नई दिल्ली3अगस्त25*काकोरी क्रांतिकारी एक्शन शताब्दी वर्ष संवैधानिक सुधार बनाम सशस्त्र क्रांति–कमल सिंह
9 अगस्त ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी जन विद्रोह (1942) दिवस है।संवैधानिक सुधार की जगह जन विद्रोह द्वारा इलाके के आधार पर समानांतर सत्ता कायम कर सशस्त्र क्रांतिकारी संछर्ष से देश को आजाद कराने की कोशिश थी 1942 की अगस्त क्रांति
काकोरी के शहीद
इस वर्ष 9 अगस्त काकोरी क्रांतिकारी एक्शन का शताब्दी वर्ष भी है। देश को आजाद करने के लिए जन मुक्ति सेना संगठित करने के खातिर क्रांतिकारी संगठन “हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी (HRA-Hindustan Republican Army) के 10 क्रांतिकारियों ने उत्तर प्रदेश में लखनऊ से 16 किलोमीटर दूर काकोरी रेलवे स्टेशन पर सहारनपुर से लखनऊ रेल में जा रहे खजाने को जब्त किया था। संगठन के प्रमुख नेता राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह ने फांसी का फंदा चूम कर देश की आजादी के लिए प्राण न्योछावर किए थे। राजेन्द्र लाहिड़ी को 17 दिसंबर,1927 को गोंडा जेल में 19 दिसंबर, 1927 को बिस्मिल को गोरखपुर जेल में, अशफाक को फैजाबाद जेल और रोशन सिंह को इलाहाबाद की नैनी जेल में फांसी दी गई थी।
हिसप्रस के शहीद
चंद्रशेखर आजाद भी काकोरी के क्रांतिकारी एक्शन में सम्मिलित थे, सरकार उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकी थी। वे भूमिगत रहकर संगठन को पुनर्गठित करने में जुटे रहे। 1928 में संगठन के नाम में समाजवाद जोड़कर संगठन का नाम “हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सेना” (हिसप्रस} किया गया। इसके प्रमुख नेता भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु भी काकोरी के शहीदों की ही तरह 23 मार्च,1931 को शहीद हुए थे। इससे पहले चंद्रशेखर आजाद की शहादत 27 फरवरी 1931 सरकार से सशस्त्र मुठभेड़ के दौरान हो गई थी।
हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी
“हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी” का उद्देश्य था भारत को ब्रिटिश गुलामी से मुक्त करके लोकतात्रिक गणराज्य कायम करना। 1 जनवरी, 1925 को प्रकाशित संगठन के संविधान (पीला पर्चा) में बताया गया था संगठन का मकसद “ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को समाप्त करने और सार्वभौमिक मताधिकार और शोषण की समाप्ति के साथ संयुक्त राज्य भारत के एक संघीय गणराज्य की स्थापना है।” इस मकसद को हासिल करने के लिए संवैधानिक सुधार के रास्ते की जगह सशस्त्र क्रांति के रास्ते को अपनाते हुए गांधीजी की अहिंसा के नाम से संवैधानिक सुधार के कांग्रेस के रास्ते की नीति की तीव्र आलोचना भी यहां की गई थी। “यंग इंडिया” के 2020 से 24 के अंक में क्रांतिकारियों के सशस्त्र क्रांति के रास्ते के विरोध में शचीन्द्रनाथ सान्याल के साथ बहस में गांधी जी ने जो विचार व्यक्त किए हैं। (देखिए, गांधी की संग्रहित रचनावली) शचीन्द्रनाथ सान्याल को दो बार कालापानी का दंड दिया गया था।
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असहयोग आंदोलन के बाद
