नई दिल्ली9सितम्बर25*यूपीआजतक न्यूज़ चैनल पर आज की “”सन्त बाणी””
[09/09, 5:48 am] +91 87658 77512: 🕉️
*अपने परिवार की देखभाल मालिक बनकर नहीं, बल्कि माली बनकर करें,क्योंकि जिस बगीचे का माली अच्छा हो, वहाँ हर फूल खुशबू बिखेरता है।*
*राम राम*
🙏
[09/09, 5:48 am] +91 87658 77512: जब आंसू आपके हों औरकोई और हो
तब ये समझ लेना कि वो रिश्ता उच्च से उच्चकोटि का है
फिर चाहे वो रिश्ता प्रेम का हो या मित्रता का
जिसे गुणो की पहचान नहीं है उसकी प्रशंसा से डरो
और जो गुणों का जानकार है उसके मौन से डरो
हर सुबह नए दिन की शुरुआत होती है
किसी अपने से बात हो तो खास होती है
हँस के प्यार से अपनों को सुप्रभात बोलो
तो दिन भर खुशियाँ अपने साथ होती हैं ।
🛕📿🪔🛕📿🌻🪔
जय श्री राम । जय श्री राम
धर्म की जय हो।
अधर्म का नाश हो॥
प्राणियों में सद्भावना हो।
विश्व का कल्याण हो।
वंदेभारत । शुभ दिवस
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
2025
[09/09, 5:48 am] +91 87658 77512: 🍃🌾🌾
*09 SEPTEMBER 2025*
🦋 *आज की प्रेरणा* 🦋
सार्थक और प्रभावी उपदेश वह है जो वाणी से नहीं, अपने आचरण से प्रस्तुत किया जाता है।
*आज से हम* दूसरों को वाणी से नहीं बल्कि अपने अच्छे आचरण से उपदेश दें…
💧 *TODAY’S INSPIRATION* 💧
The meaningful and effective sermon is that which is presented, not by speech, but by our own conduct!
*TODAY ONWARDS LET’S* teach others not by speech but by our good conduct.
🍃💫🍃💫🍃💫🍃💫🍃💫🍃
[09/09, 5:48 am] +91 87658 77512: 0️⃣9️⃣❗0️⃣9️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣5️⃣
*”ईश्वर सब पर नजर रखते हैं..!!”*
G
एक दिन सुबह सुबह दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो देखा एक आकर्षक कद- काठी का व्यक्ति चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान लिए खड़ा है।मैंने कहा – जी कहिए !!
तो उसने कहा – अच्छा जी !! आप तो रोज़ हमारी ही गुहार लगाते थे और सामने आया हूं तो कहते हो जी कहिए !!
मैंने कहा – माफ कीजिये, भाई साहब !!मैंने पहचाना नहीं,आपको…
तो वह कहने लगे – भाई साहब !! मैं वह हूँ,जिसने तुम्हें साहेब बनाया है। अरे ईश्वर हूँ !! ईश्वर !! तुम हमेशा कहते थे न कि नज़र मे बसे हो पर नज़र नही आते। लो आ गया..! अब आज पूरे दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा।
मैंने चिढ़ते हुए कहा – ये क्या मज़ाक है? अरे मज़ाक नहीं है, सच है। सिर्फ़ तुम्हे ही नज़र आऊंगा। तुम्हारे सिवा कोई देख-सुन नही पायेगा, मुझे।
कुछ कहता इसके पहले पीछे से माँ आ गयी। अकेला ख़ड़ा-खड़ा क्या कर रहा है यहाँ,चाय तैयार है,चल आजा अंदर..”
अब उनकी बातों पे थोड़ा बहुत यकीन होने लगा था, और मन में थोड़ा सा डर भी था मैं जाकर सोफे पर बैठा ही था, तो बगल में वह आकर बैठ गए। चाय आते ही जैसे ही पहला घूँट पिया मैं गुस्से से चिल्लाया – अरे मां !! ये हर रोज इतनी चीनी ?
इतना कहते ही ध्यान आया कि अगर ये सचमुच में ईश्वर है तो इन्हें कतई पसंद नही आयेगा कि कोई अपनी माँ पर गुस्सा करे। अपने मन को शांत किया और समझा भी दिया कि भई !! तुम किसी की नज़र में हो आज। ज़रा ध्यान से।’
बस फिर मैं जहाँ-जहाँ,वह मेरे पीछे-पीछे पूरे घर में। थोड़ी देर बाद नहाने के लिये जैसे ही मैं बाथरूम की तरफ चला,तो उन्होंने भी कदम बढ़ा दिए..
