March 2, 2026

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औरैया24मार्च24*रोजा इंसान में एकता, समानता, सहयोग की भावना पैदा करता है।*

औरैया24मार्च24*रोजा इंसान में एकता, समानता, सहयोग की भावना पैदा करता है।*

औरैया24मार्च24*रोजा इंसान में एकता, समानता, सहयोग की भावना पैदा करता है।*

*रोजा अल्लाह तआला के लिए एक ऐसी खास इबादत है जिससे इंसान की दुनिया और आखिरत सवँर जाती*

*दूसरे अशरे में अल्लाह तआला गुनाहगारों की मगफिरत फरमाता है*

*फफूंद,औरैया।* रमजानुल मुबारक का दूसरा अशरा (चरण) चल रहा है। रमजानुल मुबारक में रोजा रखना अल्लाह तआला के लिए की जाने वाली खास इबादत होती है।रमजान का दूसरा अशरा मगफिरत (माफी) का होता है। इसमें रब अपने बंदों के गुनाहों और पापों को माफ फरमाता है। रमजानुल मुबारक पर जानकारी देते हुए शहर काजी औरैया व जामिया समदिया के प्रबंधक सैयद गुलाम अब्दुस्समद मियां चिश्ती ने बताया कि रोजा एक ऐसी इबादत है जिसमें दुनिया और आखिरत दोनों को भलाई जुड़ी हुई है यह इस्लाम धर्म में अनिवार्य होने के साथ-साथ लोगों में वह सब गुण उत्पन्न करने का प्रयास करता है जिसकी आज सभ्य समाज में बहुत ही आवश्यकता है।
व्यक्तित्व के विकास और लोगों में योग्यता पैदा करने के लिए विश्वविद्यालय और दूसरी संस्थाएं ऐसे व्याख्यान और कक्षाओं का आयोजन करती है, जबकि अल्लाह ने इन सभी खूबियों को रोजे में निहित कर दिया है। रोजा इंसान में कई खूबियां पैदा करता है जो रोजाना की जिंदगी में उसके लिए बहुत उपयोगी होती हैं, जैसे व्यापार, प्रशासन, राजनीति, शिक्षा, तकनीकि आदि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता का मार्ग प्रशस्त करती हैं। रोजा आपस में एकता की भावना पैदा करता है तथा हमें समानता और सहयोग का संदेश देता है। यह मिलजुल कर काम करने को प्रेरित करता है, रमजानुल मुबारक के पूरे महीने रोजे रखना आवश्यक है। रोजे सुरक्षा का काम करते हैं।पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया रोजा इंसान के लिए ढाल है जिस तरह ढाल दुश्मनों के बार से बचाती है उसी तरह रोजे भी बुराई,परेशानी और मुसीबतों से अपना बचाव करना सिखाते हैं।
रमजान के पहले दस दिन को रहमत का अशरा कहा जाता है। रमजान शरीफ का दूसरा अशरा मगफिरत का है जो शुरू हो चुका है इस अशरे में अल्लाह तआला फरिश्तों से मुनादी करवाता है कि है कोई मुझसे अपनी गलतियों की माफी मांगने वाला ताकि मैं उसके गुनाहों को माफ कर सकूं उसके पापों से उसे मुक्त कर सकूं। इन दस दिनों में नेकी और भलाई के अधिक से अधिक कामों को करने के साथ-साथ अपने रब से गुनाहों की माफी मांगते हुए तौबा अस्तगफार करते रहे रमजान के दूसरे अशरे में इस दुआ को पढ़ना चाहिए कि “मैं अल्लाह से तमाम गुनाहों की बख्शिश मांगता हूं, जो मेरा रब है और उसी की तरफ रुजू करता हूं।” रोजा एक तरह का पवित्रीकरण का कार्य है जो इंसान के उन अवगुणों को धोता है जो नफ़्स (अन्तर्मन) और शैतान के निरंतर प्रयास से उसके अंदर पैदा हो जाते हैं और उसे नए सिरे से ऐसा इंसान बना देता है जैसे वह अभी पैदा हुआ हो। इस अशरे में पवित्रीकरण के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए अपने अंदर मानवीय मूल्यों को आत्मसात करने का भी प्रयास करना चाहिए।

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