हैदराबाद27अप्रैल25* निज़ाम के दान से पवित्र _महाभारत_का संपादन और प्रकाशन संभव हुआ!*
नफ़रत के इस युग में यह सूचना साझा संस्कृति के लिए एकजुट रहते आए पूर्वजों की महान उदार सोच का एक बड़ा लेकिन भुला दिया गया अध्याय है.
देश का महान ग्रंथ “महाभारत” का प्रमाणित संस्करण प्रकाशित होने के पीछे हैदराबाद के निजाम का उदार हाथ है.
यह जानकारी चौकाने वाली होने के साथ बेहद सुखद है. आज भी गीता प्रेस गोरखपुर से बेहतर पाठ इसी महाभारत का माना जाता है.
मीर उस्मान अली जो की हैदराबाद के आखरी निज़ाम थे. उन्होंने हजार रुपए सालाना का दान 11 वर्षों के लिए किया.
यह राशि 1932 में शुरू होकर 1943 तक जारी रही. पुणे के ऐतिहासिक “भंडारकर ओरियंटल इंस्टिट्यूट” महाभारत जिसके मुखिया सुकथनकर जी थे, उस कार्य की पूर्णता में निज़ाम का स्नेह सौजन्य शामिल था.
निज़ाम को गाली देने वालों को एकबार अपने महान ग्रंथ के साए में खड़े होकर देखना चाहिए, और उस आपसदारी को भी याद करना चाहिए, जिसमें पुणे का एक इंस्टिट्यूट हैदराबाद के एक परधर्मी निज़ाम से अपनी सबसे महान ग्रंथ को संपादित प्रकाशित करने के लिए आर्थिक सहायता लेने में खुशी समझता है.
वही भारत सच का भारत है.
बाकी तो छल छद्म है…
बोधिसत्व, मुंबई
सूचना स्रोत
साभार

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