मैंने कहा -प्रभु !! यहाँ तो बख्श दो…”
खैर !! नहा कर,तैयार होकर मैं पूजा घर में गया,यकीनन पहली बार तन्मयता से प्रभु वंदन किया,क्योंकि आज अपनी ईमानदारी जो साबित करनी थी फिर आफिस के लिए निकला,अपनी कार में बैठा,तो देखा बगल में महाशय पहले से ही बैठे हुए हैं। सफ़र शुरू हुआ तभी एक फ़ोन आया और फ़ोन उठाने ही वाला था कि ध्यान आया, … ‘तुम किसी की नज़र मे हो।’
कार को साइड मे रोका,फ़ोन पर बात की और बात करते-करते कहने ही वाला था कि इस काम के ऊपर के पैसे लगेंगे। पर ये तो गलत था,पाप था तो प्रभु के सामने कैसे कहता तो एकाएक ही मुँह से निकल गया।आप आ जाइये। आपका काम हो जाएगा आज।
फिर उस दिन आफिस में न स्टाफ पर गुस्सा किया,न किसी कर्मचारी से बहस की 25-50 गालियाँ तो रोज़ अनावश्यक निकल ही जाती थी मुँह से,पर आज सारी गालियाँ,कोई बात नही,इट्स ओके मे तब्दील हो गयीं।
वह पहला दिन था जब क्रोध,m घमंड,किसी की बुराई,लालच, अपशब्द,बेईमानी,झूठ ये सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा नही बनें।शाम को आफिस से निकला,कार में बैठा तो बगल में बैठे ईश्वर को बोल ही दिया।प्रभु सीट बेल्ट लगा लें,कुछ नियम तो आप भी निभायें… उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी…”
घर पर रात्रि भोजन जब परोसा गया तब शायद पहली बार मेरे मुख से निकला – प्रभु !! पहले आप लीजिये।और उन्होंने भी मुस्कुराते हुए निवाला मुँह मे रखा। भोजन के बाद माँ बोली – पहली बार खाने में कोई कमी नही निकाली आज तूने।क्या बात है ? सूरज पश्चिम से निकला है क्या आज ?”
मैंने कहाँ -माँ !! आज सूर्योदय मन में हुआ है।रोज़ मैं महज खाना खाता था,आज प्रसाद ग्रहण किया है माँ !! और प्रसाद मे कोई कमी नही होती।थोड़ी देर टहलने के बाद अपने कमरे मे गया,शांत मन और शांत दिमाग के साथ तकिये पर अपना सिर रखा तो ईश्वर ने प्यार से सिर पर हाथ फिराया और कहा -आज तुम्हे नींद के लिए किसी संगीत, किसी दवा और किसी किताब के सहारे की ज़रुरत नहीं है।
गालों की थपकी ने गहरी नींद को हिला दिया !! कब तक सोयेगा।जाग जा अब। मां की आवाज थी वह।
सपना था शायद हाँ !! सपना ही था,पर आज का यह सपना मुझे जीवन की गहरी नीँद से जगा गया। अब समझ में आ गया उसका इशारा कि – तुम मेरी नज़र में हो…।”
जिस दिन हम ये समझ जायेंगे कि वो देख रहा है,हम उसकी नजर में हैं उस दिन से हमारी जीवन यात्रा सरल व सुखद हो जायेगी..!!
