March 6, 2026

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*नई दिल्ली17मई25*तुर्की और पाकिस्तानी बिरादर इश्क़ आजकल अपनी मुहब्बत के सबसे ऊपर वाले पायदान पर है।*

*नई दिल्ली17मई25*तुर्की और पाकिस्तानी बिरादर इश्क़ आजकल अपनी मुहब्बत के सबसे ऊपर वाले पायदान पर है।*

*नई दिल्ली17मई25*तुर्की और पाकिस्तानी बिरादर इश्क़ आजकल अपनी मुहब्बत के सबसे ऊपर वाले पायदान पर है।*

पाकिस्तानी पीएम ने हाल के तुर्की भाषा में ट्वीट कर एर्दोगन- तुर्की सदर को मेरा भाई कह मुखातिब किया और लाख लाख शुक्रिया अदा किया। तुर्की सदर ने भी ट्वीट के उत्तर में आभार प्रगट किया और अंत में लिखा- तुर्की पाकिस्तान दोस्ती जिंदाबाद!

तुर्किए और पाकिस्तान के इस प्रेम को समझना दरअसल कोई बड़ी पहेली नहीं है। हिन्दुस्थान का जंग में अकेले पड़ना भी कोई नई बात नहीं है। आज आप इतिहास के पन्नो से एक नया आयाम जानिए और इस आयाम से आप समझ पायेंगे कि किस प्रकार वर्तमान इतिहास का ही प्रतिबिंब होता है। युग बदलते है- शताब्दियाँ बीतती है किंतु मूल तत्व एक ही रहता है।

मध्यकाल में तीन बड़े साम्राज्य थे- तुर्की ( ऑटोमैन) , सफ़निवी ( ईरान) और मुग़ल! इन तीनो साम्राज्य को बारूदी साम्राज्य भी कहा जाता है क्यूंकि इन तीनों ने चीनी ईजाद बारूद को जंग में बखूबी इस्तेमाल करना सीखा। तुर्कियों ने बारूद का इस्तेमाल इतनी कुशलता से किया कि उन्होंने ये तकनीक मुगलों को भी सिखाई।

जब बाबर ने देहली पर हमला बोला तब बाबर के पास कुछ तुर्की तोपची थे – उस्ताद अली क़ुली ख़ान इनमें सबसे अव्वल था जिसने बाबर की फौज को तोप और बारूद का प्रशिक्षण दिया। इसके अलावा तुर्की ने मुग़लों को एक और जंग की ऐसी तकनीक सिखाई थी जो उस ज़माने में बेजोड़ थी। ये तकनीक थी- वॉर वैगन्स अर्थात् जंग की बग्गियाँ ।

ये वॉर वैगन्स मजबूत बग्गियाँ होती थी जिनमें लकड़ी की आड़ लेके बन्दूकची गोलियाँ चलाते थे। इस में बंदूक को रीलोड करने का टाइम मिलता था और बग्गी में सवार बन्दूकची को सुरक्षा भी। तुर्कियों ने ये ट्रिक और ये बग्गियाँ क्रूसेड वॉर के समय यूरोपियन्स से सीखी थी और इस तकनीक को उन्होंने मुग़लों को सिखाया जिस से हिन्दुस्थान पर क़ब्ज़ा किया जा सकें।

वॉर वैगन्स और बारूद का ये कॉम्बो इतना घातक सिद्ध हुआ कि हिंदुस्तानी रियासतें कभी भी इस वारफेयर से उबर नहीं पाई। यही नहीं- जब अंग्रेज़ आए तब भी हमने आधुनिक वारफेयर को अपनाया नहीं था- शायद हमें कोई सिखाने वाला ही नहीं था।

जो लोग इतिहास को गौर से पढ़ते है, वो ये ज़रूर नोटिस करते होंगे कि अंग्रेजों के आने के टाइम, रियासतों ने अनेक विदेशियों को अपनी सेना का अध्यक्ष बनाया था- फ़्रेंच , डच और पुर्तगाली लोगों को हिंदुस्तानी शासक अक्सर अपना सेनानायक बनाते थे और अपनी फौज की ट्रेनिंग आदि भी करवाते थे। आधुनिक लोकल अस्त्र शस्त्र तब भी बहुत कम बनते थे- हम लोग इस क्षेत्र में तब से पिछड़े हुए है।

आज युग बदल रहा है- आज भारतीय निर्मित मिसाइल आदि अपना वर्चस्व व्याप्त करने को आतुर है। आज किसी विदेशी की ट्रेनिंग आदि की इतनी जरूरत नहीं है। आज भी हिन्दुस्थान अकेला है- आज भी तुर्की और पाकिस्तान की दोस्ती और जंग का गठबंधन बरकरार है। ये गठबंधन नहीं टूटेगा- ये सदियों से इतिहास का सबक है।

भारत को इतिहास के इस महत्वपूर्ण सबक को आत्मसात करना होगा- सबक लेना होगा कि युद्ध में शत्रु अकेला ना तब था और ना अब है।

वर्तमान ही इतिहास का प्रतिबिंब है।

तस्वीरों में वॉर वैगन्स आदि के स्केच!

Taza Khabar