लोग ‘अपने आज’ के लिए उनका धन्यवाद करते हैं।
पुनः अपने आने वाले अच्छे समय व उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए ‘आकाश’ में उगते सूरज की प्रार्थना करते हैं। सुबह-सुबह की गुलाबी ठंडक ‘हवा’ हमें कड़े मेहनत का संदेश देती है।
वस्तुतः भगवान भास्कर हमारे इकलौते आराध्य हैं जिनसे हमें साक्षात्कार का सौभाग्य प्राप्त होता है।’छठ पर्व’ की अप्रतिम महिमा के सैकड़ों उदाहरण हैं जिनके द्वारा राजा प्रियंवद के मृत पुत्र का जीवित हो जाना,रावण वध के पश्चात सरयू नदी के तट पर माता सीता द्वारा छठ पर्व कर पुत्र की कामना करना,चौसर की बिसात पर सब कुछ खोने के बाद द्रौपदी के द्वारा छठ अनुष्ठान के फलस्वरूप ही राजपाट की पुनः प्राप्ति,अंग क्षेत्र के राजा दानवीर कर्ण द्वारा प्रतिदिन नदी के पानी में कमर तक घंटों खड़े रहकर सूर्योपासना के फलस्वरूप यशस्वी योद्धा बनना इत्यादि।हमारी यही आस्था हमारे समृद्ध सांस्कृतिक विरासतों को सहेजने का काम करती है।प्रार्थना है कि आराध्य सूर्यदेव व उनकी बहन, ब्रह्मांड रचयिता भगवान ब्रह्मा की षष्ठी मानस पुत्री छठी मईया हमारे व आपके कष्टों को हरकर हमारे जीवन में नया प्रकाश, नयी ऊर्जा का संचरण करें। स्मरण तो होगा ही कि यह पर्व जाति, वर्ग, लिंग-भेद के परे सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण पेश करता है जहाँ भिन्न-भिन्न जाति-वर्ग के लोग एक ही घाट पर साथ-साथ अनुष्ठान मनाकर हमारे समाज में ब्याप्त विषैली वर्ण व्यवस्था को गंभीर चुनौती प्रदान करते हैं। अतः जहाँ तक संभव हो, कुछ ऐसे साधनहीन परिवार जिनकी इस अनुष्ठान के प्रति अपार श्रद्धा है परन्तु अर्थाभाव बाधक बन रहा हो, उनका सहयोग कर हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन अवश्य करें।
इस अत्यंत कठिन अनुष्ठान को पूर्ण करने वाले सभी श्रद्धालु भाई, माताओं, बहनों की समस्त मनोकामनाएँ सूर्यदेव पूर्ण करें, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ ।

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