🙏🏼🙏🏽🙏🏻जय श्री कृष्ण🙏🙏🏾🙏🏿
[09/09, 5:59 am] +91 87658 77512: 0️⃣9️⃣❗0️⃣9️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣5️⃣
*🌳 कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक 🌳*
कहते है की इंसान का वर्तमान, उसके पिछले कर्मो पर और भविष्य वर्तमान कर्मों पर आधारित होता है। लेकिन यह बात केवल मनुष्यो पर ही नहीं अपितु भगवानों पर भी लागू होती है।
हमारे पुराणों में अनेक ऐसी कथाएँ है जब भगवान द्वारा अतीत में किये गए अनुचित कार्यों के कारण उन्हें आने वाले समय में कष्ट उठाने पड़े।
ऐसी ही एक कहानी भगवान शंकर से सम्बंधित है जब उन्हें कश्यप ऋषि द्वारा दिए गए शाप के कारण अपने ही पुत्र गणेश का मस्तक काटना पड़ा।
देवी पार्वती ने एक बार शिवजी के गण नन्दी के द्वारा उनकी आज्ञा पालन में त्रुटि के कारण अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम मेरी ही आज्ञा का पालन करना और किसी की नहीं।
देवी पार्वती ने यह भी कहा कि मैं स्नान के लिए जा रही हूं। कोई भी अंदर न आने पाए। थोड़ी देर बाद वहां भगवान शंकर आए और देवी पार्वती के भवन में जाने लगे। यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया।
बालक का हठ देखकर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया।
देवी पार्वती ने जब यह देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गई। उनकी क्रोध की अग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा।
तब भगवान शंकर के कहने पर विष्णुजी एक हाथी का सिर काटकर लाए और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर दिया।
तब भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। इस प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ।
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार नारद जी ने श्री नारायण से पूछा कि प्रभु आप बहुत विद्वान है और सभी वेदों को जानने वाले हैं। मैं आप से ये जानना चाहता हूं कि जो भगवान शंकर सभी परेशानियों को दूर करने वाले माने जाते हैं। उन्होंने क्यों अपने पुत्र गणेश की के मस्तक को काट दिया।
यह सुनकर श्रीनारायण ने कहा नारद एक समय की बात है। भगवान शंकर ने माली और सुुमाली को मारने वाले सूर्य पर बड़े क्रोध में त्रिशूल से प्रहार किया। सूर्य भी शिव के समान तेजस्वी और शक्तिशाली था।
इसलिए त्रिशूल की चोट से सूर्य की चेतना नष्ट हो गई। वह तुरंत रथ से नीचे गिर पड़ा। जब कश्यपजी ने देखा कि मेरा पुत्र मरने की अवस्था में हैं।
तब वे उसे छाती से लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओं में हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोर से रुदन करने लगे।
अंधकार छा जाने से सारे जगत में अंधेरा हो गया। तब ब्रह्मा के पौत्र तपस्वी कश्यप जी ने शिव जी को शाप दिया वे बोले जैसे आज तुम्हारे प्रहार के कारण मेरे पुत्र का हाल हो रहा है। ठीक वैसे ही तुम्हारे पुत्र पर भी होगा। तुम्हारे पुत्र का मस्तक कट जाएगा।
यह सुनकर भोलेनाथ का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने सूर्य को फिर से जीवित कर दिया। सूर्य कश्यप जी के सामने खड़े हो गए। जब उन्हें कश्यप जी के शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने सभी का त्याग करने का निर्णय लिया। यह सुनकर देवताओं की प्रेरणा से भगवान ब्रह्मा सूर्य के पास पहुंचे और उन्हें उनके काम पर नियुक्त किया।
ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनंद से सूर्य को आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवन चले गए। इधर सूर्य भी अपनी राशि पर आरूढ़ हुए। इसके बाद माली और सुमाली को सफेद कोढ़ हो गया, जिससे उनका प्रभाव नष्ट हो गया।
तब स्वयं ब्रह्मा ने उन दोनों से कहा-सूर्य के कोप से तुम दोनों का तेज खत्म हो गया है। तुम्हारा शरीर खराब हो गया है। तुम सूर्य की आराधना करो। उन दोनों ने सूर्य की आराधना शुरू की और फिर से निरोगी हो गए..!!
*🙏🏻🌹ॐ नमः शिवाय*🩵🩷
[09/09, 5:59 am] +91 87658 77512: 0️⃣9️⃣💎0️⃣9️⃣💎2️⃣0️⃣2️⃣5️⃣
*🔥 आज की प्रेरणा प्रसंग 🔥*
*🌹 अधूरी – अंतिम बातचीत 🌹*
अपने पिता का अंतिम संस्कार कर लौट रहे सिद्धार्थ की आंखों से अविरल धारा बह रही थी। वह अपने साथ वापस हो रही भीड़ के आगे-आगे चल जरूर रहा था, पर उसका मन उसी तेजी से पीछे भाग रहा था। साथी उसके कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना दे रहे थे, पर वह जानता था कि ये आंसू दरअसल उसके मन में चल रहे प्रायश्चित के भी आंसू हैं। उसे रह- रहकर अफसोस हो रहा था कि वह अपने पिता के कहे अनुसार क्यों नहीं चला? क्यों उसने वह सब किया जिनसे पिता हमेशा दूर रहने के लिए कहते थे?