काकोरी की क्रांतिकारी सैन्य कार्रवाई का समय राष्ट्रीय आंदोलन नए मोड़ पर था। पहले विश्व युद्ध के बाद कांग्रेस-मुस्लिम लीग ने मिलकर असहयोग और खिलाफत आंदोलन प्रारंभ किए थे। दोनों ही बिना नतीजा खतम हो गए थे। युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार से सहयोग की नीति के आधार पर 1916 में लखनऊ में कांग्रेस-मुस्लिम के बीच समझौता हुआ था। 1918 में युद्ध समाप्त होने के बाद दोनों ही को निराशा हुई। ब्रिटिश सरकार ने वायदे पूरे नहीं किए। मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने परस्पर सहयोग कर खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन प्रांरंभ किए। कांग्रेस द्वारा 1922 में असहयोग आंदोलन अचानक वापस लेने के साथ यह समझौता भंग हो गया। देश सांप्रदायिक दंगों की आग में झोंक दिया गया। 1907 की तरह कांग्रेस एक बार फिर टूटी। मोती लाल नेहरू और चितरंजन दास के नेतृत्व में स्वराज पार्टी ने मांटेस्गू-चेम्सफोर्ड सुधार के अनुसार कौंसिल (धारा सभा) के चुनाव में शिरकत स्वीकार कर ली, जिसके बहिष्कार से असहयोग आंदोलन शुरू हुआ था। गांधी जी रचनात्मक काम- खादी, नशाबंदी, हरिजन उद्धार, हिंदू-मुस्लिम एकता में लग गए। बहिष्कार समर्थकों का नेतृत्व करने वाला कोई नेता नहीं था। यह परिस्थिति थी जब क्रांतिकारियों ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में संंगठित होकर “औपनिवेशिक स्वराज” की जगह ब्रिटिश साम्राज्यवाद से देश को आजाद कराने और सार्विक मताधिकार के आधार पर लोकतांत्रिक गणराज्य कायम करने का दायित्व संभाला था।
असहयोग आंदोलन और क्रांतिकारी
असहयोग आंदोलन के समय गांधी जी ने क्रांतिकारियों से अपील की थी, एक साल में स्वराज हासिल हो जाएगा, इस बीच क्रांतिकारी कोई एक्शन न करें, आंदोलन में सम्मिलित होकर सहयोग करें। संवैधानिक सुधार की नीति से असहमत होते हुए भी क्रांतिकारियों ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया था। राम प्रसाद बिस्मिल अशफाक उल्ला खान समेत कई क्रांतिकारी कांग्रेस अधिवेशनों में जाते थे। चंद्रशेखर आजाद कम आयु (15 बरस) के बावजूद असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार हुए। उन्हे माफी मांगने का अवसर दिया गया परंतु उन्होंने माफी मांगने की जगह आंदोलनकारी नारे लगाए। जलियांवाला जनसंहार (13 अप्रैल, 1919) के समय भगत सिंह 12 साल के थे। उन्होंने देश की आजादी का अहद लिया था।
काकोरी के क्रांतिकारियों का संदेश
राम प्रसाद बिस्मिल द्वारा फांसी के पहले लिखे पत्र, आत्मकथा, विभिन्न लेख और अनुवाद, ाजादी के संघर्ष के लिए गुरिल्ला युद्ध की रणनीति, उनकी और अशफाक उल्ला की शायरी, मैनपुरी क्रांतिकारी कार्रवाई, “मातृवेदी” क्रांतिकारी संगठन के नायक गेंदेलाल दीक्षित की जीवनी, अशफाक की जीवनी प्रचुर साहित्य है। अशफाक उल्ला खान का फांसी के पहले “कौम के नाम संदेश” बनेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज ह इसमें सांप्रदायिकता के खिलाफ लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष शोषण मुक्त भारत का वह सपना बयान किया गया है जिसमें, मजदूर वर्ग और किसानों का शोषण नहीं होगा उनके समस्त नागरिक व जनवादी अधिकारों की हिफाजत होगी। इस सपने को साकार करने के लिए अशफाक उल्ला खान ने इस संदेश में कहा है कि वे अपने को कम्युनिस्टों से सबसे ज्यादा करीब पाते हैं। उन्होंने कामरेडों से कहा है वे मजदूर और किसानों के बीच जाएं और भारत की स्थितियों के अनुसार कम्युनिज्म के विचारों को लागू करें। आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में शुद्धी आंदोलन और तबलीगी जमात द्वारा चलाए जा रहे इस्लामीकरण अभियान, देश में सांप्रदायिक दंगों की तीखी आलोचना करते हुए उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों से मिलकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुल्क को मुक्त कराने की अपील की है।

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