बेचैन मन लिए वह जैसे-तैसे थके कदमों से घर पहुंचा, पर अब उसे कोई कुछ बोलने वाला नहीं था। कोई उसे प्यार और नि:स्वार्थ भाव से समझाने वाला नहीं था। वह एकांत में जाकर फिर फूट- फूटकर रोने लगा। उसे लग रहा था कि हो न हो, उसका विजातीय विवाह ही पिता की मृत्यु का कारण बना है। अभी पिछले महीने ही तो उसने पिता को बताए बिना अपनी मर्जी से मंदिर में शादी की है। एक बार भी उसने पलटकर पिताजी का आशीर्वाद लेना उचित नहीं समझा और शहर से बाहर चला गया। बिना यह सोचे कि उसके बगैर मां-पिताजी का क्या हाल होगा? कैसा डर था यह, कैसी संवादहीनता पसरी थी पिता-पुत्र के बीच जिसने कि उसे अपने पिता का सामना भी नहीं करने दिया। काश! वह एक बार तो अपने मन की बात पिता से कहता। पिताजी तो उससे कितना प्यार करते थे… और मां? मां से ही बता देता। शायद, नहीं… नहीं… पक्के से पिताजी उसकी शादी मनोरमा से ही करा देते। वे तो जात-पात मानते ही नहीं थे। क्या वे अपने इकलौते पुत्र की भी बात नहीं मानते? जरूर मानते। उसने ही गलती की है जिसकी इतनी बड़ी सजा उसे मिली है। अब वह माफी मांगे भी तो किससे मांगे? क्या समय लौटकर आ सकता है?
तभी मनोरमा की मार्मिक आवाज से सिद्धार्थ की तन्द्रा टूटी। वह कह रही थी कि अपने को संभालो सिद्धार्थ। अब मांजी को देखो। उनका रो-रोकर बुरा हाल हो रहा है। बार-बार अचेत हो रही हैं। मैंने डॉक्टर अंकल को फोन कर दिया है। वे आते ही होंगे। अब चलो भी। कब तक मां का सामना नहीं करोगे? मां ने हमें माफ कर दिया है। मुझे ‘बेटी’ कहकर गले लगाया है। अब से मैं ही उनकी देखभाल करूंगी। आप जरा भी चिंता न करें और मां से मिल लें। मनोरमा की बातों से सिद्धार्थ थोड़ा संभला, खुद को संयत कर वह मां के कमरे में उनसे लिपटकर रोने लगा। तीसरे दिन सिद्धार्थ ने जब पिताजी की अलमारी खोली तो उसमें से एक खत मिला जिसके ऊपर लिखा था- प्रिय बेटे सिद्धार्थ।
थरथराते हाथों से सिद्धार्थ ने चिट्ठी खोली। लिखा था- सिद्धार्थ। तुम इतने बड़े कब से हो गए कि अपने जीवन का निर्णय खुद कर लिया। मुझे बताया भी नहीं। एक बार मुझसे या अपनी मां से कहकर तो देखते। कितनी धूमधाम से करते हम तुम्हारी शादी। बचपन से आज तक तुम्हारी खुशियां ही तो देखी हैं। जानता हूं, तुम जिद्दी स्वभाव के रहे हो लेकिन यह नहीं जानता था कि तुम मुझसे इतना डरते हो। नहीं जानता कि तुमने बिना बताए शादी मेरे डर के वजह से की या कोई और कारण था। यदि हर बेटा ऐसा करेगा तो माता -पिता का तो अपने बच्चों पर से विश्वास ही उठ जाएगा। खैर, जो हुआ सो हुआ। जब भी घर लौटो, इस विश्वास से लौटना कि यह घर तुम्हारा है, हम तुम्हारे हैं।
अंत में लिखा था- काश! तुम मेरे रहते लौट आओ। तुम और तुम्हारी मां नहीं जानते, मुझे ब्लड कैंसर है। यदि तुम्हारे लौटने से पहले ही मैं दुनिया छोड़ दूं तो मन में यह बोझ लेकर नहीं जीना कि मेरी मृत्यु तुम्हारे कारण हुई है। बहू को मेरा आशीष। अपनी मां का ख्याल रखोगे, इतना विश्वास है मुझे।
तुम्हारा पिता…
*👉शिक्षा*
यही हमारी संस्कृति कहती है – रिश्ते संवाद और सम्मान से मजबूत होते हैं, चुप्पी और अहंकार से नहीं।
*सदैव प्रसन्न रहिये – जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है – उसके पास समस्त है।।*

More Stories
लखनऊ 5 मार्च 26*यूपीआजतक न्यूज चैनल पर सुबह 10 बजे की बड़ी खबरें……………….
वाराणसी 5 मार्च 26*रामकृष्ण मिशन अस्पताल सिर्फ सेवा आश्रम नाम का ही रह गया, व्यवस्था दलाली पर*
नई दिल्ली 5 मार्च 26*यूपीआजतक न्यूज चैनल पर देश और राज्यों से बड़ी खबरें